Homeराजनीति'बिहार में नपुंसक सरकारें थीं': 'ग्राम रक्षा दल' बना डाकुओं का सफाया करने वाले...

‘बिहार में नपुंसक सरकारें थीं’: ‘ग्राम रक्षा दल’ बना डाकुओं का सफाया करने वाले बद्री नारायण पांडे से सुनिए जंगलराज की कहानी, कहा- DM का ‘मिनी चंबल’ कहना अखर गया

साल 1990 से 2002 तक यह सशस्त्र संघर्ष चला। इस दौरान ग्राम रक्षा दल ने मशीन गन, स्टेन गन जैसे हथियार छीने और उन्हें सरकार को सौंपा। उनके पास एक समय में 16,000 हथियार थे, जिनमें 9,500 लाइसेंसी थे।

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में आज अगर आप शाम को सड़क पर घूमें, तो लगेगा जैसे कोई शांत गाँव हो। लेकिन दो-तीन दशक पहले ये इलाका ‘मिनी चंबल’ कहलाता था। डाकुओं का राज था, जहाँ शाम पाँच बजे के बाद घर से निकलना मौत को न्योता देना था। अपहरण, लूट, हत्या और नरसंहार रोज की बात थी। लालू यादव के जंगलराज में ये सब चरम पर था।

लेकिन एक साधारण फौजी बद्री नरायन पांडे ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने ग्राम रक्षा दल बनाया, जो न सिर्फ चंपारण को डाकुओं से आजाद करा गया, बल्कि पूरे देश में स्वयंरक्षा की मिसाल बन गया। छत्तीसगढ़ के सलवा जुडूम से लेकर जम्मू-कश्मीर के गाँव रक्षा दलों तक पांडे की ये कहानी आज भी प्रेरित कर रही है।

बद्री नरायन पांडे ने ऑपइंडिया के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि ये सब कैसे शुरू हुआ। लेकिन पहले आइए, उस काले दौर को समझें- जब बिहार जंगलराज का शिकार था। 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सरकार में अपराध आसमान छू रहा था। आँकड़े झकझोर देने वाले हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौर में 32,000 से ज्यादा अपहरण हुए, 18,000 हत्याएँ हुईं और 59 बड़े नरसंहार हुए। पटना हाईकोर्ट ने 1997 में इसे आधिकारिक तौर पर ‘जंगलराज‘ करार दिया।

बिहार में जंगलराज का दौर और मिनी चंबल का खौफ

1990 का दशक बिहार के लिए अंधेरे का दौर था। उस समय लालू प्रसाद यादव की सरकार थी और बिहार में जंगलराज शब्द आम हो चुका था। पश्चिम चंपारण का बगहा क्षेत्र, जिसे लोग ‘मिनी चंबल’ कहते थे, डकैतों के आतंक का गढ़ बन चुका था। शाम 5 बजे के बाद लोग घरों से बाहर निकलने से डरते थे। अपहरण, लूट, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ रोजमर्रा की बात थीं। स्कूल-कॉलेज बंद हो गए थे, व्यापारी बाजार नहीं जाते थे और किसान अपने खेतों में जाने से कतराते थे। इस क्षेत्र में डकैतों का ऐसा खौफ था कि लोग अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं थे।

ऐसे ही जंगलराज का सबसे क्रूर चेहरा था 14 दिसंबर 1994 का नरकटिया नरसंहार। रामनगर प्रखंड के नरकटिया भुअरवा गाँव में डाकुओं ने 15 ग्रामीणों को बेरहमी से मार डाला। सशस्त्र डकैतों ने एक ही रात में गौरी शंकर महतो, जय राम महतो, रामविलास महतो, विश्राम महतो, धर्मराज महतो, भिखारी महतो, छेदी महतो, रौशन महतो, रोगाही महतो, नरसिंह महतो, भुवनेश्वर महतो, रुदल महतो, बलिराम महतो, सदाकत मियाँ और पांडू मुंडा समेत एक दर्जन से अधिक ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी।

इस नरसंहार ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी। राधा यादव, रामचंद्र मल्लाह, अलाउद्दीन मियाँ, चुम्मन यादव, राजेंद्र चौधरी, किशोरी नुनियाँ, पत्थर चौहान और नेमा यादव जैसे कुख्यात डकैतों के गिरोह इस इलाके में आतंक का पर्याय बन चुके थे।

जंगलराज यानी लालू के शासन में अपराध का बोलबाला

लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल में बिहार में अपराध और राजनीति का गठजोड़ चरम पर था। पश्चिम चंपारण में डकैतों का ऐसा दबदबा था कि वे अपने दरबार लगाते थे, जहाँ राजनेता अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए माथा टेकने आते थे। डकैतों के सरगना जैसे भगड़ यादव, लच्छन यादव, बंसी यादव, हरिहर यादव, लालू यादव और सुरेश गोड न केवल अपराध करते थे, बल्कि स्थानीय राजनीति में भी दखल रखते थे। पुलिस और प्रशासन का इन पर कोई नियंत्रण नहीं था। सरकार की नाकामी के चलते आम लोग असहाय थे। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे और माता-पिता हर पल उनकी सलामती की दुआ माँगते थे।

