Monday, July 13, 2020
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फैज़ अहमद फैज़: उनकी नज़्म और वामपंथियों का फर्जी नैरेटिव ‘हम देखेंगे’

आजतक फैज़ द्वारा पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदुओं के समर्थन में किसी भी आन्दोलन के बारे में कोई खबर नहीं है। मुझे नहीं लगता कि फैज़ ने अल्पसंख्यक हिंदुओं की दुर्दशा को उजागर करते हुए कुछ भी, कभी भी, कहीं भी क्रांतिकारी लिखा हो।

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Rahul Roushanhttp://www.rahulroushan.com
A well known expert on nothing. Opinions totally personal. RTs, sometimes even my own tweets, not endorsement. #Sarcasm. As unbiased as any popular journalist.

फैज़ से मेरी मुलाकात लगभग 20 साल पहले हुई थी या यूँ कहिए मैंने फैज़ को वर्षों पहले, करीब 18-19 साल पहले खोजा था। मेरी पीढ़ी के और नवयुवको की तरह मैं भी उन दिनों संगीत और कविता में अपनी रुचि तलाश रहा था और इन सब का एक मात्र कारण थे जगजीत सिंह, जिनकी ग़ज़लों का चयन सरल और समझने में बेहद आसान था। इन ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने अपनी सहज गायन शैली और मखमली आवाज से और भी आसान बना दिया था। और शायद ऐसा हर किसी के साथ ही होता है इस पीढ़ी में कि ग़ज़लों को जानने, समझने की यात्रा जगजीत सिंह द्वारा आरंभ करने के बाद, आप गुलाम अली और मेहंदी हसन जैसे अन्य गायकों ढूँढना शुरू करते हैं, और अंत में, आप उन रचनाकारों तक भी पहुँच ही जाते हैं जिन्होंने उन सुंदर, ज्यादातर रोमांटिक, ग़ज़लों को लिखा था।

मुझे मेहंदी हसन की आवाज़ में “गुलों में रंग भरे” बेहद पसंद था, हालाँकि यह फ़ैज़ को जानने के लिए पर्याप्त नहीं था। जब मैंने फैज़ के बारे में आगे पढ़ना शुरू किया तो मेरे एक संगीत में रूचि रखने वाले मित्र ने मुझे बताया था कि प्रसिद्ध क्लासिक बॉलीवुड गीत “तेरी आँखों को सिवा दुनिया में रखा क्या है” असल में फैज़ द्वारा लिखित एक नज़्म से ली गई एक लाइन थी।

दोनों “गुलों में रंग भरे” (जिसे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ द्वारा लिखा गया है) और “तेरी आँखों के सिवा” (जिसे मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा लिखा गया है) संजीदा रोमांटिक कविताएँ हैं, लेकिन जब आप फ़ैज़ की नज़्म – “मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग” पढ़ते हैं, जिसके बाद वाली लाइन से मजरूह साहब प्रेरित हुए थे, वहाँ आपकी मुलाक़ात एक नए फैज़ से होती है या यूँ कहिए कि आप अपने सामने “क्रांतिकारी” कवि फैज़ को पाते हैं या आधुनिक भाषा में, ‘वोक’ फ़ैज़ , जी हाँ वही ‘वोक मानुस’ जिसे आप जागा हुआ इन्सान कह सकते हैं।

मुझे ये नए वाले जागे हुए ‘जागृत फैज़’ अधिक आकर्षक दिखाई दिए। मुझे उनकी ये नज़्म बेहद पसंद थी और मैं उसमें बसे हुए जूनून से प्यार करने लगा था। मुझे उनकी अन्य नज़्में भी पसंद थीं, जैसे “चंद रोज़ और मेरी जान”, “बोल के लब आज़ाद हैं तेरे, और फिर उनकी सबसे शानदार नज्म, ‘हम देखेंगे’ को मैं दिल से लगा कर रखता था। अगस्त 1947 में जब भारत और पाकिस्तान को आज़ादी के बाद विभाजन मिला, तो उन्होंने सुबह-ए-आज़ादी नाम से भी एक नज़्म लिखी थी जिसमें कहा गया था, “वो इंतज़ार था जिसका यह वो सहर तो नहीं” जो ये दर्शाता था कि धर्म के आधार पर विभाजन फैज़ को पसंद नहीं था।

