Thursday, October 22, 2020
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प्रोफेसरों व वामपंथी छात्रों ने मिल कर किया प्रताड़ित: JNU के छात्र मनीष ने बताया कैसे ‘मीडिया’ भी है साज़िश में शामिल

"योगेंद्र यादव, डी राजा और सीताराम येचुरी सहित कई नेता तुरंत पहुँच गए। मीडिया का एक वर्ग भी उपद्रवियों से मिला हुआ था। आख़िर इतने वामपंथी नेता जेएनयू में तुरंत कैसे पहुँच गए? जामिया के कई छात्रों ने जेएनयू में डेरा डाला था और नकाबपोश गुंडों में अधिकतर जेएनयू के थे। जामिया के छात्रों की JNU कैम्पस में संदिग्ध उपस्थिति को लेकर प्रशासन से शिकायत भी दर्ज कराई गई थी।"

ऑपइंडिया ने कुछ ऐसे छात्रों से बातचीत की, जिन्हें जेएनयू में जनवरी 5, 2020 के दिन हुई हिंसा के दौरान वामपंथियों ने निशाना बनाया। इन छात्रों में एक मनीष जांगिड़ भी हैं, जिनका हाथ टूट गया। उनके हाथ पर प्लास्टर अभी भी देखा जा सकता है। वो अलग बात है कि जेएनयू छात्र संगठन की अध्यक्ष आइशी घोष के पूरे सिर में लगी हुई मरहम-पट्टी अब बस एक स्टीच तक सिमित हो गई है। मनीष एबीवीपी के छात्र नेता हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि जेएनयू में नवंबर 28, 2019 को हॉस्टल फी बढ़ाने के ख़िलाफ़ छात्रों ने आंदोलन शुरू किया।

उन्होंने बताया कि एबीवीपी ने भी आम छात्रों के उस आंदोलन को समर्थन दिया, जो एबीवीपी को रास नहीं आया। उन्होंने कहा कि जब आम छात्रों को वामपंथियों की सच्चाई का पता चलने लगा, तो उन्होंने हॉस्टल वार्डन्स के घरों पर हमला शुरू कर दिया। उनके परिवारों को परेशान किया गया। बकौल मनीष, एक गर्भवती महिला के घर को भी निशाना बनाया गया और उनके घर में शीशे के बोतल फेंके गए। वो महिला वार्डन थी। कुल 500 वामपंथी छात्रों ने मिल कर ये सब किया। मनीष ने आगे बताया कि इसी तरह 8-9 नवंबर को डीन वंदना मिश्रा जब क्लास लेने गईं, तब उन्हें 30 घंटे तक बंधक बना कर रखा गया। उनके कपड़े फाड़े गए और उन पर दबाव बनाया गया कि वो इस्तीफा दें और यूनिवर्सिटी छोड़ कर जाएँ।

मनीष ने मुख्यधारा की मीडिया के एक बड़े वर्ग से नाराज़गी जताते हुए कहा कि उन्होंने पूरे मुद्दे को कवर करने में पक्षपात किया। उन्होंने वामपंथियों के आंदोलन के आपत्तिजनक नारों, जैसे- “भगवा जलेगा” और “हिंदुत्व की कब्र खुदेगी” पर आपत्ति जताई। मनीष ने याद दिलाया कि कैसे स्वामी विवेकानंद की उस प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ की गई, जिसका अभी अनावरण भी नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि फी हाइक को लेकर हुए आंदोलन को सीएए विरोधी आंदोलन में बदल दिया गया और बाद में परीक्षाओं का बहिष्कार किया जाने लगा।

मनीष ने कुछ प्रोफेसरों के बारे में भी बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि उन प्रोफेसरों ने वामपंथियों का साथ देते हुए बाकी छात्रों को डराया-धमकाया और उन्हें पढ़ाना बंद कर दिया। इन प्रोफेसरों ने परीक्षाओं और असाइनमेंट्स लेने बंद कर दिए। जब ऑनलाइन परीक्षा का प्रावधान आया, तब उन स्कूलों में परीक्षाएँ सही से नहीं हो पाईं, जहाँ वामपंथी शिक्षकों की तादाद ज़्यादा थी। मनीष ने इसी तरह आगे बताया कि नए सेमेस्टर के रजिस्ट्रेशन में भी व्यवधान डाला गया। उन्होंने बताया कि कम्युनिकेशन सेंटर में वामपंथी छात्र नेता गीता कुमारी और अपेक्षा प्रियदर्शनी सहित अन्य वामपंथी छात्रों ने सर्वर रूम को तोड़ डाला।

