उत्तराखंड की यूनिवर्सिटी में धरना: छात्र अभी भी पढ़ रहे शीत युद्ध, रूस उनके लिए है महाशक्ति

इस बार उत्तराखंड के ही रमेश पोखरियाल निशंक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पदभार संभाल रहे हैं, क्या वो इस किताब क्रांति को आधार बनाकर सारे उत्तराखंड के लिए कोई ऐसा ठोस कदम उठा सकते हैं कि आने वाली पीढ़ियों के शब्दकोश में 'पहाड़ यानी अभाव' जैसे जुमले गायब हो सकें?

"और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे"

ये पंक्तियाँ क्रांति के कवि कहे जाने वाले मशहूर कवि अवतार सिंह संधू “पाश” की लिखी हुई हैं। उत्तराखंड के एक विश्वविद्यालय में धरने पर बैठे छात्रों की माँगों को देखकर पाश को याद करना जरूरी है। हमने आज तक पानी, जमीन, रोजगार आदि-आदि के लिए लोगों को संघर्ष करते सुना और देखा है। लेकिन, आन्दोलनों और शहादतों से बने इस उत्तराखंड राज्य के ये छात्र जिसकी माँग कर रहे हैं, वह ‘किताब क्रांति‘ है।

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक यूनिवर्सिटी के छात्र पिछले 22 दिनों से लगातार धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार शिक्षा के नाम पर बजट में बात कर रही है। ऐसे में यह भी स्पष्ट होता है कि भारत देश में घोषणाओं और हक़ीक़त के बीच कितना बड़ा फासला है। ख़ास बात यह है कि यह आंदोलन ऐसे समय में जन्म ले रहा है, जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्राथमिकता उत्तराखंड को ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ बनाने की है।

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यह भी सच्चाई है कि संसाधन विहीनता उत्तराखंड का पर्याय है। लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह संसाधन विहीनता उत्तराखंड के नेताओं और प्रशासन के लिए एक ढाल और आसान विकल्प तैयार करने लगी हो!

शिवम पांडे पीएचडी की तैयारी कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, शिवम पांडे बताते हैं –

“उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में पिछले 22 दिनों से कॉलेज के छात्र धरने पर बैठे हुए हैं। 17 जून से धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी छात्र गाँधीवादी तरीके से पढ़ने के लिए पुस्तकें और पढ़ाने के लिए पर्याप्त टीचरों की माँग कर रहे हैं। कुमायूँ विश्वविद्यालय के इस दूसरे सबसे बड़े कॉलेज की लाइब्रेरी में नई पुस्तकों के साथ पर्याप्त शिक्षको की कमी है। वर्तमान में यहाँ पर छात्र 90 के दशक की पुस्तकों को पढ़ने के लिए मजबूर हैं, तो वहीं शिक्षको की कमी से भी जूझ रहे हैं।”

वहीं, धरने पर बैठे राजनीति विज्ञान के छात्र मोहित का कहना है –

“हमारे पास पर्याप्त किताबें नही हैं। हमें एक या दो ही पुस्तकें मिल पाती हैं। इस बार हमें जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पुस्तक मिली है, उसमें शीत युद्ध अपने चरम पर है। सोवियत संघ का विघटन हुआ ही नहीं है और बर्लिन की दीवार अभी गिरी नही है। मैं पिछले 3-4 साल से इसी स्थिति में पढ़ता आ रहा हूँ। मैं इस आंदोलन में इसलिए बैठा हूँ कि मेरा आने वाला भविष्य खराब न हो।”

पिछले 22 दिनों से पिथौरागढ़ महाविद्यालय के छात्र पुस्तकों और शिक्षकों के लिए सड़क पर हैं। पोस्टर और बैनरों की मदद से आम लोगों तक अपनी बातें पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। आम लोगों के जेहन में ये बात पहुँचाने की कोशिश की जा रही है कि एक आवाज बनकर ही बदलाव लाया जा सकता है।

