ब्रुहनमुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव 2026 के नतीजे ठाकरे परिवार के लिए बेहद करारा झटका लेकर आए हैं। 227 सीटों वाली इस महानगरपालिका में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अकेले 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव हासिल किया। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) 65 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को 29 सीटें मिलीं। लेकिन इस पूरे चुनावी दंगल का सबसे बड़ा सवाल यही है कि उद्धव और राज ठाकरे की जोड़ी आखिर बहुमत से क्यों दूर रह गई? इसका सबसे सीधा जवाब है कॉन्ग्रेस का साथ न मिलना और सबसे पहले कॉन्ग्रेस का ही गठबंधन तोड़ना।
कॉन्ग्रेस की रणनीति ने डुबोई ठाकरे परिवार की लुटिया
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम की सबसे पहली और सबसे बड़ी गलती कॉन्ग्रेस द्वारा गठबंधन तोड़ने का फैसला था। बीएमसी चुनाव से पहले महा विकास अघाड़ी (MVA) को फिर से एकजुट करने की कोशिशें चल रही थीं, लेकिन कॉन्ग्रेस ने साफ कर दिया कि वह इस चुनाव में अकेले उतरेगी। खासतौर पर कॉन्ग्रेस ने राज ठाकरे की मनसे के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से इनकार कर दिया। कॉन्ग्रेस का तर्क था कि मनसे की राजनीति उत्तर भारतीयों और अल्पसंख्यकों के लिए असहज है और नगर निगम जैसे चुनाव में सामाजिक संतुलन बेहद जरूरी होता है।
कॉन्ग्रेस के इस फैसले का सीधा असर यह हुआ कि विपक्षी वोट पूरी तरह बँट गया। एक तरफ उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी, दूसरी तरफ अकेली कॉन्ग्रेस और सामने पहले से मजबूत बीजेपी-शिंदे महायुति। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर कॉन्ग्रेस शुरुआत में ही गठबंधन नहीं तोड़ती और एमवीए एकजुट रहता, तो मुकाबला बेहद करीबी हो सकता था। लेकिन अलग-अलग लड़ने के फैसले ने ठाकरे परिवार की चुनावी जमीन कमजोर कर दी।
साल 2017 में अलग थे चुनाव के नतीजे
अगर बीते इतिहास को देखें तो 2017 का बीएमसी चुनाव बेहद अलग तस्वीर दिखाता है। उस वक्त बीजेपी और शिवसेना साथ थे। शिवसेना ने 84 सीटें जीती थीं और बीजेपी को 82 सीटें मिली थीं। दोनों पार्टियों के बीच जबरदस्त टक्कर थी, लेकिन सत्ता ठाकरे परिवार के हाथ में ही रही। 2019 के विधानसभा चुनाव में भी एनडीए को बहुमत मिला, लेकिन उद्धव ठाकरे ने बीजेपी का साथ छोड़कर कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ एमवीए सरकार बना ली।
साल 2022 तक चली एमवीए सरकार के बाद शिवसेना टूट गई। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ा शिवसैनिक धड़ा अलग हो गया। इसके बाद उद्धव ठाकरे की राजनीतिक ताकत लगातार कमजोर होती चली गई। बीएमसी चुनाव इस कमजोरी की सबसे बड़ी परीक्षा थी। यह चुनाव यह भी साबित करता है कि उद्धव ठाकरे जब तक बीजेपी के साथ थे, तब तक उनकी सत्ता मजबूत थी। जैसे ही उन्होंने बीजेपी से दूरी बनाई, संगठन और वोट दोनों कमजोर होते चले गए।
शिवसैनिकों का स्वार्थ गठबंधन से दूर जाना भी रहा अहम
