तमिलनाडु की राजनीति में आज एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। यहाँ के चुनाव में एक पूरा समुदाय यानी ब्राह्मण समाज पूरी तरह किनारे कर दिया गया है। 2026 के विधानसभा चुनाव (23 अप्रैल) के लिए जब पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, तो एक हैरान करने वाली बात सामने आई। राज्य की बड़ी पार्टियाँ जैसे DMK और AIADMK, कॉन्ग्रेस तो छोड़िए, खुद को हिंदू धर्म का रक्षक बताने वाली भाजपा ने भी एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है।
यह सिर्फ चुनाव जीतने की कोई चाल नहीं है, बल्कि उस ‘द्रविड़ विचारधारा’ का असर है जो पिछले 100 सालों से तमिलनाडु में चल रही है। इस सोच ने वहाँ के समाज और राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है, जिससे अब ब्राह्मणों के लिए चुनाव लड़ना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।
खत्म होती भागीदारी: राजनीति से क्यों गायब हुए ब्राह्मण?
तमिलनाडु की कुल आबादी में ब्राह्मणों का हिस्सा मात्र 3% के करीब है। भले ही इनकी संख्या कम रही हो, लेकिन आजादी के बाद के शुरुआती सालों में सरकारी दफ्तरों, अदालतों और राजनीति में इनका काफी दबदबा हुआ करता था। साल 1952 में मद्रास प्रेसीडेंसी के पहले मुख्यमंत्री सी राजगोपालाचारी (राजाजी) खुद एक ब्राह्मण थे। लेकिन धीरे-धीरे कामराज जैसे पिछड़े वर्गों के बड़े नेताओं के आने से राजनीति का रुख बदल गया और ब्राह्मणों का असर कम होने लगा।
एआईएडीएमके (AIADMK) की कमान जब तक जयललिता के हाथों में थी, तब तक ब्राह्मण समाज को राजनीति में अपनी जगह की उम्मीद रहती थी। जयललिता खुद एक तमिल ब्राह्मण परिवार से थीं। हालाँकि, उन्होंने अपनी पार्टी को पिछड़ी जातियों (OBC) के सहारे खड़ा किया, लेकिन वे समय-समय पर अपनी टीम में ब्राह्मण चेहरों को भी जगह देती थीं। वे कभी उन्हें चुनाव लड़ाती थीं तो कभी राज्यसभा भेजती थीं, जिससे इस समाज का प्रतिनिधित्व बना रहता था।
जयललिता के निधन के बाद अब समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। पिछले 35 सालों में यह पहली बार हुआ है कि AIADMK ने एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि भाजपा, जिसे आमतौर पर ब्राह्मणों की समर्थक पार्टी माना जाता है, उसने भी अपने हिस्से की 27 सीटों में से किसी पर भी इस समुदाय के व्यक्ति को मौका नहीं दिया। आज स्थिति यह है कि तमिलनाडु की मुख्य राजनीति में ब्राह्मण समाज का दखल लगभग खत्म हो गया है।
टिकट कटने की बड़ी वजह: पेरियार की ‘द्रविड़’ राजनीति का असर
तमिलनाडु की राजनीति से ब्राह्मणों के बाहर होने के पीछे कोई एक वजह नहीं है, बल्कि यह दशकों से चली आ रही एक सोच का नतीजा है। इसकी शुरुआत ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ से हुई थी। पेरियार ने ब्राह्मणवाद और उत्तर भारत के प्रभाव को तमिल पहचान का दुश्मन बताया। उनकी इस सोच ने पिछड़ी जातियों (OBC) और दलित समाज में एक नई राजनीतिक चेतना पैदा कर दी, जिससे धीरे-धीरे सत्ता की चाबी इन वर्गों के हाथ में चली गई।
