Saturday, October 23, 2021
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प्रोपेगेंडा का यह पाप भारी: टूलकिट से पल्ला झाड़ना कॉन्ग्रेस के लिए मुमकिन नहीं, इकोसिस्टम से बाहर नहीं चलेगा ‘फेक’ वाला जुमला

कॉन्ग्रेस भले इस टूलकिट को फेक बताए, शिकायत करे, पर सच्चाई यही है कि वह सवालों के ऐसे भँवर में है जिससे निकलना शायद ही उसके बूते में है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक टूलकिट (ToolKit) जारी किया। बताया कि इसे कॉन्ग्रेस पार्टी ने तैयार किया ताकि कोरोना की दूसरी लहर में योजनाबद्ध तरीके से नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और प्रदेशों में बीजेपी सरकारों के विरुद्ध झूठा प्रचार चलाकर उन्हें बदनाम किया जा सके। कॉन्ग्रेस की ओर से वक्तव्य आया कि इस टूलकिट से उसका कोई सम्बंध नहीं है।

कॉन्ग्रेस की प्रतिक्रिया अपेक्षा के अनुरूप ही है। एक लोकतांत्रिक देश में हर राजनीतिक दल से एक न्यूनतम सार्वजनिक व्यवहार की अपेक्षा होती है, इसलिए विपक्ष में बैठा कोई दल यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसने सरकार और उसके नेता के विरुद्ध ऐसी साजिश रची।

कॉन्ग्रेस की ओर से आया यह वक्तव्य तब और भी अपेक्षित लगता है जब सरकार के नेता नरेंद्र मोदी हों क्योंकि मोदी की कथित घटती लोकप्रियता अभी तक केवल सोशल मीडिया विमर्श का ही हिस्सा रही है और इसे लेकर किसी तरह का हालिया सर्वे प्रकाशित नहीं हुआ है। कोरोना की तीव्र दूसरी लहर के दौरान नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की असफलता को लेकर परंपरागत मीडिया और सोशल मीडिया में दावे भले किए जा रहे हैं पर फिलहाल एक वृहद् परिप्रेक्ष्य में उन्हें अभी तक मात्र दावों के रूप में ही देखा जाएगा, ऐसे दावे जो समय-समय पर पहले भी किए जाते रहे हैं। ऐसे में कॉन्ग्रेस इस टूलकिट के साथ किसी भी तरह से दिखना नहीं चाहेगी।

टूलकिट को लेकर बीजेपी, कॉन्ग्रेस और इन दलों के समर्थकों की प्रतिक्रियाएँ और काफी हद तक सोशल मीडिया में चल रहा शोर भी अपेक्षा के अनुरूप है। जैसा मैंने लिखा, कॉन्ग्रेस सार्वजनिक तौर पर यह नहीं चाहेगी कि इस टूलकिट से उसका किसी भी तरह का सम्बंध साबित हो। दूसरी ओर बीजेपी यही चाहेगी कि ऐसे सबूत पेश किए जाएँ जो साबित कर दें कि इसका सम्बंध कॉन्ग्रेस से है। राजनीतिक विमर्श में यह विषय अगले कई दिनों तक छाया रहेगा। इस पर तर्क, वितर्क और कुतर्क देखने को मिलेंगे जो लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा हैं।

इस टूलकिट में क्या-क्या लिखा है यह राजनीतिक विमर्शों में सक्रिय रहने वालों को पता है। लिहाजा उन्हें यहाँ दोहराने की आवश्यकता नहीं है। पर इस टूलकिट की सच्चाई क्या है, शायद इस प्रश्न का उत्तर निकट भविष्य में पता न चल सके। कॉन्ग्रेस पार्टी उसे बदनाम करने और इसके खुद के साथ जोड़ने को लेकर बीजेपी के विरुद्ध शिकायत कर चुकी है। लेकिन क्या इतना करना काफी होगा? क्या एक ​शिकायत पार्टी को इस टूलकिट के खुलासे से पैदा होने वाले विमर्श से अलग कर सकेगी? मेरे विचार से लंबे समय तक प्रश्नों से खुद को दूर रखने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेताओं के लिए ऐसा संभव न हो सकेगा।

इस टूलकिट के सम्बंध में प्रश्न पूछे जाएँगे। कॉन्ग्रेस पार्टी उन प्रश्नों का उत्तर दे या न दे पर वह इनसे अपना पल्ला नहीं झाड़ सकेगी क्योंकि वर्तमान समय महत्वपूर्ण है जब यह खुलासा हुआ है। यह टूलकिट भीषण महामारी से जूझ रहे भारतवर्ष में कॉन्ग्रेस पार्टी, उसकी सहयोगी मीडिया, उसके पाले वाले बुद्धिजीवी और उसके बनाए इकोसिस्टम के आचरण के बारे में है। पिछले कई वर्षों में राहुल गाँधी की राजनीतिक जवाबदेही देखी नहीं गई, न तो उनकी पार्टी के सामने और न ही भारतवर्ष की जनता के सामने।

उनकी राजनीति अभी तक अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों के साथ वीडियो में कठिन दर्शन झाड़ने, मेहनत करके इकट्ठा की गई भीड़ के सामने मानलॉग डिलिवर करने और ठोस प्रश्नों पर चुप रहने पर निर्भर रही है। पर उनकी यह रणनीति तभी तक चल सकती है जब तक बात उनकी पार्टी के प्रति उनकी जवाबदेही की हो रही है। वे ऐसा राजनीतिक आचरण तभी तक अफोर्ड कर सकते हैं जब तक वे अपने दल से मुखातिब हैं। पर जब बात भारतवर्ष के लोकतंत्र और अन्य दलों को लेकर होगी, उनका यह आचरण मान्य नहीं होगा।

इस टूलकिट के आधार पर प्रश्न पूछा जाएगा कि उसमें जो कुछ लिखा गया है वैसा हुआ या नहीं? दल ने इस टूलकिट में वर्णित योजना के अनुसार अपने इकोसिस्टम के जिस किसी जिस शाखा से जो करने के लिए कहा, उसने वैसा किया या नहीं? सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा के जिन स्वरूपों का वर्णन इस टूलकिट में है वैसा ही प्रोपेगेंडा हुआ या नहीं? इकोसिस्टम से पार्टी ने जो अपेक्षा रखी, उसने अपना वह किरदार निभाया या नहीं? ये सारे प्रश्न पूछे जाएँगे और चूँकि इस बार एक ऐसी टूलकिट लीक हुई है जिसे बनाने वाले और उसके क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी लेने वाले देसी हैं, कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व के लिए इससे खुद को अलग कर पाना लगभग असंभव होगा।

 

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