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50 साल पहले पिता को देने पड़े थे ₹101, ₹5 में ही हो जाएगा बेटे का काम: तब अटल थे, आज मोदी हैं

इसे भी एक संयोग कह लीजिए कि बाद में जब सिंधिया कॉन्ग्रेस में चले गए तो 1984 में ग्वालियर की सीट पर उनका मुकाबला अटल बिहारी वाजपेयी से ही हुआ। सिंधिया उस चुनाव में वाजपेयी को हराने में कामयाब रहे थे।

ग्वालियर राजघराने का भाजपा और जनसंघ से पुराना नाता रहा है। राजमाता विजयराजे सिंधिया भाजपा के संस्थापकों में शामिल थीं। उनके बेटे माधवराव सिंधिया भी कॉन्ग्रेस से पहले जनसंघ में ही थे। उन्होंने अपनी माँ की उपस्थिति में पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी से जनसंघ की सदस्यता ली थी। वो फ़रवरी 23, 1970 का दिन था, जब उन्होंने 101 रुपए सदस्यता शुल्क जमा कर जनसंघ की सदस्यता ग्रहण की थी। अगले ही साल 1971 में पार्टी के टिकट पर उन्होंने गुना लोकसभा क्षेत्र से जीत भी दर्ज की।

इसे भी एक संयोग कह लीजिए कि बाद में जब सिंधिया कॉन्ग्रेस में चले गए तो 1984 में ग्वालियर की सीट पर उनका मुकाबला अटल बिहारी वाजपेयी से ही हुआ। सिंधिया उस चुनाव में वाजपेयी को हराने में कामयाब रहे थे। उन्होंने लगातार 9 लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज की। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री नटवर सिंह ने तो यहाँ तक कहा कि अगर माधवराव की असामयिक मौत नहीं होती तो उनका प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचना तय था। आपातकाल के बाद जब 1977 में जनता पार्टी की लहर थी, तब भी सिंधिया निर्दलीय चुनाव लड़ कर अपना गढ़ बचाने में कामयाब रहे थे।

अब माधवराव सिंधिया के बेटे और विजयराजे सिंधिया के पोते ज्योतिरादित्य के भाजपा का दामन थामने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाक़ात और कॉन्ग्रेस से इस्तीफे के बाद अब सिर्फ़ औपचारिकता ही बाकी है। सिंधिया को भाजपा का सदस्य बनने के लिए 5 रुपए का सदस्यता शुल्क देना होगा। पार्टी की वेबसाइट पर उपलब्ध फॉर्म के अनुसार, सदस्य बनने के लिए 5 रुपए का शुल्क अनिवार्य है। वहीं स्वैच्छिक रूप से न्यूनतम 100 रुपए या उससे अधिक का अतिरिक्त योगदान दिया जा सकता है।

माधवराव सिंधिया की सदस्यता पर्ची, जिस पर वाजपेयी के भी हस्ताक्षर हैं

जब माधवराव सिंधिया जनसंघ के सदस्य बने थे, तब उनकी उम्र मात्र 25 साल थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया की उम्र 49 वर्ष है। वे पिछले 18 वर्षों से कॉन्ग्रेस में थे। जैसे कमलनाथ सरकार में बेटे की उपेक्षा की गई, ऐसे ही दिग्विजय सरकार में पिता को दरकिनार किया गया था। तब माधवराव ने 1993 में ‘मध्य प्रदेश विकास कॉन्ग्रेस’ बनाई थी। बाद में वो फिर कॉन्ग्रेस में वापस लौट आए थे। इसी तरह 1967 में विजयराजे सिंधिया को नज़रअंदाज़ किया गया था, तब उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ कर जनसंघ का दामन थमा था।

जब माधवराव जनसंघ के सदस्य बने थे, तब उन्होंने अपना पेशा खेती बताया था। माधवराव सिंधिया पीवी नरसिम्हा राव और राजीव गाँधी मंत्रिमंडल के अहम सदस्यों में से एक रहे। उनकी क्रिकेट प्रशासन में भी दिलचस्पी थी। वो 1990-93 तक बीसीसीसाई के अध्यक्ष भी रहे। उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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