मुझे मेरे एक मित्र ने बताया था कि फैज़ ज़िया के पाकिस्तान से खुश नहीं थे, और ज़िया द्वारा सैन्य तख्तापलट के माध्यम से सत्ता पर कब्जा करने के बाद वो भारत वापिस आने की फ़िराक में थे। हालाँकि बाद में, उन्होंने लेबनान को शरण के लिए चुना था क्योंकि उन्हें पता था कि अगर उन्होंने भारत में शरण ली तो उनके बाकी “क्रांतिकारी” कवियों या रिश्तेदारों को ज़िया शासन द्वारा तंग किया जा सकता था और फिर ऐसा भी माना जा सकता था कि, फैज़ भारत को, जो की पाकितान का जानी दुष्मन है, दिल ही दिल से चाहते थे।

ऐसी पृष्ठभूमि और इतिहास के साथ, जब आईआईटी कानपुर कैंपस में ‘हम देखेंगे‘ के गायन को लेकर विवाद खड़ा हुआ, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया “लिबरल्स” की तरह ही थी। मेरे दिमाग में सबसे पहले यही आया कि ये बात ठीक नहीं है और मैंने नूपुर, जो कि Opindia की संपादक हैं, को साफ़ साफ़ कहा था कि फैज़ या उनकी कविता को किसी इस्लामिक प्रोजेक्ट के रूप में चित्रित करके नुपुर अपने को हंसी का पात्र न बनाए। वो बात दीगर है कि मैं ट्विटर पर लगातार तथाकथित लिबरल्स के मज़े ले रहा था और क्यूँ न लेता एक वही तो मेरा फेवरिट टाइम पास है।

इतना होने बावजूद भी मैंने इस विषय पर कोई वीटो नहीं लगाया था। क्योंकि इससे पहले, बी एच यू विवाद के दौरान, जब कई राईट विन्गर्स छात्रों को मुस्लिम शिक्षक का कथित रूप से विरोध करने के लिए प्रेरित कर रहे थे, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि शायद छात्र कुछ ज्यादा ही ओवर रियेक्ट कर रहे हैं। दिल से कहूँ तो इस मुद्दे पर ऑपइंडिया की रिपोर्टिंग वास्तव में अच्छी थी और उस एक लेख ने मुझे अपना शुरुआती रुख बदलने पर मजबूर कर दिया था। मूल रूप से, मैं गलत साबित हुआ था, और जब आई आई टी वाला मामला सामने आया तो मैंने सोचा कि अगर मैं फैज़ के बारे में फिर से गलत हुआ तो क्या होगा?

और आज करीब दो सप्ताह के बाद, क्या अब मुझे लगता है कि मैं फैज़ के बारे में गलत था? क्या अब मुझे लगता है कि वह एक इस्लामवादी थे? अगर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो आईआईटी कानपुर में उस एक पैनल का गठन स्पष्ट रूप से यह तय करने के लिए किया गया था कि क्या फैज़ हिंदू विरोधी थे?

सबसे पहली बात तो ये कि वह फर्जी खबर है किआईआईटी कानपुर में पैनल का गठन उन प्रशासनिक मुद्दों की जाँच के लिए किया गया है जहाँ फैज़ की कविता पाठ का आयोजन किया गया था। सच ये है कि पैनल इस बात का विश्लेषण करेगा कि क्या इस आयोजन की उचित अनुमति ली गई थी या कुछ आयोजकों या प्रतिभागियों द्वारा नियमों की अवहेलना की गयी थी। और अगर कुछ तोड़ फोड़ या कुछ अनुशासनहीनता हुई भी थी तो उस  कुछ कार्रवाई करने की आवश्यकता है या नहीं, आदि इत्यादि।  इस पैनल का गठन फ़ैज़ या फैज़ की शायरी के मनोविश्लेषण के लिए तो कतई नहीं किया गया है।

आइए क्यों न हम वास्तव में “असली लिबरल” बने और लंबे समय से आयोजित मान्यताओं पर सवाल उठाना शुरू करें? यही तो होती है सच्चे लिबरल की पहचान?  क्यूँ नहीं हम फैज़ के बारे में उनकी शायरी से आगे जाने की कोशिश करें?