इसी दौर में पश्चिम चंपारण के डीएम ने इस क्षेत्र को ‘मिनी चंबल’ घोषित कर दिया था। जज तक को गोली मार दी जाती थी। 1986 में पुलिस ने ‘ऑपरेशन ब्लैक पैंथर’ शुरू किया, लेकिन यह भी नाकाम रहा। डकैतों का आतंक कम होने का नाम नहीं ले रहा था। ऐसे में आम लोगों ने हिम्मत जुटाई और अपने स्तर पर इस आतंक से लड़ने का फैसला किया।

बद्री नारायण पांडे ने की ग्राम रक्षा दल की शुरुआत

इस भयावह माहौल में एक साधारण व्यक्ति बद्री नारायण पांडे ने समाज को डकैतों के आतंक से मुक्त करने की ठानी। सेना के मेडिकल कोर से रिटायर्ड क्लर्क पांडे अपने गाँव सिसवा-बसंतपुर में डकैतों के खौफ को देख चुके थे। लोग सुबह 8 बजे से पहले दरवाजे नहीं खोलते थे और सूरज ढलते ही घरों में कैद हो जाते थे। पांडे ने इस स्थिति को बदलने का बीड़ा उठाया।

27 जुलाई 1990 को उन्होंने ग्राम रक्षा दल की स्थापना की। यह एक ऐसा संगठन था, जिसमें गाँव के हर उम्र और जाति के लोग शामिल हुए। पांडे ने शुरुआत में कुछ ग्रामीणों को इकट्ठा कर एक ‘शहीदी जत्था’ बनाया और सभी लाइसेंसी हथियारों को एकत्र किया। उन्होंने शपथ दिलाई कि वे गाँव की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देंगे। इस दल ने गाँव में चौकसी शुरू की। हर गाँव में चौकियाँ बनाई गईं, जहाँ बिना पहचान और सत्यापन के किसी को प्रवेश नहीं मिलता था। दिन में लोग हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेते थे और रात में जागकर ड्यूटी देते थे। महिलाएँ और बच्चे भी खोजी मिशन में शामिल होते थे।

अभयानंद और जी. कृष्णैया का मिला सहयोग

इस मुहिम में पांडे को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अभयानंद और डीएम जी. कृष्णैया का साथ मिला। अभयानंद ने पांडे के प्रयासों को समझा और उन्हें नैतिक व लॉजिस्टिक समर्थन दिया। जी. कृष्णैया ने भी अपनी नौकरी की परवाह न करते हुए ग्रामीणों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। दोनों अधिकारियों ने ग्राम रक्षा दल की बैठकों में हिस्सा लिया और उनका हौसला बढ़ाया। हालाँकि साल 1994 में गोपालगंज में डीएम के पद पर तैनात जी. कृष्णैया की हत्या कर दी गई, जो उस समय लालू यादव के गृह जिले में थे। उनकी हत्या ने पूरे बिहार में हड़कंप मचा दिया, लेकिन ग्राम रक्षा दल के हौसले को नहीं तोड़ सकी।

ग्राम रक्षा दल ने अनुशासित सेना की तरह किया काम

ग्राम रक्षा दल ने डकैतों से निपटने के लिए सैन्य शैली में काम किया। उन्होंने डकैतों के मुखबिरों और सहयोगियों को चिह्नित किया। कुछ को सुधारने की कोशिश की, और जो नहीं माने, उन्हें गाँव से निकाल दिया या सजा दी। पांडे ने डकैतों के गिरोह में सेंध लगाई और उनके सहयोगियों को अपने पक्ष में कर लिया। उन्हें मुख्यधारा में लाने का लालच दिया और उनके परिवारों को सुरक्षा का भरोसा दिलाया। इस तरह डकैतों की जासूसी शुरू हुई। ग्राम रक्षा दल को डकैतों के हथियारों और गोलियों की पूरी जानकारी रहती थी। जब डकैत हमला करते और उनकी गोलियां खत्म हो जातीं, तब ग्राम रक्षा दल जवाबी कार्रवाई करता और उन्हें मार गिराता या पकड़ लेता।

साल 1990 से 2002 तक यह सशस्त्र संघर्ष चला। इस दौरान ग्राम रक्षा दल ने मशीन गन, स्टेन गन जैसे हथियार छीने और उन्हें सरकार को सौंपा। उनके पास एक समय में 16,000 हथियार थे, जिनमें 9,500 लाइसेंसी थे। इस संगठन ने 375 से अधिक गाँवों में अपनी इकाइयाँ स्थापित कीं, जो पश्चिम चंपारण के 60% से अधिक क्षेत्र को कवर करती थीं। डकैतों को सोमेश्वर पहाड़ियों के जंगलों में खदेड़ दिया गया। इस मुहिम ने डकैतों को आत्मसमर्पण करने या भागने के लिए मजबूर कर दिया।