तमिलनाडु में आज 69% आरक्षण लागू है, जो देश में सबसे ज्यादा है। यहाँ की बड़ी पार्टियों (DMK और AIADMK) ने अपनी पूरी राजनीति पिछड़ी जातियों (जैसे वन्नियार, थेवर और गौंडर) को मजबूत करने पर टिका दी है। आज हालत यह है कि कोई भी पार्टी किसी ब्राह्मण को टिकट देने का रिस्क नहीं लेना चाहती। उन्हें डर लगता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उनका मुख्य वोट बैंक (OBC और SC) नाराज हो जाएगा और संदेश जाएगा कि वे फिर से ‘ऊँची जाति’ को बढ़ावा दे रहे हैं।
जब राजनीति में जगह मिलना बंद हो गई, तो पिछले 30 सालों में बड़ी संख्या में ब्राह्मणों ने तमिलनाडु छोड़ दिया। इस समाज के लोग अब राजनीति के बजाय आईटी (IT), बैंकिंग और बड़े बिजनेस की ओर मुड़ गए हैं। बहुत से लोग बेंगलुरु, मुंबई या सीधे अमेरिका और यूरोप चले गए। उनके पुराने घर और इलाके (जिन्हें अग्रहारम कहा जाता था) अब बदल चुके हैं। आबादी कम होने और लोगों के बाहर चले जाने से अब वे एक बड़े ‘वोट बैंक’ के रूप में भी नहीं देखे जाते, जिससे पार्टियों के लिए उन्हें नजरअंदाज करना और आसान हो गया है।
‘सनातन’ पर छिड़ा संग्राम: ब्राह्मणों को ‘बाहरी’ बताने का खेल
तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मणों को अक्सर ‘आर्य’ या ‘बाहरी’ बताकर पेश किया जाता है, जबकि बाकी समुदायों को ‘असली द्रविड़’ (वहाँ का मूल निवासी) कहा जाता है। यह सोच वहाँ इतनी गहरी हो चुकी है कि ‘सनातन धर्म’ के खिलाफ बोलना अब राजनीति में एक बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। पिछले कुछ सालों में डीएमके (DMK) के बड़े नेताओं ने सनातन धर्म को लेकर जो तीखे बयान दिए, उसने समाज के बीच की दूरी को और ज्यादा बढ़ा दिया है। द्रविड़ पार्टियाँ चाहती हैं कि लोग खुद को ‘हिंदू’ से ज्यादा अपनी ‘जाति’ (जैसे वन्नियार या थेवर) से जोड़कर देखें, ताकि भाजपा की हिंदुत्व वाली राजनीति वहाँ काम न कर सके।
तमिलनाडु में भाजपा ने भी एक कड़वी हकीकत को स्वीकार कर लिया है। उन्हें समझ आ गया है कि अगर वे केवल ‘ब्राह्मणों की पार्टी’ बनकर रहे, तो वहाँ कभी चुनाव नहीं जीत पाएँगे। इसीलिए भाजपा ने अब अन्नामलाई (जो पिछड़ी जाति गौंडर से आते हैं) जैसे नेताओं को आगे कर दिया है। पार्टी अब ब्राह्मणों को टिकट देने से परहेज कर रही है ताकि वह खुद को ‘द्रविड़ पहचान’ और पिछड़ों के करीब दिखा सके।
आज के दौर में तमिलनाडु का ब्राह्मण समाज एक अजीब और मुश्किल स्थिति में फँस गया है। उनके लिए यह ‘दोहरी मार’ जैसा है। एक तरफ DMK जैसी द्रविड़ पार्टियाँ उन्हें अपना पुराना ‘वैचारिक दुश्मन’ मानती हैं और उन्हें मुख्यधारा से बाहर रखना चाहती हैं। दूसरी तरफ BJP, जो कभी उनकी सबसे बड़ी समर्थक मानी जाती थी, अब उन्हें ‘चुनावी बोझ’ समझने लगी है। BJP को लगता है कि ब्राह्मणों को ज्यादा तवज्जो देने से उनका पिछड़ी जातियों का वोट बैंक खिसक सकता है। नतीजा यह है कि आज कोई भी बड़ी पार्टी उनके साथ खड़ी होने को तैयार नहीं है।
छोटी पार्टियों की ‘ब्राह्मण’ रणनीति
