Tuesday, May 18, 2021
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लहर के साथ आए, वायरस के साए में जाएँगे PK? 2 मई का यह दिन ढलते-ढलते प्रशांत किशोर का भविष्य लिख जाएगा

यह भी दिलचस्प है कि हाल के साक्षात्कारों में प्रशांत किशोर उसी तरह जींस-टीशर्ट में नजर आए हैं, जैसे वे 2014 में राष्ट्रीय पटल पर मोदी के उदय के वक्त दिखते थे। आगे उनका पहनावा कैसा होगा? यह तय होने में कुछ ही घंटे बचे हैं। नया करियर या पुराना धंधा ही नए दरवाजे से?

10 साल के यूपीए कुशासन और मनमोह​न सिंह सरकार की ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ से उपजी निराशा में डूबे भारतीय मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी में तारणहार देखा। यही वजह है कि 2014 के आम चुनावों ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल दी। मोदी ल​हर के साथ कई चीजें उफनाती हुईं राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभर आईं। इनमें से एक प्रशांत किशोर (PK) का नाम भी था। ज्यादातर जींस-टीशर्ट में नजर आने वाला यह शख्स उनके चुनावी कैंपेन से जुड़ा था।

आम चुनावों के कुछ महीनों बाद ही यह स्पष्ट हो गया कि प्रशांत किशोर किसी वैचारिक या राजनीतिक प्रतिबद्धता की वजह से मोदी के कैंपेन से नहीं जुड़े थे। न ही वे उन ‘मल्टीनेशनल युवाओं’ जैसे थे जो अन्ना हजारे की आभा में कैद हो भारत बदलने के सपने लिए राजनीति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े और बाद में अरविंद केजरीवाल नाम का उत्पाद पाकर खुद को छला हुआ महसूस करते हुए गहरे अवसाद में चले गए।

असल में वह तकनीक और आने वाले वक्त को देखने की मोदी की दृष्टि थी, जिसने प्रशांत किशोर को उनके साथ जुड़कर काम करने का मौका दिया। इस मौके से पीके के बॉयोडाटा में मोदी के नाम और चेहरे से पैदा हुई सफलता बेचने के लिए जुड़ गई थी। इसे उन्होंने बेचा, जो कि किसी भी पेशेवर को करना चाहिए।

नरेंद्र मोदी के साथ प्रशांत किशोर (साभार: आउटलुक)

फिर आया 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव। मूल रूप से बिहार के ही बक्सर के रहने वाले प्रशांत किशोर अब नीतीश कुमार की जदयू (JDU) के लिए चुनावी रणनीति तैयार कर रहे थे। उस समय नीतीश की राहें बीजेपी (BJP) से अलग हो चुकी थी और जंगलराज के सरपरस्त लालू यादव की राजद (RJD) उनकी हमसफर थी। ऐसे गठबंधन के चुनावी कैंपेन से पीके के जुड़ने से यह भी स्पष्ट हो गया कि उनके लिए न केवल ​विचारधारा महत्वहीन है, बल्कि आम आदमी की सुरक्षा भी मायने नहीं रखती। उनके लिए करियर, आर्थिक हित ज्यादा जरूरी हैं।

इस समय एक और बदलाव उनमें आया, जिसकी चर्चा न के बराबर हुई। उस समय प्रशांत किशोर पटना में अक्सर जींस-टीशर्ट की जगह सफेद कुर्ता-पायजामा में दिखने लगे। यह संकेत था कि चुनावी रणनीतियों को तैयार करने वाले इस आदमी की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ भी हैं।

बाद के समय में प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में कॉन्ग्रेस, दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) आंध प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी वगैरह को भी अपनी सेवा दी। कुछ सफलताएँ मिली, कुछ असफलताएँ। इस दौरान उनका पहनावा कई बार बदला। वे कुछ समय के लिए बतौर जदयू उपाध्यक्ष सक्रिय तौर पर राजनीति की पिच पर भी उतरे।

उनकी इस यात्रा से लोगों को भी यह समझ आने लगा कि प्रशांत किशोर की कथित रणनीतियों का जलवा तभी चलता है, जब उन्हें किसी ऐसे शख्स का कैपेंन करना हो जिसके लिए जनता पहले से ही अपना मूड बना चुकी होती है। यदि उन्हें कोई बुरा ‘प्रोडक्ट’ सौंप दिया जाए तो उनकी रणनीति उसे जनता के बीच बेच नहीं पाती है।

बतौर जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर का करियर संक्षिप्त और विवादित रहा (साभार: द स्टेट्समैन)

अपने हुनर पर उठते सवालों के बीच ही प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के साथ जुड़े थे। आज (2 मई 2021) यदि इस रिपोर्ट को आप पढ़ रहे हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि आपकी नजरें पश्चिम बंगाल के जनादेश पर टिकी हैं। बंगाल का यह असाइनमेंट प्रशांत किशोर के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। इतना कि बीते साल जब कोरोना संक्रमण की वजह से जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा था, प्रशांत किशोर कार्गो विमान से कोलकाता चले गए थे।

बाद के समय में वे तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) में मची भगदड़ को लेकर चर्चा में रहे। पार्टी को छोड़कर गए ज्यादातर नेताओं ने उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाए। बावजूद वे कभी राष्ट्रीय सुर्खियों में नहीं रहे।