नरकटिया नरसंहार और ग्राम रक्षा दल का जवाब

नरकटिया नरसंहार के बाद जब डकैतों ने गाँव वालों से चावल, बकरी और महिलाओं की माँग की और मना करने पर 15 लोगों की हत्या कर दी, ग्राम रक्षा दल ने और सख्ती दिखाई। उन्होंने एक किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला बनाई, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। इस एकजुटता ने डकैतों के हौसले पस्त कर दिए। 16 बच्चों के एक साथ अपहरण की घटना में ग्राम रक्षा दल ने त्वरित कार्रवाई कर उन्हें छुड़ा लिया।

राजनीतिक विरोध भी हुआ, घबराई हुई थी आरजेडी

ग्राम रक्षा दल की बढ़ती ताकत से सत्ताधारी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) घबरा गया। उन्हें डर था कि बद्री नारायण पांडे अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर उनकी सत्ता को चुनौती देंगे। विधानसभा और लोकसभा में ग्राम रक्षा दल के खिलाफ आवाज उठी, लेकिन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि जब सरकार लोगों की सुरक्षा में नाकाम है, तो आम लोग अपनी रक्षा के लिए कदम उठा रहे हैं। इस समर्थन ने ग्राम रक्षा दल को और मजबूती दी।

2002 तक पश्चिम चंपारण से डकैतों का लगभग सफाया हो चुका था। डकैतों ने आत्मसमर्पण किया और बगहा जैसे क्षेत्रों में शांति लौट आई। ग्राम रक्षा दल की इस सफलता ने छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम जैसे आंदोलन को प्रेरित किया। आज भी जम्मू-कश्मीर में ग्राम रक्षा दल जैसे संगठन आतंकवाद से लड़ने के लिए सरकार द्वारा तैनात किए गए हैं।

एसएन सुब्बाराव बने बद्री पांडे की प्रेरणा

बद्री पांडे की प्रेरणा का स्रोत यूथ प्रोजेक्ट बेंगलुरु में उनकी भागीदारी थी, जहाँ एस.एन. सुब्बाराव के नेतृत्व में युवाओं को सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित किया जाता था। पांडे ने इस प्रेरणा को अपने गाँव में लागू किया और समाज को एकजुट कर डकैतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी अगुवाई में ग्राम रक्षा दल ने न केवल डकैतों को हराया, बल्कि समाज में अनुशासन और एकता का नया माहौल बनाया।

अपराध मुक्ति की तरफ आज का पश्चिम चंपारण

साल 2005 में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद बिहार में अपराध पर काफी हद तक लगाम लगी। कभी डकैतों का गढ़ रहे पश्चिम चंपारण के गोबरहिया थाना क्षेत्र आज अपराधमुक्त है। पिछले पाँच वर्षों में यहाँ हत्या, लूट, छीना-झपटी या महिला उत्पीड़न जैसे मामले न के बराबर हैं। गाँवों में ‘गुमस्ता’ नामक व्यक्ति विवादों का निपटारा करते हैं, जिससे मामले थाने तक नहीं पहुँचते।

1990 में ‘ग्राम रक्षा दल शहीदी जत्था’ की स्थापना कर चंपारण को डाकुओं के आतंक से मुक्त कराने वाले बद्री नारायण पांडे से सुनिए चंपारण के डकैती और लूट के अंधकार में डूबने की कहानी।

बद्री नारायण पांडे और उनके ग्राम रक्षा दल की कहानी बिहार के जंगलराज से जूझते हुए एक समाज की जीत की कहानी है। नरकटिया नरसंहार जैसे भयावह दौर से निकलकर पश्चिम चंपारण ने शांति और सुरक्षा की मिसाल कायम की। पांडे की हिम्मत, अभयानंद और जी. कृष्णैया जैसे अधिकारियों का सहयोग और ग्रामीणों की एकजुटता ने ‘मिनी चंबल’ को अपराधमुक्त क्षेत्र में बदल दिया। यह कहानी न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है कि अगर समाज एकजुट हो जाए, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं है।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

‘फोर्स्ड लेबर’ के नाम पर भारत पर 12.5% टैरिफ का USTR प्रस्ताव: क्या सुप्रीम कोर्ट से झटका खाने के बाद ट्रंप खोज रहे नया...

USTR ने भारत सहित कई देशों पर नए टैरिफ का प्रस्ताव दिया है। भारत ने कहा कि प्रक्रिया जारी है और फैसला अभी बाकी है।

टिंडर से दोस्ती, ₹50 लाख की फिरौती और हथौड़े से कत्ल: DU के छात्र आयुष नौटियाल की हत्या केस में इश्तियाक अली दोषी, पढ़ें-...

2018 के चर्चित आयुष नौटियाल मर्डर केस में कोर्ट ने इश्तियाक अली को दोषी करार दिया। पढ़ें अपहरण, फिरौती, हत्या और पुलिस जाँच की पूरी कहानी।
- विज्ञापन -