क्या थी फैज़ की राजनीति?

शुरुआत से ही फैज़ को एक खालिस मार्क्सवादी और गहन वामपंथी कवि माना जाता रहा है जिसे ‘लेनिन शांति पुरस्कार’ से नवाज़ा गया था। जी हाँ ये वही पुरस्कार है जिसे सोवियत रूस, जो कि उन दिनों एक साम्यवादी महाशक्ति था, द्वारा फैज़ को प्रदान किया गया था। असल में हम भारतीय, भारतीय मार्क्सवादियों और वामपंथियों को उनकी विचारधारा और प्रोपेगेंडा के कारण आमतौर पर हिन्दू विरोधी ही मानते हैं। फैज़ को वामपंथी मानने के बाद आमतौर पर ऐसा ही मान जाएगा कि फ़ैज़ हिंदू विरोधी थे, क्योंकि भारत में कम्युनिस्ट वास्तव में हिंदू विरोधी ही होते हैं। लेकिन देखने वाली बात ये है जनाब कि फ़ैज़ पाकिस्तानी सेटअप में वामपंथी थे, भारतीय सेटअप में नहीं तो इसका मतल तो उल्टा ही निकालता है न? लेकिन अगर सच कहें तो वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह साबित कर सके कि फैज़ हिंदू विरोधी थे।

देखा जाए तो वामपंथी रुल के मुताबिक इस्लामी समाज में तो एक वामपंथी को हिंदुओं के प्रति सहानुभूति ही होनी चाहिए, क्योंकि हिन्दू वहाँ के हाशिए पर हैं और उत्पीड़ित समुदाय हैं। उदाहरण के लिए पाकिस्तान में जन्मे लेखक और कमेंटेटर तारिक फतह को ले लीजिए। फतह एक पाकिस्तानी सेटअप में वामपंथी है और वह हिंदू विरोधी नहीं है। यहाँ तक कि आज जब  “तथाकथित भारतीय धर्मनिरपेक्ष सेक्युलर गैंग”  नागरिक संशोधन बिल के खिलाफ सड़कों पर दंगे कर रहा है, वहाँ पाकिस्तान में कई वामपंथी कार्यकर्ता और पत्रकार पाकिस्तानी हिंदुओं की दुर्दशा को उजागर कर रहे हैं।

सच कहूँ तो मुझे आजतक फैज़ द्वारा पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदुओं के समर्थन में किसी भी आन्दोलन के बारे में कोई खबर नहीं है। मुझे नहीं लगता कि फैज़ ने अल्पसंख्यक हिंदुओं की दुर्दशा को उजागर करते हुए कुछ भी, कभी भी, कहीं भी क्रांतिकारी लिखा हो। आप मुझे अगर गलत साबित कर दें तो मुझे बेहद खुशी होगी, लेकिन “महान-क्रांतिकारी” फैज़ इस मामले में थोड़े नहीं, बेहद कमज़ोर नज़र आते हैं। चलिए एक पल के लिए हिंदुओं को भूल जाते हैं , किन्तु एक मुस्लिम संप्रदाय अहमदिया के समर्थन में भी फैज द्वारा कभी कुछ नहीं किया गया। मान लेते हैं कि कविताओं के लिए उनकी स्याही सूख गयी होगी लेकिन कम से कम कोई एक अवार्ड तो लौटाया ही जा सकता था या एक छोटे-मोटे धरने पर तो बैठा ही जा सकता था लेकिन अफ़सोस कि आपको इतिहास के किसी भी पन्ने पर ऐसा कुछ नहीं मिलेगा।