शिवसैनिक दशकों से कॉन्ग्रेस का विरोध करते आए हैं। ऐसे में उद्धव ठाकरे के लिए कॉन्ग्रेस के साथ वैचारिक तालमेल बनाना पहले से ही मुश्किल था। ऊपर से राज ठाकरे के साथ गठबंधन ने स्थिति और उलझा दी। राज ठाकरे के कट्टर मराठी और उत्तर भारतीय विरोधी बयानों ने मुस्लिम और गैर-मराठी वोटरों को उद्धव से दूर कर दिया। इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला, जो खुद को स्थिर और भरोसेमंद विकल्प के तौर पर पेश कर रही थी।
बीजेपी ने ठाकरे भाइयों की जुगलबंदी को ‘स्वार्थी गठजोड़’ करार दिया और जमीन पर इसका असर भी दिखा। शिवसेना (UBT) का संगठन भ्रम और श्रेय की लड़ाई में कमजोर पड़ा। ठाकरे विरासत को लेकर पार्टी के अंदर ही असमंजस बना रहा। वहीं, शिंदे गुट ने खुद को असली शिवसेना बताकर पारंपरिक शिवसैनिकों को अपनी ओर खींच लिया।
आँकड़ों में बीएमसी चुनाव के नतीजे
अब अगर बीएमसी चुनाव 2026 के फाइनल आँकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है। कुल वोटों में बीजेपी को 11,79,273 वोट मिले, जो 45.22 फीसदी हैं। शिवसेना (उद्धव) को 7,17,736 वोट (27.52 फीसदी) और कॉन्ग्रेस को 2,42,646 वोट (4.44 फीसदी) मिले। यानी अगर उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस साथ होते, तो उनके संयुक्त वोट 9,60,382 हो जाते, जो बीजेपी के बेहद करीब पहुँचते।
सीटों के आँकड़े भी यही कहानी कहते हैं।
- बीजेपी – 89 सीटें
- शिवसेना (उद्धव) – 65 सीटें
- शिवसेना (शिंदे) – 29 सीटें
- कॉन्ग्रेस – 24 सीटें
- मनसे – 6 सीटें
- एनसीपी (अजित) – 3 सीटें
- एआईएमआईएम – 8 सीटें
अगर सिर्फ गणित के लिहाज से देखें तो उद्धव ठाकरे, कॉन्ग्रेस और मनसे का गठबंधन 95 सीटों तक पहुँचता दिखता है। लेकिन असल खेल वोट ट्रांसफर का था, जहाँ गठबंधन होता तो 40–50 वार्डों में नतीजे पलट सकते थे।

कॉन्ग्रेस के वोटों ने छीनी शिवसेना-UBT से जीत
मुंबई के कई ऐसे वार्ड रहे, जहाँ हार-जीत का अंतर बेहद कम था। अंधेरी ईस्ट, गोरेगांव, मालाड जैसे इलाकों में कॉन्ग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक रहा है। इन इलाकों में उद्धव ठाकरे के उम्मीदवार सिर्फ इसलिए हार गए क्योंकि वोट बंँट गया। अगर कॉन्ग्रेस साथ होती, तो ये सीटें आसानी से ठाकरे खेमे में जा सकती थीं।
शिवसेना (UBT) कई ऐसे वार्डों में हारी, जहाँ कॉन्ग्रेस ने 3 से 6 हजार वोट काट लिए। ये वही वार्ड थे, जिन्हें दशकों से शिवसेना का गढ़ माना जाता रहा है। दादर, परेल जैसे इलाकों में भी यही ट्रेंड देखने को मिला। यहां महायुति को फायदा सिर्फ इसलिए मिला क्योंकि विपक्ष बंटा हुआ था।
कॉन्ग्रेस की 24 सीटें यह साबित करती हैं कि पार्टी अभी भी मुंबई में पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लेकिन अकेले लड़ने का फैसला उसके लिए भी घाटे का सौदा साबित हुआ। अगर वह उद्धव ठाकरे के साथ जाती, तो उसकी सीटें भी 35–40 तक पहुँच सकती थीं और सत्ता की तस्वीर ही बदल जाती।
मनसे से गठबंधन ने उद्धव को किया बर्बाद
