किनके बच्चे आतंकी की ऊँगली थामते हैं, हाथों में पत्थर और जुबान जिहाद से रंगा होता है

आखिर, 10 से 11 साल के बच्चे बिना किसी ट्रेनिंग के 'जो हिटलर की चाल चलेगा, वो हिटलर की मौत मरेगा' और 'जामिया तेरे ख़ून से, इंकलाब आएगा' जैसे नारे कैसे लगा सकते हैं? कोई बच्चा अपनों का इशारा पाए अनजान जलीस की ऊँगली भला क्यों थामेगा?

कानपुर की एक मस्जिद के बाहर सादे कपड़ों में खड़े एसटीएफ अधिकारी ने जब आवाज दी- अंसारी चच्चा कैसे हो… तो एक बच्चा आतंकी जलीस अंसारी की ऊँगली थामे चल रहा था। ये बच्चा कौन था? किसका बच्चा था? इस बच्चे की पहचान जानने से ज्यादा जरूरी यह समझना है कि दूर-दूर तक इस बच्चे से जलीस अंसारी का कोई रिश्ता नहीं था।

फिर वो कौन सी बात होगी जिसने किसी को 50 से अधिक बम धमाकों में शामिल रहे, 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे, सिमी और हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकियों को बम बनाना सिखाने वाले जलीस अंसारी उर्फ डॉ. बम के हवाले अपना बच्चा कर देने को प्रेरित किया होगा। मीडिया रिपोर्टों से जाहिर है पुलिस की आँखों में धूल झोंकने के लिए ही जलीस मस्जिद से बच्चे को साथ लेकर निकला था।

परोल पर जेल से निकला जलीस मुंबई से गायब हुआ था। उसने बताया है कि वह कानपुर अपने दो दोस्तों की तलाश में आया था। उसने इनकी मदद से देश के बाहर निकलने के मंसूबे पाल रखे थे। लेकिन जब जलीस कानपुर पहुँचा तो उसे पता चला कि जिनकी तलाश में वह आया है उसमें से एक का इंतकाल हो चुका है। दूसरा कहीं और जा चुका है। फिर भी उसने मुंबई लौटने की नहीं सोची। उसे यकीन था कि अब भी वह अपने मंसूबे में कामयाब रहेगा। यह यकीन पैदा होता है एक अनजान शहर में ​अपनी पहचान छिपाने के लिए किसी का बच्चा हाथ लगने से।

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आतंकियों और कट्टरपंथियों द्वारा इसी तरह बच्चों का इस्तेमाल किए जाने को लेकर पिछले दिनों चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत ने चिंता जताई थी। जनरल रावत ने रायसीना डायलॉग को संबोधित करते हुए कहा था, “हम देख रहे हैं कि छोटे बच्चों को कट्टरपंथी बनाया जा रहा है। उन्हें पहचानने की जरूरत है। उन्हें ऐसे सेंटर में डालने की जरूरत है जहॉं वो इस रास्ते से वापस आ सकें।” रावत ने यह बात कश्मीर के संदर्भ में कही थी।

लेकिन, खतरा कहीं ज्यादा पसरा है। यही कारण है कि एक अनजान शहर में ढाल बनाने के लिए जलीस को बच्चा मिल जाता है। मुजफ्फरनगर में पुलिस पर बच्चे पत्थरबाजी करते हैं। शाहीन बाग के प्रदर्शन में उनका इस्तेमाल होता है। इसी खतरे को भॉंप मुजफ्फरनगर पुलिस ने 33 लोगों पर बच्चों को उकसाने का मामला दर्ज किया है। भड़काऊ नारे लगाते बच्चों को देख गैर सरकारी संगठन सेव चाइल्ड इंडिया ने नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) का दरवाजा खटखटाया है। क्योंकि, ये बच्चे केवल किसी मदरसे में कट्टरपंथी नहीं बनाए जा रहे। न ही जहर भरने के लिए से सीमा पार भेजे जा रहे। उन्हें अपने घर में, आस-पड़ोस से कट्टरपंथ की ये ट्रेनिंग मिल रही है।

बच्चों को जिहादी रंग में रंगने वाला खतरा जब गली-गली पसर रहा है जनरल रावत की चिंता को मजहबी और सियासी रंग देने की कोशिशें भी शुरू हो गई है। इसी को ध्यान में रख हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि रणनीति बनाना प्रशासन का काम है। कोई जनरल कट्टरपंथ को लेकर रणनीति तय नहीं कर सकता। वे इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने कहा आप किस-किस को डी-रैडिकलाइज़ करेंगे? जुनैद, तबरेज, पहलू के हत्यारे को कौन डी-रैडिकलाइज़ करेगा? ओवैसी का ऐसा कहना न केवल मजहबी कट्टरपंथ पर पर्दा डालने की कोशिश है, बल्कि मॉब लिंचिंग से जोड़कर इसे सामान्य घटना की तरह पेश करना भी है। ताकि आप पैर पसार रहे इस खतरे को लेकर निश्चिंत हो जाएँ।

यकीनन, हत्या अपराध है, चाहे वह चोरी करते हुए पकड़े गए तबरेज की ही क्यों न हो। सभ्य समाज में किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। लेकिन, तबरेज की हत्या की आड़ लेकर उन सैकड़ों-हजारों घटनाओं को दबाया नहीं जा सकता जब अल्लाहु अकबर का नाम लेते हुए कोई जुनैद दर्जनों लोगों के साथ खुद को उड़ा लेता है। जिसके नाम पर कोई कमलेश तिवारी का गला रेत जाता है। जिसके नाम पर संसद से लेकर स्कूली बच्चों के बसों तक को निशाना बनाया जाता है।

ये मजहबी कट्टरपंथ के सिलसिलेवार ट्रेनिंग से पैदा होता है। जनरल रावत ने भी कहा था, “यह स्कूलों, यूनिवर्सिटी, धार्मिक स्थलों हर जगह हो रहा है। ऐसे कुछ लोगों का समूह है, जो ये फैला रहे हैं। इस तरह के लोगों की पहचान कर दूसरे लोगों को धीरे-धीरे इनसे अलग करने की जरूरत है।” आखिर, 10 से 11 साल के बच्चे बिना किसी ट्रेनिंग के ‘जो हिटलर की चाल चलेगा, वो हिटलर की मौत मरेगा’ और ‘जामिया तेरे ख़ून से, इंकलाब आएगा’ जैसे नारे कैसे लगा सकते हैं? कोई बच्चा अपनों का इशारा पाए अनजान जलीस की ऊँगली भला क्यों थामेगा?

पुलिस और सेना आतंकवाद का सफाया कर सकती है। आतंकियों को उनके अंजाम तक पहुॅंचा सकती है। लेकिन, ये मजहबी कट्टरवाद तभी दफन होगा जब हम एक समाज के तौर पर इससे लड़ेंगे। तभी एक एमबीबीएस डॉक्टर जलीस अंसारी की पहचान डॉ बम से होनी रुकेगी। उनसे बच्चों को दूर करना होगा जो बचपन में कट्टरपंथ का बीज बोते हैं। यही बीज जब एएमयू पहुॅंचता है तो नारे हिंदुत्व से लेकर देश के प्रधानमंत्री की कब्र खोदने तक के में बदल जाता है। एक इंजीनियर जिहादी जॉन बन जाता है। इस खतरे से नहीं चेते तो आज का कोई अशफाक, मोइनुद्दीन आपके कमलेश का गला रेत जाएगा।

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