माना ये जाता है कि अहमदिया संप्रदाय को सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक द्वारा गैर-मुस्लिम घोषित किया गया था जबकि सच ये है कि ये कारनामा वास्तव में जुल्फिकार अली भुट्टो की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार द्वारा किया गया था। ये भुट्टो ही थे जिन्होंने ने 1974 में एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से अहमदियों को गैर-मुस्लिम घोषित किया था। और फिर सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक ने 10 साल बाद एक अध्यादेश के माध्यम से संवैधानिक संशोधन कर अहमदियों के जीवन को बद से बदतर बना दिया। असली पाप के हक़दार तो जनाब ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो थे और ये जानकार आपके पैरों तले ज़मीन सरक जाएगी कि महान क्रन्तिकारी और वामपंथी विचारधारा वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ असल में इन्ही भुट्टो के ख़ास सहयोगी थे। फैज़ काफी समय तक भुट्टो सरकार में विभिन्न मंत्रालयों में सलाहकार और वरिष्ठ भूमिकाओं में काम करते रहे लेकिन भुट्टो ने अहमदियों के साथ जो किया उसका विरोध करने के लिए उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया।

एक क्रांतिकारी कवि को कम से कम ऐसा तो करना चाहिए था कि नहीं?

अल्पसंख्यकों के विरुद्ध पाकिस्तान सरकार द्वारा किसी भी कार्रवाई में फैज़ की कोई भी सक्रियता आपको कहीं भी नहीं दिखाई देगी। उस दौरान भी नहीं जब पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में भयानक जनसंहार कर डाला था। 2018 में प्रकाशित द हिंदू के एक लेख में तर्क दिया गया है कि फ़ैज़ युद्ध में इस तरह से सक्रिय थे, इस तरह से योगदान दे रहे थे कि उन्होंने  “पाकिस्तानी सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए ‘देशभक्ति’ कविताएँ लिखने से इनकार कर दिया था। हद ही है, आप किसी को इतना कैसे संदेह का लाभ दे सकते हैं? असल में क्रांतिकारी कारनामा तो वो होता जब फैज़ वास्तव में सेना के अन्याय के खिलाफ कविताएँ लिख रहे होते जो कि भले ही आपकी अपनी सेना द्वारा किया गया हो।

फैज़ के “जागृत” प्रशंसको को इस बात से कभी तकलीफ नहीं होती है कि फैज़ ने भारतीय सेना के बारे में क्या-क्या नहीं लिखा है लेकिन वो उस बात से खुश होते हैं कि लाखों लोगों को मारने और बलात्कार करने वाली सेना पर फैज़ ने कुछ नहीं लिखा। उनकी एक “ना” उनको एक क्रांतिकारी बना देती है जबकि असल में वो एक डरे हुए कवि थे जो “हाँ” कहने में डर गए थे ।

आप पाएँगे कि फ़ैज़ की सारी क्रांति ज़िया-उल-हक़ के विरोध से शुरू होती हैं और वहीं खत्म हो जाती है। इसके पीछे भी उनका स्वार्थ ही कहा जा सकता है क्योंकि ज़िया ने फ़ैज़ के एक दोस्त और अन्नदाता भुट्टो को सत्ता से बाहर कर दिया था। यदि फैज़ इस्लामवाद के विरोधी थे, तो उन्हें अपने मित्र भुट्टो को अहमदियों के खिलाफ कानून के लिए विरोध करना चाहिए था और यदि वे सत्ताधारी पार्टी का विरोध करते थे, तो उन्हें तब विरोध करना चाहिए था जब पूर्वी पाकिस्तान में लोगों के साथ भयानक अत्याचार किया जा रहा था। आज तक मुझे इन दोनों मोर्चों पर उनके द्वारा सक्रिय या मुखर विरोध का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है और रही पाकिस्तान के हिंदुओं के लिए किया गया उनका कोई भी आन्दोलन तो उसको तो आप भूल ही जाइए।

इन सब कारिस्तानियों के बाद भी फ़ैज़ को हिंदू विरोधी नहीं कह सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा उन पर ये आरोप लगाया जा सकता है कि वो पाकिस्तान में हिन्दुओं की हो रही दुर्दशा की तरफ आँख मूँदे रहे लेकिन आज लोग “हम देखेंगे” का विरोध इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि ये गीत उन सभी रूपकों का प्रयोग करता है जिसमें इस्लाम की मूर्तिपूजा के खिलाफ मान्यताओं को एक बल मिलता है जिसे वो एक क्रांति मानते है।

कवि की कविता का रिश्ता क्या?

