Friday, May 14, 2021
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जिस नेता ने सबसे ज़्यादा जहरीली बयानबाजी की उसे ही बीजेपी के विरोध में ‘अल्पसंख्यकों का मसीहा’ बनाने में जुटे ‘वामपंथी’ मीडिया संस्थान

सीमांचल में हासिल हुई ओवैसी की इस सफलता के बाद आगामी चुनावों को लेकर चर्चाओं अटकलों और समीकरणों का बाज़ार गर्म है। चुनावी पंडित, राजनीतिक पंडित और थिंक टैंक के अतिरिक्त देश के तमाम 'स्वघोषित प्रबुद्ध' वामपंथी मीडिया संस्थान आगामी चुनावों में ओवैसी की पार्टी के लिए राजनीतिक आयाम तलाशना शुरू कर चुके हैं।

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को बिहार विधानसभा चुनावों में 5 सीटें हासिल हुई हैं। एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल (ध्रुवीकरण में कुशल) के लिए इतनी सीटें सियासत की ज़मीन पर आह्लादित होने के लिए पर्याप्त हैं। सीमांचल में हासिल हुई इस सफलता के बाद आगामी चुनावों को लेकर चर्चाओं अटकलों और समीकरणों का बाज़ार गर्म है। चुनावी पंडित, राजनीतिक पंडित और थिंक टैंक के अतिरिक्त देश के तमाम ‘स्वघोषित प्रबुद्ध’ वामपंथी मीडिया संस्थान आगामी चुनावों में ओवैसी की पार्टी के लिए राजनीतिक आयाम तलाशना शुरू कर चुके हैं। 

इस सूची में तमाम ऐसे मीडिया संस्थान हैं जिनके अनुसार ओवैसी अल्पसंख्यक समुदाय की आवाज़ बन सकते हैं। कहाँ और कैसे बन सकते हैं? इसका जवाब है, पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करके बन सकते हैं, पूरा जवाब जानना हो तो क्विंट की यह रिपोर्ट पढ़िए जिसमें ओवैसी के हिस्से में बनने वाली हर संभावना की ढपली पीटी गई है। वो भी संभवतः सिर्फ इसलिए कि बीजेपी के विरोध का झंडा बुलंद रखना है।

भले चुनाव के बाद नतीजा ढाक के तीन पात रहे। लेकिन वामपंथी न्यूज़ प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द क्विंट’ ही नहीं बल्कि इन भिन्न-भिन्न मीडिया संस्थानों (द वीक, इंडियन एक्सप्रेस, स्क्रॉल, द प्रिंट) की रिपोर्ट पढ़िए। एक राज्य के चुनाव में 5 विधानसभा सीटें जीतने पर शायद ही किसी राजनीतिक दल को इतनी अहमियत मिली है।

लेकिन उल्लेखनीय बातें यह भी नहीं हैं। उल्लेखनीय यह है कि जिस तथाकथित अल्पसंख्यक हितैषी नेता को अल्पसंख्यक समुदाय का मुखमंडल बनाया जाने की कवायद पूरे सामाजिक राजनीतिक सामर्थ्य से की जा रही है, उसकी मानसिकता और मानसिकता से उपजी बयानबाजी का स्वरूप कैसा है। पिछले कुछ महीनों में असदुद्दीन ओवैसी के कुछ बयानों को देखते और समझते हैं कि जिस नेता के लिए इस कदर माहौल बनाया जा रहा है उसकी विचारधारा असल मायनों में है क्या?   

हाल ही में इंडिया टुडे को बीते चुनावों को लेकर हो रही चर्चा के दौरान असदुद्दीन ओवैसी ने एक बयान दिया था। ओवैसी ने कहा था कि आज भाजपा सत्ता में है, तो इसका कारण कॉन्ग्रेस ही है। उन्होंने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व को ‘नपुंसक’ करार दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को संबोधित करते हुए कहा था कि आपकी पार्टी का नेतृत्व नरेंद्र मोदी से लड़ने में अक्षम है, इसीलिए भाजपा आज सत्ता में है। उन्होंने कहा कि जब तक वो ज़िंदा हैं, चुनाव लड़ते रहेंगे और सेक्युलरिज्म को ज़िंदा रखेंगे। 

यह तो भाषा की बात हुई, असदुद्दीन ओवैसी के बयानों में सांप्रदायिकता की सूरत भी बेहद मज़बूत रहती है। बिहार विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण के प्रचार के दौरान उन्होंने बयान दिया था, “असदुद्दीन ओवैसी बिहार का तो नहीं है, मगर ये पूरा भारत असदुद्ददीन ओवैसी के बाप की मिल्कियत है। कैसे है? हमारे अब्बा, आपके अब्बा, उनके अब्बा, उनके अब्बा के अब्बा जब दुनिया में कदम रखे, तो भारत में रखे थे कदम। तो ये हमारे अब्बा की जमीन हुई और किसी माई के लाल में ताकत नहीं है कि हमको हमारी अब्बा की जमीन पर घुसपैठी करार दे। ये अब्बा की जमीन है और अब्बा की जायदाद में बेटी और बेटे का हिस्सा मिलेगा।”

हाल ही में राम मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री ने अयोध्या में भूमि पूजन किया था। इस मुद्दे पर भी असदुद्दीन ओवैसी की सांप्रदायिकता संगत बयानबाजी जारी थी। ट्वीट करते हुए ओवैसी ने लिखा था, “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। इशांअल्लाह।” इस ट्वीट के साथ ओवैसी ने दो तस्वीरें भी शेयर की थी। एक तस्वीर में मस्जिद खड़ा नजर आ रहा है और दूसरे में उसके विध्वंस की घटना है।

इसी तरह सीएए और एनआरसी विरोध प्रदर्शन के दौरान हैदराबाद सांसद ने इतनी टिप्पणियाँ की थीं जिनकी गिनती नहीं लेकिन मजाल है किसी टिप्पणी में जहर की मात्रा से समझौता किया हो। ऐसी ही एक टिप्पणी थी, “जो मोदी-शाह के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगा वो सही मायने में मर्द-ए-मुजाहिद कह लाएगा। मैं वतन में रहूँगा, पर कागज नहीं दिखाऊँगा। कागज अग़र दिखाने की बात होगी, तो सीना दिखाएँगे कि मार गोली। मार दिल पे गोली मार, क्योंकि दिल में भारत की मोहब्बत है।”

अब पूछिए प्रश्न, अल्पसंख्यक समाज की अगुवाई का मुकुट करना चाहिए इनके नाम? या पहले अल्पसंख्यक हित के मुखौटे के पीछे छुपे असल राजनीतिक चेहरे को परखा जाए। देश का हर नेता राजनीति के रास्ते पर चलते हुए आम नागरिकों को बहुत कुछ देता है, जब कभी ‘असदुद्दीन ओवैसी ने क्या दिया’ इस पर चर्चा होगी, तब इनके बारे में क्या कहा जाएगा। भले एक नेता हर विमर्श में अल्पसंख्यकों के विमर्श को आगे रख देता है लेकिन उसकी कीमत क्या है? अगले साल पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव हैं, उस पर भी नज़र बनाए रखियेगा। ऐसे बयान शायद ही थमेंगे।            

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