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बंगाल चुनाव से पहले CEC ज्ञानेश कुमार के ‘महाभियोग’ की माँग, TMC का दाँव: जानिए कैसे ममता बनर्जी ने राजनीतिक ड्रामा और सार्वजनिक प्रदर्शन को बनाया चुनावी हथियार

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के SIR पर विवाद के बीच ममता बनर्जी और TMC ने चुनाव आयोग व CEC ज्ञानेश कुमार पर हमला तेज किया, विरोध प्रदर्शन और महाभियोग की माँग उठाई।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक आने के बीच तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ने भारत के चुनाव आयोग (ECI) के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का प्रस्ताव रखा है।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली इस पार्टी को इस कदम के लिए कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य सहयोगी दलों का समर्थन भी मिला है। इन दलों ने मिलकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव (Impeachment Motion) लाने की तैयारी की है।

इस दिशा में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में पेश किए जाने वाले नोटिस के लिए 120 सांसदों और राज्यसभा में दिए जाने वाले नोटिस के लिए 60 सांसदों के हस्ताक्षर भी जुटा लिए हैं।

ममता बनर्जी के शस्त्रागार में दो हथियार

पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले यह कदम क्यों उठाया गया? और क्या विपक्षी दलों खासतौर पर तृणमूल कॉन्ग्रेस को यह नहीं पता कि यह ‘महाभियोग प्रस्ताव’ किसी ठोस नतीजे तक शायद ही पहुँचेगा? आखिर एक दिन पहले ही ओम बिरला को हटाने की विपक्ष की कोशिश नाकाम हो चुकी है। दरअसल, इसे ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जो अक्सर राजनीतिक ड्रामा और सार्वजनिक प्रदर्शन के इर्द-गिर्द घूमती है।

कई विश्लेषकों का मानना है कि जब भी ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर में घिरती हुई महसूस करती हैं या उनकी महत्वाकांक्षी राजनीति में ठहराव आता है, तब वह किसी बड़े सार्वजनिक मुद्दे या राजनीतिक नाटक के जरिए फिर से सुर्खियों में आने की कोशिश करती हैं।

उदाहरण के तौर पर 1993 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के खिलाफ एक विरोध मार्च और चुनावी साजिश के आरोपों को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। उस समय उनका मुद्दा मतदान प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने का बताया गया था।

दरअसल, सड़क पर संघर्ष, आक्रामक विरोध प्रदर्शन और जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक नाटक उनकी राजनीति की पहचान माने जाते हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर से जुड़े विवादों को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल किया।

इन आंदोलनों के दौरान ममता बनर्जी स्थानीय बंगालियों को यह समझाने में सफल रहीं कि इन परियोजनाओं से होने वाला आर्थिक विकास उनके हित में नहीं है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मुद्दों पर लगातार जनता को अपने पक्ष में मोड़ते हुए ही ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की सत्ता तक पहुँचने में सफलता हासिल की।

2026 की राजनीतिक सच्चाई

पहले के चुनावों के मुकाबले इस बार ममता को पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व जन-विरोध का सामना करना पड़ रहा है। जो मध्यमवर्गीय बंगाली कभी मासिक आर्थिक सहायता योजनाओं के लिए उनकी तारीफ करते थे, वही अब उनकी सरकार की कार्यक्षमता पर सवाल उठाने लगे हैं।

राज्य में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण की राजनीति और बहुसंख्यक हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों ने सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस को बैकफुट पर ला दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालात कठिन होते देख ममता बनर्जी एक बार फिर अपनी पुरानी रणनीति राजनीतिक ड्रामा और सार्वजनिक प्रदर्शन पर निर्भर होती दिख रही हैं। इस बार आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर आम लोगों की आशंकाओं और अज्ञानता को मुद्दा बनाया जा रहा है।

बताया जा रहा है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस एक अभियान चला रही है, जिसके जरिए बंगालियों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि चुनाव आयोग एक ‘बाहरी ताकत’ है, जो उनके मतदान अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।

इसके साथ ही एक समानांतर रणनीति के तहत ममता बनर्जी को ‘बांग्लार मेये’ (बंगाल की बेटी) के रूप में पेश किया जा रहा है, जो कथित बाहरी ताकतों के खिलाफ स्थानीय अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं।

दरअसल, 2026 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव से पहले का राजनीतिक माहौल काफी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।

इसी संदर्भ में चुनाव आयोग, इसके मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर लगातार राजनीतिक हमला और रणनीतिक अभियान चलाया जा रहा है।

SIR और ECI का व्यवस्थित और रणनीतिक लक्ष्यीकरण

जैसे ही मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की घोषणा हुई, ममता बनर्जी ने पिछले साल 4 नवंबर को अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ एक ‘प्रोटेस्ट रैली’ का ऐलान कर दिया। उन्होंने पार्टी नेताओं को ‘वॉर रूम’ बनाने और BLO (बूथ लेवल अधिकारी) पर ‘मैन-टू-मैन मार्किंग’ करने का निर्देश भी दिया।

