सूचना का अधिकार यानी RTI एक्ट आज भारत की लोकतंत्र की रीढ़ बन चुका है। कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने RTI को कमजोर कर दिया, सूचनाएँ छिपाई जा रही हैं और पारदर्शिता पर संकट है। खासकर बिहार में हालात ठप होने की बात कही। लेकिन अगर हम आँकड़ों की माने तो तस्वीर बिल्कुल उलट है।
सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (CIC) की ताजा रिपोर्ट्स और सरकारी डेटा साफ बताते हैं कि मोदी सरकार ने RTI को न सिर्फ मजबूत किया, बल्कि इसे और आसान, तेज और पारदर्शी बनाया। कोविड जैसे मुश्किल वक्त में भी RTI का डिस्पोजल रेट बढ़ा, वो भी डिजिटल इंडिया की बदौलत।
कॉन्ग्रेस के आरोप कितने सही, कितने गलत?
दरअसल, कॉन्ग्रेस ने अक्टूबर 2025 में RTI के 20 साल पूरे होने पर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला था। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर लिखा कि सरकार RTI को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। डेटा प्रोटेक्शन लॉ के नाम पर सूचनाएँ रोकने की कोशिश हो रही है।
जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाँच बड़े मुद्दे गिनाए: पीएम की डिग्री, फर्जी राशन कार्ड, नोटबंदी, राफेल डील और इलेक्टोरल बॉन्ड्स। उनका कहना था कि इन मामलों में RTI से सवाल पूछे गए, जिससे सरकार डर गई और 2019 में RTI एक्ट में संशोधन करके सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (CIC) को कमजोर कर दिया। संशोधन से चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर की सैलरी और टेन्योर पर सरकार का कंट्रोल बढ़ गया।
बिहार पर कॉन्ग्रेस ने खास जोर दिया। उनके मीडिया कोऑर्डिनेटर अभय दुबे और राजेश राठौड़ ने कहा कि बिहार में सूचना आयोग ठप है। 2017-18 के बाद कोई वार्षिक रिपोर्ट नहीं आई। 25,101 अपीलें और शिकायतें लंबित हैं और एक केस निपटाने में औसतन पाँच साल लग रहे हैं।
RTI से जुड़े आँकड़ों की सच्चाई
अब आते हैं असल सच्चाई पर, जो आँकड़ों में छिपी है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दिसंबर 2022 में राज्यसभा में RTI की स्थिति पर विस्तार से जवाब दिया था और हाल के डेटा इसे और पुख्ता करते हैं। उनके मुताबिक, मोदी सरकार के पिछले आठ सालों में RTI केस डिस्पोजल रेट लगातार बढ़ा है। कोविड जैसे मुश्किल समय में भी रिजल्ट्स बेहतर रहे। कुछ पीरियड्स में तो कोविड के दौरान डिस्पोजल रेट सामान्य समय से भी ज्यादा था। क्यों? क्योंकि सरकार ने डिजिटल इंडिया के तहत पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन और आसान कर दिया।
यूपीए बनाम मोदी सरकार: आँकड़ों की तुलना

ये आँकड़े साफ दिखाते हैं कि डिस्पोजल रेट में 10% की बढ़ोतरी हुई, कंप्लायंस 17% ऊपर गया और रिजेक्शन रेट कम हुआ। इसका मतलब है कि ज्यादा लोगों को समय पर जवाब मिला और कम आवेदन रिजेक्ट हुए।
क्या कहती है आरटीआई से जुड़ी सीआईसी रिपोर्ट?