ऐसा माना जाता है कि कोई भी कविता एक समय गुज़र जाने के साथ कवि के नाम से स्वतंत्र हो जाती है। और यही वो बात है जो ये लोग नहीं जानते जो फैज़ को न जानने के “अनपढ़ संघियों” पर ताना मार रहे हैं। और फिर ये भी वही लोग हैं जो भारतीयों द्वारा अल्लामा इकबाल की कविता को अपनाने को सही ठहराते हैं, भले ही इकबाल एक कट्टर इस्लामवादी थे और पाकिस्तान के निर्माण की दिशा में काम करने वाले एक प्रमुख व्यक्ति थे।

जनाब इक़बाल वही थे जिनकी शुरुआत हुई थी “हिंदी है हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा” और पकिस्तान पहुँचते  पहुँचते ये बदल कर हो गयी थी  “मुस्लिम है हम, वतन है सारा जहाँ हमारा” लेकिन इस कारण ये कविता अर्थहीन नहीं हो जाती है। ये उन सभी द्वारा गाई जाती है जो इस कविता के मायने और इस कविता की भावना से सरोकार रखते हैं।

1994 की Il Postino (द पोस्टमैन) नामक एक इतालवी भाषा की फिल्म थी जिसका एक संवाद है जो इस मान्यता को कि “एक कविता एक समय गुज़र जाने के साथ कवि के नाम से स्वतंत्र हो जाती है” खूबसूरती से व्यक्त करता है। फिल्म एक काल्पनिक कहानी है जहाँ एक युवा डाकिया कवि पाब्लो नेरुदा से नियमित रूप से मिलता है और उनकी कविता से प्रभावित हो जाता है। बाद में वही डाकिया एक स्थानीय लड़की, जिससे वह प्यार करता है और शादी करना चाहता है, को प्रभावित करने के लिए नेरुदा की कुछ कविताओं को अपने नाम से उसे भेंट करता है। जब नेरूदा को इसका पता चलता है तो वे डाकिया से नारजगी ज़ाहिर करते हैं। जवान डाकिया यह कहते हुए अपने काम को सही ठहराता है कि “कविता उन लोगों की नहीं है जो इसे लिखते हैं, यह उन लोगों के हैं जिन्हें इसकी आवश्यकता है।”

बात में तो दम है क्यूंकि जब इक़बाल कहते हैं, “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” तो ये एक लाइन अब सिर्फ इकबाल की नहीं रह जाती है, क्योंकि वो बाद में फैज़ का चरित्र उस रूप में परिवर्तित हो गया था जिसे हिंदुस्तान के अस्तित्व की परवाह ही नहीं थी है। आज उन्ही इकबाल की ये एक छोटी सी लाइन कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” हर एक भारतीय को आश्वासन देती है कि उनका देश सभी बाधाओं के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखेगा।

अगर देखा जाए तो इस्लामवादी इकबाल के शब्दों का इस्तेमाल एक “संघी” द्वारा खुद को आश्वस्त करने के लिए किया जा सकता है कि हिंदुस्तान, हिन्दुओं की जन्मभूमि, आज भी जिंदा है जबकि समकालीन सभ्यताएं लुप्त हो गई हैं। और वहीं दूसरी तरफ, एक ’क्रांतिकारी’ फैज़ के शब्दों का उपयोग इस्लामवादी खुद को राहत देने के लिए कर सकते हैं कि ग़ज़वा-ए-हिंद बस होने ही वाला है।

फैज़ के “देखेंगे” में इस्तेमाल किए गए शब्द, मूर्तिपूजा के विरोध में इस्लाम की प्रचलित मान्यताओं के रूपक मात्र हैं और काबा में पूर्व-इस्लामिक मूर्तियों के नष्ट होने और अल्लाह के वर्चस्व की स्थापना की कल्पना का परिवेश पैदा करते हैं।

लेकिन जनाब अब ज़रा ये बताइए कि “वे” शब्द नागरिक संशोधन कानून के विरोध में कैसे उपयुक्त हो सकते हैं? याद है ना आपको कि इस तरह के विरोध प्रदर्शनों में जो भीड़ देखी गई थी वो क्या नारे लगा रही थी?