कुछ दिनों बाद ममता बनर्जी ने SIR को ‘सुपर इमरजेंसी’ बताते हुए ECI  से इसे पूरी तरह रोकने की माँग की। उनका आरोप था कि यह प्रक्रिया जानबूझकर शुरू की गई है ताकि सरकारी अधिकारी व्यस्त रहें और तीन महीने तक पश्चिम बंगाल सरकार का कामकाज प्रभावित हो।

उन्होंने SIR की तुलना ‘वोटबंदी’ से करते हुए यह भी दावा किया कि इस प्रक्रिया से कथित तौर पर कई लोगों की आत्महत्या हुई है। उन्होंने कहा, “इतने लोग मर गए, लेकिन चुनाव आयोग ने एक भी संवेदना संदेश नहीं दिया। आप मुझे जेल भेज दीजिए या मेरा गला काट दीजिए, लेकिन एक भी असली मतदाता का नाम मत काटिए।”

नवंबर 2025 में ममता बनर्जी ने यह कहते हुए विवाद खड़ा कर दिया कि उन्हें बांग्लादेश से प्यार है। उन्होंने इस दावे को भी नकार दिया कि SIR का उद्देश्य पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से बांग्लादेशी नागरिकों के नाम हटाना है। उन्होंने यहाँ तक कहा, “अगर आपका नाम हटाया जाता है, तो केंद्र सरकार को भी हटा देना चाहिए।”

तृणमूल प्रमुख ने SIR को लेकर देश में अराजकता की चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि बिहार के चुनाव में विपक्ष भाजपा की रणनीति नहीं समझ पाया, लेकिन बंगाल में ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर बंगाल को छूने की कोशिश हुई तो हम पूरे देश को हिला देंगे।”

एक महीने बाद ममता बनर्जी ने कहा कि किसी को भी बांग्लादेश नहीं भेजा जाएगा। इसी दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल की महिलाओं से चुनाव आयोग के अधिकारियों का सामना ‘रसोई के औजारों’ से करने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि अगर महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए तो वे आगे आकर विरोध करें और पुरुष पीछे से उनका समर्थन करें।

दिसंबर 2025 में ममता बनर्जी ने SIR को ‘बहुत बड़ा घोटाला’ बताया और आरोप लगाया कि इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से चलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया के जरिए पश्चिम बंगाल के लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है।

इसके कुछ समय बाद उन्होंने चुनाव आयोग पर तीखा हमला करते हुए कहा कि अगर रवीन्द्रनाथ टैगोर आज जीवित होते, तो उनका नाम भी मतदाता सूची से हटा दिया जाता।

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि SIR के जरिए पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है और उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं।

इसी दौरान तृणमूल सरकार के समर्थक माने जाने वाले कुछ मीडिया पोर्टलों ने राज्य में हुई कई मौतों को SIR प्रक्रिया से जोड़कर प्रचारित किया। इन अपुष्ट दावों की तुलना 2016 के डेमोनेटाइजेशन के दौरान फैली अफवाहों और भय के माहौल से की गई।

इसके अलावा कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने यह दावा भी किया कि पश्चिम बंगाल में SIR लागू होने से इतिहास का सबसे बड़ा मतदाता अधिकार हनन हो सकता है। इसी मुद्दे को लेकर इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में कई याचिकाएँ भी दायर की गईं।

कैसे TMC की आँखों की किरकिरी बने ज्ञानेश कुमार

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस के पूरे तंत्र को हिला कर रख दिया है, पार्टी नेतृत्व से लेकर जमीनी स्तर तक। इसका कारण भी स्पष्ट है। ECI ने इस प्रक्रिया के दौरान राज्य की मतदाता सूची से 58,20,899 नाम हटा दिए, जिनमें मृत्यु, स्थान परिवर्तन, अनुपस्थिति और डुप्लिकेशन जैसे कारण शामिल बताए गए।

इसके साथ ही लगभग 60 लाख ‘संदिग्ध मतदाताओं’ की सूची भी तैयार की गई है, जिनकी स्थिति पर अब न्यायिक अधिकारियों द्वारा फैसला किया जा रहा है। इससे ममता बनर्जी की सरकार के लिए राजनीतिक मुश्किलें खड़ी होना स्वाभाविक माना जा रहा है।

आलोचकों का आरोप है कि पहले के वर्षों में बांग्लादेश के नागरिकों के लिए पश्चिम बंगाल में रहना और मतदान करना अपेक्षाकृत आसान था। यहाँ तक कि कुछ मामलों में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों को ‘इमाम भत्ता’ जैसी योजनाओं का लाभ मिलने और चुनाव में सरकार के पक्ष में वोट देने के आरोप भी लगाए जाते रहे हैं।

