चर्च यौन शोषण: पोप का चुप्पी तोड़ना उनके मौन से भी ख़तरनाक है क्योंकि…

'महिलाओं के यौन शोषण' की तुलना 'शक्ति के दुरुपयोग' से नहीं की जा सकती। पहला वाला कहीं अधिक घृणित और वीभत्स कार्य है।

ईसाइयों के सबसे बड़े पादरी पोप फ्रांसिस और इस्लाम के सर्वोच्च मौलवियों में से एक इमाम शेख़ अहमद अल-तैयब ने चुम्मा-चाटी कर सांप्रदायिक सौहार्दता का कथित सन्देश तो दे दिया, लेकिन इस से ज़मीनी हालात में कुछ सुधार नज़र नहीं आ रहे। बलात्कार, यौन शोषण के आरोपित पादरी अब भी खुले घूम रहे हैं, ननों को प्रताड़ित करने वाले बिशप अब भी अपने पद पर बेशर्मी से कार्यरत हैं, चर्च प्रशासन के अन्याय से तंग नन्स आज भी सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने को मज़बूर है, और वेटिकन आज भी इस संबंध में कोई कार्रवाई करने से हिचक रहा है।

हमने अपने पिछले लेख में बताया था कि कैसे जब पोप और इमाम एक-दूसरे की चुम्मी ले कर धार्मिक स्थलों की सुरक्षा का प्रण ले रहे थे, तभी पाकिस्तान और अमेरिका में मंदिरों को जलाने और उनमे तोड़-फोड़ करने की ख़बर आई। अब पोप ने चर्च यौन शोषण पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए काफी बेढंगी प्रतिक्रया दी है। जैसे किसी देश के संविधान में लिखे एक-एक शब्दों की अदालतें व्याख्या करती आईं हैं, ठीक उसी तरह पोप के भी बयानों की व्याख्या करने के लिए वेटिकन मुँह फाड़े खड़ा रहता है।

पोप का ताज़ा बेढंगा बयान और वेटिकन की अज़ीबो-ग़रीब व्याख्या

पोप से जब एक रिपोर्टर ने चर्चों में हो रहे यौन शोषण के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा:

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“यह सच है…कई ऐसे पादरी हैं, और बिशप भी- जिन्होंने ये (यौन शोषण) किया है। मुझे लगता है कि यह अभी भी चल रहा है क्योंकि कुछ सिर्फ़ इसलिए नहीं रुकता क्योंकि आप इसके बारे में जागरूक हो गए हैं। हम इस पर लम्बे समय से कार्य कर रहे हैं, और हमने इन आरोपों के कारण कुछ पादरियों को निलंबित भी किया है।”

इसके बाद पोप ने ख़ुद से ही सवाल-जवाब करना शुरू कर दिया। “क्या और अधिक किया जाना चाहिए?” पोप ने पोप से पूछा। “हाँ” पोप ने ज़वाब दिया। “क्या हमारे पास इच्छाशक्ति है?” पोप ने पोप से फिर सवाल दागा। “यह एक रास्ता है जिस पर हम पहले ही चलना शुरू कर चुके हैं।”- पोप ने पोप को निरुत्तर कर दिया। इस सवाल-जवाब में मीडिया, आम जनता और पीड़ित नन्स- सबकी समस्याओं का समाधान हो गया।

बिशप फ्रांको मुलक्कल के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली ननों के साथ क्या किया गया, यह जगज़ाहिर है। बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार होकर ज़मानत पर बाहर आए उस बिशप का जिस तरह से स्वागत किया गया, इसकी ख़बर पोप तक जरूर पहुँची होगी। द एसोसिएट प्रेस सहित अन्य मीडिया पोर्टल्स ने ऐसी अनगिनत कहानियों की चर्चा की, जहाँ ननों को पादरियों द्वारा ‘सेक्स टॉयज’ की तरह इस्तेमाल किया गया।

सबसे पहले पोप के बयान पर ध्यान देते हैं। उनके अनुसार, कार्रवाई की जा रही है। इस पर हर एक व्यक्ति उनसे पूछना चाहेगा कि बिशप मुलक्कल पर क्या कार्रवाई की गई? सड़क पर तख़्तियाँ लेकर खड़े ननों को न्याय दिलाने के लिए वेटिकन ने क्या किया? ऐसी सूरत में, जब ख़बर स्थानीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया तक में चली और चर्च की किरकिरी हुई, वेटिकन ने इस बारे में एक बयान तक जारी करना क्यों ज़रूरी नहीं समझा? महिलाओं के बारे में बात करते हुए पोप ने कहा:

“पूर्व पोप बेनेडिक्ट ने 2005 में अपने चुनाव के बाद शीघ्र ही महिलाओं के धार्मिक क्रम (Religious Order) को भंग कर दिया “क्योंकि दासता इसका हिस्सा बन गई थी (धार्मिक आदेश), यहाँ तक कि पादरियों और संस्थापकों की ओर से भी यौन दासता जैसे कृत्य किए जा रहे थे।”

वेटिकन ने पोप के बयान की जो व्याख्या की, वो और भी अज़ीबो-ग़रीब है। वेटिकन ने पोप के बयान को लेकर कहा:

“जब होली फादर ने एक संघटन के विघटन का ज़िक्र किया, तो ‘यौन दासता’ की बात की, जिसका अर्थ था ‘हेरफेर (Manipulation),’ शक्ति का दुरुपयोग- जो कि यौन शोषण में भी परिलक्षित होता है।”

वेटिकन का यह रवैया उसके भीतर चल रहे विरोधाभाषों को दिखता है। ‘महिलाओं के यौन शोषण’ की तुलना ‘शक्ति के दुरूपयोग’ से नहीं की जा सकती। पहला वाला कहीं अधिक घृणित और वीभत्स कार्य है। वो भी ऐसी महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार करना, जो ईश्वर की सेवा करने की पवित्र भावना के साथ चर्च में आती हैं।

फ़िल्मों से लेकर सोशल मीडिया तक छाया है मुद्दा

द बोस्टन ग्लोब नामक अख़बार की खोजी पत्रकारिता पर बनी ऑस्कर विजेता फ़िल्मस्पॉटलाइट‘ में पादरियों द्वारा किए जाने वाले बाल यौन शोषण को उजागर किया गया है। अख़बार द्वारा गठित स्पॉटलाइट टीम की खोजी पत्रकारिता की मदद से इस सच को सामने लाया गया था। द बोस्टन ग्लोब की स्पॉटलाइट टीम को पुलित्जर सम्मान मिला था। लेकिन, तब भी वेटिकन की आँखें नहीं खुलीं। इस फ़िल्म के पहले और बाद में कैथोलिक चर्च सिर्फ़ यौन शोषण के मामलों में करोड़ों का जुर्माना भर चुका है।

हमने भी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में आई यौन शोषण की कई स्टोरीज़ प्रकाशित की थी, जिसमे ननों ने अपने साथ हुए अत्याचार को उजागर किया था। हाल ही में अमेरिका के इलिलोईस प्रांत में करीब 700 पादरियों पर बच्चों के यौन शोषण का आरोप लगा था। इलिनोइस के अटॉर्नी जनरल ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई है कि चर्च इन आरोपों से निपटने में अक्षम रहा है। ज्ञात हो कि चर्च ने यौन शोषण के आरोपित पादरियों की संख्या 185 बताई थी लेकिन अटॉर्नी जनरल लीसा मैडिगन के अनुसार ऐसे पादरियों की संख्या इस से कहीं बहुत ज़्यादा है।

अब सवाल यह उठता है कि मामले के इतने बड़े स्तर पर जाने के बावजूद शक्तिशाली वेटिकन और पोप ने किसी भी प्रकार के बयान देने, इस घटनाओं की निंदा करने, और दोषी पादरियों पर कार्रवाई करने की ज़हमत क्यों नहीं उठाई। पोप ने आख़िरकार अपना मौन तो तोड़ा, लेकिन इस बयान से अच्छी तो उनकी चुप्पी थी। उनकी चुप्पी से कम से कम तरह-तरह के क़यास तो लगाए जा सकते थे, लेकिन उनके इस बयान ने दुनियाभर की हज़ारों पीड़ित ननों को निराशा के अलावा और कुछ नहीं दिया है।

अगर वेटिकन चर्च में हो रही इन वारदातों को सँभालने में नाकाम रहा है, तो उसे यह घोषणा कर देनी चाहिए कि उसने दुनियाभर के पादरियों का ठेका नहीं ले रखा है, और वो उसके जुरिडिक्शन में नहीं आते। खुल्ले साँड की तरह घूम रहे दोषी पादरी और बिशप फ़िलहाल आश्वस्त हैं- उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

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