कुछ दिन पहले इन छात्रों ने एक मौन आन्दोलन शुरू किया, एक बैनर पर एक नारा था, “उम्मीद है, इसलिए चुप हैं।” इस उम्मीद का ये बाईसवाँ दिन है। विश्वविद्यालय के से लेकर सरकारी तंत्र भी इस विषय पर मौन है। छात्रों के साथ-साथ अब अभिभावक भी इस आंदोलन का हिस्सा बन चुके हैं।

इसी विश्वविद्यालय की एक छात्रा का कहना है कि यह कॉलेज कुमायूँ यूनिवर्सिटी का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा कॉलेज है। यहाँ पुस्तकों के अलावा शिक्षको की भी भारी कमी है। 40 से भी कम शिक्षक हैं जिससे न तो सही ढंग से क्लास लग पा रही हैं और न ही कोर्स कम्प्लीट हो पा रहे हैं। कई-कई विभाग तो ऐसे हैं, जिसमें एक या दो टीचर पूरे डिपार्टमेंट को संभाले हुए हैं। पुस्तकालय की हालत ऐसी है कि वहाँ पर 3 साल हो गए सेमेस्टर सिस्टम को लगे हुए लेकिन अभी तक सेमेस्टर सिस्टम की किताबें नहीं आई हैं।

छात्रों का कहना है कि वो अभी 90 के दशक की पुस्तकें पढ़ रहे हैं जो अधूरी हैं। कॉलेज में प्रयोगशाला की हालत इतनी खराब है कि विज्ञान जैसे विषय भी किताबी ज्ञान पर चल रहे हैं और अधिकतर छात्र-छात्राओं को किताबें भी उपलब्ध नहीं हो पातीं।

उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था यूँ तो हमेशा से ही बदहाल रही है और इसके लिए जिम्मेदार यहाँ की भौगौलिक स्थिति को ठहराया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह लगातार बनी हुई बदहाली सिर्फ और सिर्फ नकारा शासन और प्रशासन की कमजोर इच्छाशक्ति का नतीजा है। उत्तराखंड में यह एकमात्र ऐसी यूनिवर्सिटी नहीं है जो संसाधन विहीन है और जिसमें सुधार की आवश्यकता है, बल्कि लगभग हर दूसरे शिक्षा के केंद्र का यही हाल है।

बात चाहे प्राथमिक विद्यालय की हो, या फिर विश्वविद्यालय की हो, कमजोर इच्छाशक्ति के लोग और शासन की प्राथमिकताओं के कारण उत्तराखंड के छात्रों की कई पीढ़ियाँ इसका परिणाम भुगत चुकी हैं और पिथौरागढ़ में चल रहा यह आंदोलन इस बात का सबूत है कि आगामी भविष्य भी अन्धकार में ही कटने वाला है। इस सबके बीच यह सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात है कि उत्तराखंड राज्य लगातार 2 लोकसभा चुनाव में 5 की 5 लोकसभा सीटें भाजपा के नाम करता आया है।

“ना किताब हैं, ना मास्साब हैं, तो फिर क्या हैं?” स्थानीय कुमाउँनी बोली में लिखा गया एक पोस्टर
“हम लड़ते आए हैं जवानों, हम लड़ते रहेंगे”

इस बार उत्तराखंड के ही रमेश पोखरियाल निशंक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पदभार संभाल रहे हैं, क्या वो इस किताब क्रांति को आधार बनाकर सारे उत्तराखंड के लिए कोई ऐसा ठोस कदम उठा सकते हैं कि आने वाली पीढ़ियों के शब्दकोश में ‘पहाड़ यानी अभाव’ जैसे जुमले गायब हो सकें?

फिलहाल, यह आंदोलन जारी है और छात्र अपने शिक्षक-पुस्तक की माँग पर डटकर खड़े हैं। देखना यह है कि शासन-प्रशासन मिलकर उत्तराखंड राज्य के इस विश्वविद्यालय के साथ-साथ पूरे राज्य की शिक्षा व्यवस्था के लिए क्या प्रयास कर सकते हैं।

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