2023-24 की CIC रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 17.5 लाख RTI एप्लीकेशन्स फाइल हुईं, जो दस साल पहले के मुकाबले दोगुनी हैं। यानी जनता का RTI पर भरोसा बढ़ा है। डिस्पोजल रेट 90% से ऊपर रहा। नवंबर 2023 में चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर हीरालाल समरिया ने कहा कि वित्त वर्ष में पहली बार 90% से ज्यादा डिस्पोजल रेट हासिल हुआ। पेंडिंग केस 2020-21 के 38,116 से घटकर 2023-24 में 19,233 रह गए। जुलाई 2024 से जून 2025 तक के डेटा में पेनल्टी इम्पोजमेंट सिर्फ 1.2% रहा, लेकिन डिस्पोजल रेट हाई रहा।
जून 2025 तक CIC में 26,800 केस पेंडिंग थे, जो पूरे सिस्टम की तुलना में बेहतर है। सतर्क नागरिक संगठन की एक रिपोर्ट कहती है कि 29 सूचना आयोगों में 4,13,972 केस पेंडिंग हैं, लेकिन डिस्पोजल रेट में सुधार साफ दिखता है।
कैसे हुआ ये कमाल?
तो सवाल ये है कि मोदी सरकार ने ऐसा क्या किया कि RTI इतना बेहतर हुआ? चलिए कुछ पॉइंट्स में समझते हैं-
डिजिटल इंडिया का जादू: साल 2014 में पीएम मोदी ने डिजिटल इंडिया की शुरुआत की, जिसका असर RTI पर भी पड़ा। अब RTI 24 घंटे ऑनलाइन पोर्टल से फाइल हो सकती है। कहीं से भी, कभी भी। ई-ऑफिस, ऑनलाइन ट्रैकिंग और डिजिटल रिकॉर्ड्स ने प्रक्रिया को तेज किया। कोविड में जब सब कुछ बंद था, तब भी ऑनलाइन सिस्टम की वजह से CIC का काम नहीं रुका।
हाइब्रिड हियरिंग्स: CIC ने फिजिकल और वर्चुअल, दोनों तरह की हियरिंग्स शुरू कीं। ऑडियो-वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अपीलकर्ता और जवाबदेही अधिकारी आसानी से जुड़ सके। इससे समय बचा और ज्यादा केस निपटे।
टाइमलाइन्स की सख्ती: मोदी सरकार ने टाइमलाइन्स फिक्स किए। फर्स्ट अपील 30 दिन में, सेकंड अपील 45 दिन में। थर्ड अपील में भी समय सीमा तय की गई। अगर कोई अधिकारी देरी करता है, तो पेनल्टी का प्रावधान है। 2023-24 में सिर्फ 1.2% केस में पेनल्टी लगी, यानी ज्यादातर समय पर जवाब दे रहे हैं।
पब्लिक अथॉरिटीज की जवाबदेही: देश में करीब 25,000 पब्लिक अथॉरिटीज हैं, जो RTI के तहत जवाब देती हैं। इनका एनुअल रिटर्न फाइलिंग रेट 92% से ज्यादा है, जो यूपीए के समय 77% था। ये दिखाता है कि सरकारी दफ्तर अब ज्यादा जिम्मेदार हो गए हैं।
बजट आवंटन में भी इजाफा: CIC को 2023-24 में ₹120 करोड़ मिले, जिसमें ₹110 करोड़ खर्च भी हुए। इस दौरान स्टाफ बढ़ा और 500 CPIOs के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाया गया। इस रिपोर्ट के चैप्टर 3 में CIC की एक्टिविटीज हैं: 19 इनकंबेंट्स, 28,000 अपील्स डिस्पोज्ड। पेनल्टी रियलाइजेशन 95 लाख रुपए। ये सब दिखाता है कि सिस्टम पहले से मजबूत है।
CIC में वैकेंसीज पर कंट्रोल: पहले कमीशन में कमिश्नर्स की कमी रहती थी, जिससे केस लटकते थे। अब सरकार समय पर वैकेंसीज भर रही है। जितेंद्र सिंह ने कहा कि सभी मेंबर्स की नियुक्ति समय पर हो रही है, जिससे सिस्टम तेज हुआ।
एआई और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल: CIC ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल शुरू किया है। RTI पैटर्न एनालाइज करने और अप्लिकेंट्स की क्रेडेंशियल्स चेक करने में AI मदद कर रहा है। इससे फर्जी या गैरजरूरी आवेदनों को जल्दी छाँटा जा रहा है।
बिहार का क्या हाल?