पुराने समय में कुछ तृणमूल नेताओं के बयान भी सामने आए थे, जिनमें बांग्लादेशियों को पश्चिम बंगाल में मतदान अधिकार दिलाने में मदद करने की बात कही गई थी। ऐसे आरोपों के बीच SIR प्रक्रिया को इन योजनाओं पर रोक लगाने वाला कदम माना जा रहा है। इसी वजह से ज्ञानेश कुमार अचानक तृणमूल कॉन्ग्रेस के निशाने पर आ गए हैं। मामला केवल SIR तक सीमित नहीं है।

हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्ञानेश कुमार ने घोषणा की कि पश्चिम बंगाल के सभी मतदान केंद्रों पर 100% वेबकास्टिंग की जाएगी। इससे चुनाव प्रक्रिया की निगरानी कड़ी हो जाएगी और बूथ कब्जाने या वोटबॉक्स में गड़बड़ी की संभावनाएँ कम हो सकती हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने साफ कहा कि राजनीतिक हिंसा किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा, “चुनाव प्रक्रिया के दौरान हर मतदान कर्मी से पूर्ण निष्पक्षता अपेक्षित होगी और किसी भी तरह की हिंसा को सहन नहीं किया जाएगा।”

इस पूरे विवाद के संदर्भ में एक प्रसिद्ध बंगाली कहावत अक्सर उद्धृत की जाती है, ‘যত দোষ নন্দ ঘোষ’, जिसका अर्थ है, “सारी गलती नंद घोष की है।”

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, वर्तमान स्थिति में ज्ञानेश कुमार उसी नंद घोष की तरह बन गए हैं, जिन पर तृणमूल कॉन्ग्रेस चुनावी प्रक्रिया में सख्ती और कथित गड़बड़ियों पर रोक लगाने के कारण निशाना साध रही है।

अंतिम चाल

संभावित चुनावी गड़बड़ियों पर अचानक लगाम लगने के बाद अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस ने ECI और इसके मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आक्रामक अभियान शुरू कर दिया।

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करते हुए 6 मार्च को एस्पलेनैड में धरना देने का ऐलान किया। यह धरना मतदाता सूची से अवैध नाम हटाने के विरोध में आयोजित किया गया था।

इस प्रदर्शन के दौरान तृणमूल नेताओं ने आम बंगाली मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए कई विवादित बयान भी दिए। तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा, “मैं सबको बता रही हूँ कि अगर आप TMC का समर्थन नहीं करते, तो आप खुद को बंगाली नहीं कह सकते। जो लोग TMC का समर्थन नहीं करते, उन्हें बंगाली कहलाने का अधिकार नहीं है।”

वहीं ममता बनर्जी ने भी मंच से एक विवादित चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के कारण ही लोग सुरक्षित हैं और यदि उनकी सरकार नहीं होती, तो एक विशेष समुदाय लोगों को घेरकर नुकसान पहुँचा सकता है।

करीब 114 घंटे तक चले इस धरने के बाद ममता बनर्जी ने इसे समाप्त करते हुए इसे सफल करार दिया। हालाँकि जब यह स्पष्ट हो गया कि इस आंदोलन का SIR प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ा है, तो इसके बाद एक नया राजनीतिक मुद्दा खड़ा करने की कोशिश की गई मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग (impeachment) लाने की माँग। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम भी उठाया गया, जबकि यह पहले से स्पष्ट था कि इसके सफल होने की संभावना बेहद कम है।

निष्कर्ष

एक बंगाली होने के नाते मै ममता बनर्जी की राजनीतिक शैली से भली-भांति परिचित हुँ और उनके लिए यह कोई नई बात नहीं है। ममता बनर्जी की राजनीति लंबे समय से इसी तरह के राजनीतिक नाटकों और सार्वजनिक प्रदर्शनों पर आधारित रही है।

हालाँकि ममता बनर्जी को कम आंकना बड़ी गलती हो सकती है। चुनाव से ठीक पहले अचानक सहानुभूति हासिल करने वाली घटनाएँ पहले भी देखी गई हैं, जैसे 2021 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव और 2024 भारतीय आम चुनाव के दौरान।

चुनावी माहौल में व्हीलचेयर पर बैठी ममता बनर्जी जनता के सामने आ सकती हैं और ‘खेला होबे’ जैसे नारों के जरिए बंगालियों को ‘बाहरी लोगों’ के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर सकती हैं।

पश्चिम बंगाल की ‘मूक बहुसंख्या’ को राज्य की राजनीतिक दिशा बदलने का संकल्प लेना चाहिए और राज्य में लंबे समय से चल रहे राजनीतिक नाटक और सार्वजनिक प्रदर्शनों की राजनीति को समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Dibakar Dutta
Dibakar Duttahttps://dibakardutta.in/
Centre-Right. Political analyst. Assistant Editor @Opindia. Reach me at [email protected]

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