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राजकुमार भाटी की माफी भले लगे मासूम, पर ‘ब्राह्मण घृणा’ दिखाते समय सपा नेता की हँसी नहीं थी मासूम: जानिए जवाहर भवन में ‘जाति’ के नाम पर क्यों जुटे वामपंथी

आज जब सपा नेता राजकुमार भाटी अपनी किए पर माफी माँग रहे हैं, तो यह उनके दिल की आवाज नहीं है, बल्कि गिरफ्तारी और राजनीतिक नुकसान का डर उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रहा है। उनके फेसबुक Video की भाव-भंगिमा, पीछे से आती समर्थकों की आवाजें और उनकी खिलखिलाहट चीख-चीख कर कह रही है कि उनके मन में हिंदुओं के प्रति कितनी नफरत भरी है।

समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार भाटी की यह कहानी शुरू होती है दिल्ली के एक ऐसे मंच से, जहाँ उन्होंने ‘समाजवाद’ का मुखौटा पहनकर हिंदू समाज के विरुद्ध नफरत की पटकथा लिखी। वामपंथियों और कट्टरपंथियों के जमावड़े के बीच खड़े होकर समाजवादी पार्टी के नेता राजकुमार भाटी ने जब ब्राह्मणों की तुलना वेश्याओं से की और उन्हें उनसे भी बदतर बताया, तो उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं बल्कि एक जहरीली ‘खिलखिलाहट’ थी। मंच पर गूँजते ठहाके और भाटी साहब की घृणा भरी मुस्कान गवाही दे रही थी कि यह सिर्फ एक मुहावरा नहीं, बल्कि उनके भीतर गहरे पैठी सनातन विरोधी सोच का प्रदर्शन था।

लेकिन जैसे ही कानून का शिकंजा कसा और गिरफ्तारी की आहट सुनाई दी, भाटी साहब ने तुरंत हाथ जोड़कर ‘बिना शर्त माफी’ का ढोंग शुरू कर दिया। हालाँकि, खुद उनके द्वारा साझा किया गया Video उनकी इस मजबूरी वाली माफी की पोल खोल देता है, जिसमें वे नफरत भरे बोल पढ़ते हुए आज भी मुस्कुरा रहे हैं और पीछे से उनके समर्थक इस अपमान के ‘पोस्टर’ लगवाने की माँग कर रहे हैं। चलिए, नफरत, चालाकी और चुनावी डर से बुनी इस पूरी कहानी को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

नफरत का वह मंच जहाँ ब्राह्मणों की तुलना वेश्याओं से की

कहानी शुरू होती है 5 मई 2026 को। दिल्ली का जवाहर भवन, जो सोनिया गाँधी परिवार के ‘राजीव गाँधी फाउंडेशन’ से जुड़ा है, वहाँ एक किताब के विमोचन का कार्यक्रम चल रहा था। किताब का नाम था- ‘जाति और साम्प्रदायिकता के विषाणु’। विडंबना देखिए, किताब लिखने वाले दो मुस्लिम लेखक (डॉ रफरफ शकील अंसारी और जावेद अनवर) अपने समाज की कुरीतियों जैसे हलाला या तीन तलाक पर नहीं, बल्कि हिंदू समाज की जातियों पर जहर उगलने के लिए कलम चला रहे थे।

इसी मंच पर राजकुमार भाटी ने अपना भाषण शुरू किया। उन्होंने एक पुराना दोहा सुनाया, “ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोय! और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।” इसका सीधा मतलब यह था कि उनके लिए ब्राह्मण वेश्याओं से भी गए-गुजरे हैं।

वामपंथियों का साथ और वह जहरीली खिलखिलाहट

इस मंच पर भाटी साहब अकेले नहीं थे। उनके साथ योगेंद्र यादव, प्रोफेसर रतन लाल, आशुतोष और शीबा असलम फहमी जैसे लोग बैठे थे, जिनका इतिहास ही हिंदू धर्म पर विवादित बयान देने का रहा है। जब राजकुमार भाटी ब्राह्मण समाज का अपमान कर रहे थे, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी नफरत भरी मुस्कुराहट थी। पूरे भाषण के दौरान वे कभी इतना नहीं हँसे होंगे, जितना ब्राह्मणों पर भद्दी टिप्पणी को बोलते हुए खिलखिला रहे थे।