वामपंथी छात्रों ने आख़िर इंटरनेट बंद क्यों किया? मनीष ने इसका जवाब देते हुए बताया कि सर्वर रूम में ही वो सारी सीसीटीवी फुटेज थी, जिनसे वामपंथियों की पोल खुल सकती थी कि उन्होंने कैसे तोड़फोड़ मचाई व गुंडागर्दी की। इसीलिए, उन्होंने सर्वर रूम को ही क्षतिग्रस्त कर दिया। अर्थात, जम्मू कश्मीर में ‘फ्री इंटरनेट’ की माँग करने वालों को जेएनयू में इंटरनेट रास नहीं आया। इन छात्रों में जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आईसी घोष भी शामिल थीं। इसके बाद वामपंथियों ने ‘पीस मार्च’ के नाम पर 500 छात्रों का हुजूम जुटाया और सर्वर रूम में फिर तोड़फोड़ मचाई।

मनीष ने बताया कि रजिस्ट्रेशन करने गए अन्य छात्रों पर लाठी-डंडे और पत्थर से हमला कर दिया गया। उन्होंने बताया कि वामपंथी भीड़ ने रजिस्ट्रेशन करने गए छात्रों पर हमला कर दिया लेकिन वहाँ गार्ड्स के हस्तक्षेप के बाद मामला सुलझ गया। उन्होंने बताया कि पेरियार हॉस्टल में, साबरमती और माही-मांडवी में हमले किए गए। इन तीनों हॉस्टलों को इसीलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वहाँ एबीवीपी के छात्र अच्छी संख्या में हैं। मनीष ने उस दिन को याद करते हुए बताया कि जम्मू कश्मीर के उपद्रवियों के तर्ज पर नकाबपोश लोगों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। मनीष ने बताया कि वो अपने साथियों के साथ एक कमरे में छिप गए।

मनीष ने भीड़ का नेतृत्व करने वाले सतीश चंद्र यादव का नाम लिया, जो जेएनयू छात्र संघ में जनरल सेक्रेटरी हैं। मनीष ने बताया कि भीड़ ने आईशी, सुचेता सहित अन्य छात्रों ने डंडे से उन पर हमला कर दिया और भागने के क्रम में उनकी इतनी पिटाई की गई कि वो बेहोश हो गए। बकौल मनीष, जब उनको होश आया तो उन्हें लोग एम्स में लेकर गए। वहाँ जेएनयू के कुछ प्रॉफेसर और वामपंथी नेता वृंदा करात पहले से ही मौजूद थें, जो इलाज के कार्य में बाधा डाल रहे थे। मनीष ने बताया कि उनके साथ शिवम चौरसिया और उज्जवल का सिर फूट गया। इसी तरह उनके साथी शेषमणि साहू भी काफ़ी घायल हो गए थे।

इसके बाद प्रियंका गाँधी और कमलनाथ सहित कॉन्ग्रेस के कई नेता वहाँ पहुँचे। कई वकीलों ने भी अपने आप को जेएनयू का पूर्व-छात्र बताते हुए ट्रामा सेंटर में घुस गए। मनीष ने बताया कि जब उन्होंने वामपंथियों के उत्पात की बात प्रियंका को बताई तो उन्होंने मुँह फेर लिया और चली गईं। मनीष ने बताया कि जहाँ एक तरफ़ घायल छात्रों को प्रियंका ने नज़रअंदाज़ किया, वामपंथी छात्रों को घायल बताते हुए मरहम-पट्टी के साथ हॉस्पिटल बेड पर सुला दिया गया। इनमें एक सूरी नामक छात्र भी है, जो इस घटना के बाद केरल गया और वहाँ उसका फूल-मालाओं से स्वागत हुआ। इसी तरह जिन वामपंथी छात्रों को खरोंच तक नहीं आई थी, उन्हें घायल बता कर लिटा दिया गया।