बंगाल चुनाव को लेकर पहली राष्ट्रीय सुर्खी उन्हें अपने एक ट्वीट से नसीब हुई। 21 दिसंबर 2020 को किए गए इस ट्वीट में उन्होंने दावा किया कि बंगाल में बीजेपी की सीट डबल ​डिजिट में होंगी। ट्रिपल डिजिट में सीटें आने पर उन्होंने इस काम से तौबा करने की बात कही। उनका दावा हवा-हवाई न लगे, इसके लिए उन्होंने इस ट्वीट को सहेजकर रखने की चुनौती भी दे डाली।

जब यह ट्वीट आया था तब बंगाल के चुनावी तारीखों का ऐलान नहीं हुआ था। लेकिन, इसने उन्हें टीएमसी के भीतर खुद पर उठते सवालों से छुटकारा पाने का मौका जरूर दे दिया। इससे उन्होंने यह भी निश्चित कर लिया कि किसी भी परिस्थिति में तृणमूल उनकी छुट्टी न करें, क्योंकि ऐसा होने पर यह संदेश जाता कि प्रशांत किशोर और उनके दावे पर खुद ममता बनर्जी को भी भरोसा नहीं है। जब चुनाव कुछ ही महीने दूर हो तो राजनेता इस तरह के नाकारात्मक संदेश देने वाले कदम उठाने से अमूमन बचने की ही जुगत भिड़ाते रहते हैं। राजनीतिक दुकानों में काम करते-करते यह बात प्रशांत किशोर भी भली-भाँति समझते होंगे। सो, पहली नजर में उनका यह ट्वीट सोच-समझकर उठाया गया कदम था।

फिर आया 10 अप्रैल 2021, एक बार फिर प्रशांत किशोर राष्ट्रीय सुर्खियों में थे। इस बार वजह बनी कुछ पत्रकारों के साथ ‘क्लबहाउस‘ पर हुई उनकी बातचीत के लीक अंश। इसमें प्रशांत किशोर बंगाल में मोदी की लोकप्रियता, मटुआ-दलित मतदाताओं के बीजेपी के प्रति झुकाव और मुस्लिम तुष्टिकरण से उपजे हिंदू ध्रुवीकरण का बीजेपी को मिल रहे फायदे को लेकर बात करते सुने गए। इन बातों का लब्बोलुआब यह था कि भाजपा बंगाल के चुनावी मैदान में भारी पड़ रही है। ध्यान देने की बात यह है कि प्रशांत किशोर की ये बातें जब सार्वजनिक पटल पर सामने आईं थी, तब तक बंगाल में केवल चार चरण के चुनाव हुए थे। चार चरण शेष थे।

हालाँकि इसको लेकर प्रशांत किशोर का कहना था कि उनकी बातों को गलत तरीके से पेश किया गया। लेकिन यह भी सच है कि इसके बाद के साक्षात्कारों में वे यह कोशिश करते भी दिखे कि बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस की संभावित हार की छाया उनके बॉयोडाटा पर न पड़े।

ऐसे ही एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि राजनीतिक दल अपनी आंतरिक मजबूती, नेतृत्व और अपने द्वारा किए और न किए गए कार्यों के कारण हारती तथा जीतती हैं। उनके जैसे लोग सिर्फ हार या जीत के अंतर पर फर्क डालने के लिए होते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या वो किसी हारती हुई लड़ाई को जीत में बदल सकते हैं, प्रशांत किशोर का जवाब था- एकदम नहीं

यह सच है कि चुनावी रणनीतिकार कोई जादूगर नहीं होता। प्रशांत किशोर ने सच ही कहा है कि उनके जैसे लोग केवल अंतर में फर्क डाल सकते हैं। लेकिन 21 दिसंबर 2020 को खुद को इतना महत्वपूर्ण साबित करने पर जुटा शख्स, अप्रैल के साक्षात्कारों में इस तरह की बातें करने लगे तो संदेह तो उठते ही हैं। लेकिन, अब तक की हर बातचीत में उन्होंने यह कहा है कि वे 21 दिसंबर के अपने ट्वीट पर आज भी कायम हैं।

‘खाट पर चर्चा ‘ जैसे तमाशों से भी यूपी में 2016 में कॉन्ग्रेसी प्रोडक्ट नहीं बेच पाए थे पीके (साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

यह भी दिलचस्प है कि हाल के साक्षात्कारों में प्रशांत किशोर उसी तरह जींस-टीशर्ट में नजर आए हैं, जैसे वे 2014 में राष्ट्रीय पटल पर मोदी के उदय के वक्त दिखते थे। आगे उनका पहनावा कैसा होगा? यह तय होने में कुछ ही घंटे बचे हैं। नया करियर या पुराना धंधा ही नए दरवाजे से?

जो भी हो उम्मीद की जानी चाहिए कि इतनी राजनीतिक दुकान घुमने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नेताओं से अपने कहे से ही पलट जाने का हुनर नहीं सीखा होगा। वैसे भी यह हुनर नेताओं के लिए ही सही है, जिन्हें लोकतंत्र में हर पाँच साल पर परीक्षा देनी होती है। पेशेवरों को गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर सेकेंड एक इम्तिहान से गुजरना होता है। वायरस के साए में हुए चुनावों के नतीजे वाले दिन प्रशांत किशोर उसी इम्तिहान से गुजर रहे होंगे। टीवी स्क्रीन पर सीटों के बदलते नंबर के साथ ही उनका रक्तचाप भी उतराता रहेगा। दो मई का यह दिन जैसे-जैसे ढलेगा, प्रशांत किशोर का भविष्य लिखता जाएगा।

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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