हैरानी की बात यह है कि वहाँ बैठा ‘बुद्धिजीवी’ समाज इस अपमान पर तालियाँ बजा रहा था। भीड़ के बीच से तो किसी ने यहाँ तक कह दिया, “भाटी जी, इसका पोस्टर लगवा दीजिए!” यह साबित करता है कि वहाँ जुटे लोग किसी चर्चा के लिए नहीं, बल्कि एक खास समाज को नीचा दिखाने के लिए इकट्ठा हुए थे।

माफी का ढोंग: जब चुनाव और जेल का डर सताया

जैसे ही भाटी साहब का ब्राह्मणों के प्रति नफरत का Video वायरल हुआ, लोगों में गुस्सा फूट पड़ा। जैसे ही गाजियाबाद में FIR दर्ज हुई, तो भाटी साहब तुरंत बैकफुट पर आ गए। इसके बाद उन्होंने 5 मिनट का एक Video डाला और खुद को उसमें बेचारा दिखाते हुए बोले, “7 सेकंड की क्लिप काटकर मुझे बदनाम किया जा रहा है।” उन्होंने खुद को बचाने के लिए ‘गुर्जर-यादव’ वाले मुहावरों का भी सहारा लिया, लेकिन हकीकत यह है कि उनका पूरा निशाना ब्राह्मण ही थे।

वीडियो में वे हाथ तो जोड़ रहे हैं, लेकिन उनकी आँखों में पछतावा नहीं, बल्कि चालाकी दिख रही है। फेसबुक पर शेयर की गई उस Video में साफ-साफ दिखाई देता है कि भाटी साहब पहले से ही ब्राह्मणों के खिलाफ लिखकर लाए थे और फिर कागज से पढ़कर लोगों को मुहावरे सुनाकर बीचों-बीच ठहाके मारकर हँस रहे थे। एक तरह से भाटी साहब वहाँ पुस्तक विमोचन करने नहीं, बल्कि वामपंथियों का मनोरंजन करने गए थे।

माफी माँगने वाली Video में भाटी साहब ने यह भी कह दिया कि ‘कुछ भोले-भाले लोग BJP के बहकावे में आकर उनके खिलाफ अभियान चलाने लग जाते हैं।’ मगर सच तो यह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और ब्राह्मणों की नाराजगी कहीं वोटों का खेल न बिगाड़ दे, इसलिए यह ‘माफी का ढोंग’ रचा गया।

आदतन हिंदू विरोधी हैं भाटी साहब

सपा नेता राजकुमार भाटी की ये बातें कोई नई नहीं हैं, वे पहले भी कई बार हिंदू धर्म और परंपराओं के खिलाफ जहर उगल चुके हैं। उन्होंने भगवान राम तक पर टिप्पणी करने से परहेज नहीं किया। एक बार उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि अगर वे राम होते, तो ब्राह्मणों को पाखंड छोड़ने की सलाह देते।

राजकुमार भाटी के लिए हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ भी कोई खास मायने नहीं रखते। वे मनुस्मृति को ‘घटिया’ बताते हैं और रामचरितमानस जैसी महान रचना को भगवान का ग्रंथ मानने के बजाय सिर्फ एक ‘साधारण कविता’ कहते हैं।

यही नहीं, भगवान के अस्तित्व पर भी उनके विचार काफी अजीब हैं। वे कहते हैं कि उन्हें मंदिर जाने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती, क्योंकि वे अभी इस बात पर ‘रिसर्च’ कर रहे हैं कि दुनिया में भगवान है भी या नहीं। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ एक तरफ वे हिंदू देवी-देवताओं पर सवाल उठाते हैं, वहीं दूसरी तरफ TV पर खुलेआम यह कहते हैं कि वे मोहम्मद साहब से बड़ा महापुरुष किसी और को नहीं मानते।

उनकी ये बातें साफ दिखाती हैं कि उनकी सोच एकतरफा और सनातन धर्म के प्रति नफरत से भरी हुई है। इसके अलावा, राजकुमार भाटी ने पुराने ट्वीट में ब्राह्मणवाद को ‘वायरस’ कहा था और इसकी वैक्सीन खोजने की बात कही थी।

असली चेहरा बनाम समाजवादी मुखौटा

आज जब सपा नेता राजकुमार भाटी अपनी किए पर माफी माँग रहे हैं, तो यह उनके दिल की आवाज नहीं है, बल्कि गिरफ्तारी और राजनीतिक नुकसान का डर उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रहा है। उनके फेसबुक Video की भाव-भंगिमा, पीछे से आती समर्थकों की आवाजें और उनकी खिलखिलाहट चीख-चीख कर कह रही है कि उनके मन में हिंदुओं के प्रति कितनी नफरत भरी है।

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