मनीष ने बताया कि योगेंद्र यादव, डी राजा और सीताराम येचुरी सहित कई नेता तुरंत पहुँच गए। मनीष ने कहा कि मीडिया का एक वर्ग भी उपद्रवियों से मिला हुआ था। उन्होंने सवाल दागा कि आख़िर इतने वामपंथी नेता जेएनयू में तुरंत कैसे पहुँच गए? मनीष ने कहा कि जामिया के कई छात्रों ने जेएनयू में डेरा डाला था और नकाबपोश गुंडों में अधिकतर जेएनयू के थे। मनीष व उनके साथियों ने जामिया के छात्रों की कैम्पस में संदिग्ध उपस्थिति को लेकर प्रशासन से शिकायत भी दर्ज कराई थी।

राहुल कँवल के बारे में मनीष ने बताया कि वो आईशी घोष सहित 33 छात्रों के घायल होने की बात करते हैं लेकिन उन्हें बस आइशी का नाम ही मालूम होता है। मनीष ने आरोप लगाया कि आईशी की मेडिकल रिपोर्ट में धाँधली हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि गीता कुमारी का नाम आया, तब मीडिया वालों ने उनके बारे में ये नहीं बताय कि वो जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष रह चुकी हैं और वामपंथी नेता हैं, उन्हें आम छात्र बना कर पेश किया गया। मनीष ने दिल्ली पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र करते हुए कहा कि पुलिस ने आइसा, एसएफआई, डीएफएस और एआईएसएफ को पूरी साज़िश का रणनीतिकार बताया।

जिस छात्र के हवाले से एबीवीपी को दोषी ठहराया जा रहा है, उसका स्टिंग करने वालों का आम आदमी पार्टी से कनेक्शन निकल कर सामने आ रहा है। ऐसे में मनीष ने अंदेशा जताया कि इस पूरी साज़िश के पीछे आगामी दिल्ली चुनाव कहीं न कहीं केंद्र में है। उन्होंने अवस्थी को लेकर राहुल कँवल के दोहरे रवैये पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि विश्व के सबसे बड़े छात्र संगठन पर आरोप लगाने वाले कँवल के एकमात्र उद्देश्य ये है कि दिल्ली पुलिस को लेकर ग़लतफ़हमी फैला सकें। मनीष ने आरोप लगाया कि ‘इंडिया टुडे’ ने उनसे बातचीत की लेकिन सोशल मीडिया में हर जगह से उस वीडियो को हटा दिया गया।

मनीष ने आरोप लगाया कि राहुल कँवल और उनका चैनल पहले सब सेट करता है कि किसे क्या बोलना है, फिर कैमरे से शूट कर के टीवी पर दिखाया जाता है। मनीष ने इतिहास की याद दिलाते हुए कहा कि 1983 में किस तरह वामपंथी संगठनों ने तत्कालीन वीसी और एक हॉस्टल वार्डन के घर में घुस कर आतंक मचाया गया। मनीष ने कहा कि उस समय एबीवीपी का कोई अस्तित्व नहीं था और जेएनयू में पक्ष से लेकर विपक्ष तक वामपंथियों का ही दबदबा था। उन्होंने याद दिलाया कि उस घटना के बाद जेएनयू को 1 वर्ष के लिए बंद कर दिया गया था।

मनीष ने बताया कि वामपंथी जेएनयू में वही कर रहे हैं, जैसा उन्होंने चीन और इजरायल में अपना अस्तित्व बचाने के लिए हिंसा की। मनीष ने कहा कि उनके नाम पर परचा बाँट कर कहा गया कि एबीवीपी वालों का बॉयकॉट किया जाए। मनीष ने कहा कि जब तक जेएनयू में एबीवीपी के कार्यकर्ता मौजूद हैं, वो जेएनयू को बदनाम नहीं होने देंगे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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