बिहार स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन में 25,101 केस पेंडिंग हैं और एक केस निपटाने में पाँच साल लग रहे हैं। 2017-18 के बाद वार्षिक रिपोर्ट नहीं आई, जो चिंता की बात है। लेकिन ये स्टेट लेवल की कमी है, जिसकी जिम्मेदारी नीतीश सरकार की है। सेंट्रल लेवल पर मोदी सरकार ने गाइडलाइंस दीं और सिस्टम सुधारा, लेकिन स्टेट्स को भी इसे लागू करना होगा। बिहार में सुधार की जरूरत है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सेंट्रल RTI सिस्टम कमजोर है।
RTI से मिली कामयाबियाँ
RTI ने पिछले कुछ सालों में कई बड़े खुलासे किए। चाहे वो सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार हो, राशन कार्ड की धाँधली हो या स्कॉलरशिप की गड़बड़ी, RTI से लाखों लोगों को उनके हक मिले। मिसाल के तौर पर-
- मनरेगा में मजदूरी के भुगतान की जानकारी RTI से मिली, जिससे हजारों मजदूरों को समय पर पेमेंट हुआ।
- पेंशन स्कीम्स में गड़बड़ियाँ उजागर हुईं, जिससे बुजुर्गों को लाभ मिला।
- सरकारी जमीनों के गलत आवंटन के केस सामने आए, जिससे भ्रष्टाचार रुका।
2023-24 में 17.5 लाख RTI फाइलिंग्स दिखाती हैं कि लोग अब ज्यादा जागरूक हैं। रिजेक्शन रेट सिर्फ 5.65% रहा, यानी ज्यादातर लोगों को जवाब मिला।

RTI की शुरुआत और इसका मकसद
RTI एक्ट 2005 में यूपीए सरकार के समय लागू हुआ था। इसका मकसद था आम लोगों को सरकार से सवाल पूछने का हक देना। चाहे वो राशन कार्ड हो, पेंशन हो, स्कॉलरशिप हो या सरकारी योजनाओं की जानकारी, RTI ने जनता को ताकत दी कि वो बिना डरे जवाब माँग सके।
इस कानून ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और पारदर्शिता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ इसकी प्रक्रिया में कुछ दिक्कतें भी सामने आईं, जैसे देरी, रिजेक्शन और जटिल प्रक्रिया। यूपीए के समय RTI ने अच्छा काम किया, लेकिन मोदी सरकार ने इसे और बेहतर करने की ठानी।
मोदी सरकार ने RTI को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। डिजिटल सिस्टम, तेज डिस्पोजल, कम रिजेक्शन और सख्त टाइमलाइन्स ने इसे जनता के लिए और सुलभ बनाया। लेकिन कुछ चुनौतियाँ अभी बाकी हैं। बिहार जैसे राज्यों में स्टेट कमीशन्स को मजबूत करना होगा। एक्टिविस्ट्स की सेफ्टी के लिए और सख्त कानून चाहिए। साथ ही जनता को RTI के सही इस्तेमाल की जागरूकता बढ़ानी होगी, ताकि फर्जी आवेदन कम हों।
आँकड़े झूठ नहीं बोलते। यूपीए के 81% डिस्पोजल से मोदी सरकार के 94% तक पहुँचना छोटी बात नहीं। डिजिटल इंडिया ने RTI को नई ताकत दी। कॉन्ग्रेस के आरोपों में बिहार की बात को छोड़कर ज्यादातर दम नहीं दिखता। अगर बिहार में दिक्कत है, तो नीतीश सरकार को जवाब देना चाहिए। सेंट्रल लेवल पर RTI आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। ये पारदर्शिता और जवाबदेही की जीत है। उम्मीद है कि सरकार और विपक्ष मिलकर इसे और बेहतर बनाएँगे।