ये नारे थे ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या, ला इलाही इल्लल्लाह’ और ‘काफिरों से आजादी’ और साथ में अगर आपको याद हो तो पटना में भगवान हनुमान की एक मूर्ति को नष्ट भी कर दिया गया था।

अब आप यह तर्क दे सकते है कि यह कविता आईआईटी कानपुर में पढ़ी गई थी, जहाँ भीड़ ने इस तरह के नारे नहीं लगाए थे। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इन दिनों अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल (APSC) जैसे गैंग इन संस्थानों में पैर जमा रहे हैं। वे रामायण महोत्सव मनाने जैसी घटनाओं का विरोध सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये उनकी भावनाओं के लिए अपमानजनक है बावजूद इसके कि जो लोग महोत्सव मना रहे हैं वो इन से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं।

दशानन दहन भी बुराई पर अच्छाई की जीत का रूपक है और इसे काबा से हटाई जा रही मूर्तियों के रूपक के समान माना जा सकता है। लेकिन APSC जैसे समूह इस विचारधारा का विरोध करते हैं। उनके विचार में, रावण एक द्रविड़ / दलित राजा था और उसका जलाया जाना बुराई पर अच्छाई की जीत नहीं बल्कि आर्यों / उच्च जातियों के दलित और पिछड़ी जातियों पर वर्चस्व के बारे में है और फिर वे क्या करते हैं? वे इस विरोध में राम का पुतला जलाते हैं। उनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रावण के पतन का जश्न मनाने वाले लोग उसे द्रविड़ या दलित जैसा कुछ नहीं मानते हैं, बल्कि उसे सिर्फ और सिर्फ एक खलनायक के रूप में देखते हैं।

इस सार्वभौमिक धार्मिक विचारधारा के विरोध का पूरा समर्थन लिब्रल्स और “जागृत” पीढ़ी करती है। इन्हीं बे सिर-पैर के तर्कों के सहारे जेएनयू जैसे परिसरों में महिषासुर की पूजा का आयोजन किया जाता है और दुर्गा पूजा का विरोध किया जाता है और हमारे तथाकथित लिबरल्स इसे “वैकल्पिक इतिहास” का नाम देते है। उनका ये समर्थन इस “वैकल्पिक इतिहास” को एक सामान्य घटना दिखाने के लिए किया जाता है बिना ये जाने हुए कि ऐसा करने से उन भावनाओं का क्या होगा जो महोत्सवों के विरोध में हुई घटनाओ से क्षुब्द हैं।

और फिर अगर ऐसा ही है तो फैज़ की शायरी का विरोध करने वालों को इस बात की परवाह क्यों कर होनी चाहिए कि इस कविता का मतलब क्या है या फैज़ उन लोगों का कौन था जो इस कार्यक्रम का आयोजन कर रहे थे?

सिर्फ मूर्तियों को नष्ट किए जाने की कल्पना मात्र और केवल अल्लाह का नाम ही इस दुनिया में रहना चाहिए, ये सोच मात्र ही इस कविता का विरोध करने के लिए काफी होना चाहिए ना? या फिर लिबरल्स को ये लगता है कि उनकी भावनाएँ दूसरों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं?

यह बेहद दुखद है कि फैज़ को इस सब में घसीटा गया है, लेकिन जान लीजिए कि यह फैज़ के खिलाफ लड़ाई नहीं है। यह एक पुरानी उलझी हुई कट्टर परम्परा के खिलाफ लड़ाई है, जो माँग करती है कि ‘जहिल’ लोगों को पूरी तरह से सर झुका कर मानना होगा कि वो क्या पढ़ें, क्या सोचे, बिना आज्ञा के कोई कार्य न करें, और इन सब बातों के खिलाफ कभी आवाज़ ना उठाएँ।

लेकिन उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि जाहिलों ने अब मन बना लिया है और बोलने का फैसला किया है और उनके “लब भी आज़ाद हैं”। उन्होंने अब दीवार से पीठ सटा कर खड़े होने से इनकार कर दिया है और पत्थर का जवाब चट्टान से देने का ठान लिया है। उन्हें अब अपनी ‘जाहिलियत‘ पर शर्म नहीं आती या फैज़ के शब्दों में कहें तो जाहिलों ने ऐलान कर दिया है कि:

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

नोट: राहुल रौशन द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस लेख का अनुवाद मनीष श्रीवास्तव द्वारा किया गया है।

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