जहाँ तमिलनाडु की बड़ी पार्टियाँ जैसे DMK, AIADMK और यहाँ तक कि BJP ने भी ब्राह्मणों से दूरी बना ली है, वहीं कुछ नई और छोटी पार्टियाँ एक अलग रास्ता चुन रही हैं। इन पार्टियों को लगता है कि अगर बड़े दल ब्राह्मणों को टिकट नहीं दे रहे, तो वे इस समाज को अपने पाले में लाकर एक नया समीकरण बना सकते हैं। इसी सोच के साथ अभिनेता विजय और नेता सीमन ने अपनी-अपनी पार्टियों से ब्राह्मणों को चुनावी मैदान में उतारा है।
राजनीति में आए सुपरस्टार विजय की पार्टी ‘TVK’ ने दो ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाया है। विजय का मकसद यह संदेश देना है कि उनकी पार्टी किसी खास समुदाय के खिलाफ नहीं है, भले ही वे पेरियार की विचारधारा को मानते हों। दूसरी तरफ, तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी ‘NTK’ ने सबको चौंकाते हुए 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। सीमन ने श्रीरंगम और मायलापुर जैसी जगहों को चुना है जहाँ ब्राह्मण वोट काफी मायने रखते हैं।
सीमन की राजनीति पेरियार की ‘द्रविड़’ सोच के खिलाफ है। उनका कहना है कि वे ‘द्रविड़ दीवार’ को गिराने के लिए ‘ब्राह्मण कडाप्परई’ (यानी लोहे की एक मजबूत छड़ या सब्बल) का इस्तेमाल करेंगे। सीमन का मानना है कि तमिलनाडु में रहने वाला हर व्यक्ति पहले ‘तमिल’ है, चाहे उसकी जाति कुछ भी हो। यह राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि जिस ब्राह्मण समुदाय को द्रविड़ आंदोलन ने दशकों पहले किनारे कर दिया था, आज एक तमिल राष्ट्रवादी नेता उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बताकर गले लगा रहा है।
क्या ब्राह्मण केवल ‘वोटर’ बनकर रह जाएँगे?
तमिलनाडु की आज की राजनीति को देखकर साफ लगता है कि 3% आबादी वाला ब्राह्मण समाज अब ‘सत्ता चलाने’ के बजाय केवल एक ‘खामोश वोटर’ बनकर रह गया है। जहाँ कभी इस समाज के बड़े नेता राज्य की किस्मत तय करते थे, वहीं आज 160 से ज्यादा बड़े उम्मीदवारों में से केवल 3-4 ब्राह्मणों का होना यह बताता है कि उन्हें चुनावी रेस से लगभग बाहर कर दिया गया है। यह एक तरह का ‘राजनीतिक वनवास’ है, जहाँ उनकी आवाज अब विधानसभा में सुनाई देना बहुत मुश्किल हो गया है।
राज्य की बड़ी पार्टियों का यह रवैया साफ कर देता है कि अब तमिलनाडु में चुनाव जीतने के लिए योग्यता से ज्यादा ‘जाति की संख्या’ और ‘द्रविड़ पहचान’ मायने रखती है। वन्नियार, थेवर और गौंडर जैसी बड़ी जातियों के भारी वोट बैंक के सामने ब्राह्मणों की कम संख्या उन्हें राजनीतिक रूप से ‘कमजोर’ बना देती है। पार्टियों को लगता है कि इन्हें टिकट देने से कोई बड़ा फायदा नहीं होगा, बल्कि दूसरी बड़ी और प्रभावशाली जातियाँ नाराज हो सकती हैं।
तमिलनाडु का यह ‘ब्राह्मण मुक्त’ चुनावी मॉडल भारत के बाकी राज्यों के लिए भी एक बहुत बड़ा उदाहरण या चेतावनी है। यह दिखाता है कि कैसे जातियों को एकजुट करके किसी एक वर्ग को पूरी तरह किनारे लगाया जा सकता है। अगर यही तरीका देश के दूसरे राज्यों में भी फैल गया, तो भविष्य में चुनाव विकास या काम पर नहीं, बल्कि केवल जातियों के सिर गिनने और एक-दूसरे के विरोध पर टिक जाएँगे।