राज ठाकरे के साथ गठबंधन उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। मनसे का वोट शेयर सिर्फ 5 फीसदी के आसपास रहा और उसे केवल 6 सीटें मिलीं। इसके उलट, कॉन्ग्रेस के पास 4.44 फीसदी वोट और 24 सीटें थीं, जो कहीं ज्यादा असरदार थीं। उद्धव ठाकरे अगर मनसे की बजाय कॉन्ग्रेस को प्राथमिकता देते, तो मराठी वोट के साथ अल्पसंख्यक और सेकुलर वोट भी उनके साथ आता।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि गलती सिर्फ उद्धव ठाकरे की नहीं थी। फैक्ट यह है कि सबसे पहले कॉन्ग्रेस ने ही ‘एकला चलो रे’ की नीति अपनाई। कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने उद्धव ठाकरे को यह भरोसा नहीं दिलाया कि वह हर हाल में गठबंधन में रहेगी। इसी वजह से उद्धव ठाकरे ने मजबूरी में मनसे का रास्ता चुना।
कॉन्ग्रेस के पंजे ने दिखाया ठेंगा, तो ठह गया ठाकरे परिवार का किला
अगर एमवीए एकजुट रहता, तो बीएमसी में महायुति के लिए बहुमत पाना बेहद मुश्किल होता। आँकड़े बताते हैं कि विपक्ष की संयुक्त ताकत बीजेपी के बेहद करीब थी। लेकिन अलग-अलग लड़ने से यह ताकत बिखर गई और बीजेपी-शिंदे गठबंधन को सीधा फायदा मिल गया।
बीएमसी हारना उद्धव ठाकरे के लिए सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत के केंद्र का छिन जाना है। बीएमसी से मिलने वाला आर्थिक और सांगठनिक बल ही शिवसेना की असली ताकत रहा है। 25 साल बाद यह किला हाथ से निकलना ठाकरे परिवार के लिए बड़ा झटका है।
वहीं, कॉन्ग्रेस के लिए यह नतीजा चेतावनी है। 24 सीटें यह दिखाती हैं कि पार्टी प्रासंगिक है, लेकिन अकेले लड़कर वह सत्ता तक नहीं पहुँच सकती। अगर वह गठबंधन की राजनीति को नहीं समझेगी, तो उसका असर आगे विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी दिख सकता है।
कुल मिलाकर बीएमसी चुनाव का नतीजा यही सिखाता है कि विपक्ष का बिखराव सत्ता पक्ष के लिए वरदान बन जाता है। कॉन्ग्रेस द्वारा सबसे पहले गठबंधन तोड़ना, उद्धव ठाकरे की मनसे के साथ गलत प्राथमिकता और शिंदे-बीजेपी की मजबूत जमीन… इन तीनों ने मिलकर ठाकरे परिवार की लुटिया डुबो दी।
उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस इस हार से लेंगे सबक?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस इस हार से सबक लेंगे? क्या एमवीए फिर से एकजुट होगा या विपक्ष ऐसे ही बिखरा रहेगा? अगर जवाब नहीं में रहा, तो आने वाले चुनावों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं होगी।
कुल मिलाकर बीएमसी चुनाव 2026 ने यह साबित कर दिया कि मुंबई जैसे जटिल शहर में ‘एकला चलो’ की नीति काम नहीं करती। वैसे भी, राजनीति में भावनाओं से ज्यादा गणित चलता है। और इस गणित में इस बार सबसे बड़ी गलती कॉन्ग्रेस की रही, जिसने सबसे पहले गठबंधन तोड़ा और ठाकरे परिवार की सबसे मजबूत सत्ता को इतिहास बना दिया। कॉन्ग्रेस ने न सिर्फ खुद को नुकसान पहुँचाया, बल्कि ठाकरे परिवार की राजनीतिक नाव भी डुबो दी। अब मुंबई की सत्ता पर महायुति का पूरा कब्जा है और विपक्ष को एकजुट होने की नई चुनौती मिल गई है।


