जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल 2026 के विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है, राज्य का माहौल राजनीतिक तनाव से भरा हुआ है। दार्जिलिंग के चाय बागानों से लेकर हुगली के औद्योगिक इलाकों और दक्षिण के तटीय गाँवों तक, हर कोना एक निर्णायक पल के लिए तैयार खड़ा है।
‘माँ, माटी, मानुषट जैसे नारों से आगे बढ़कर देखें तो एक अध्ययन यह दिखाता है कि जो राज्य कभी भारत की सबसे मजबूत आर्थिक ताकतों में गिना जाता था, वह धीरे-धीरे कर्ज और गिरावट के चक्र में फंसता गया। पहले वाम मोर्चा के लंबे शासन में और अब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के पिछले पंद्रह सालों में।
2011 के बाद से संरचनात्मक गिरावट
Finskeptics की वित्तीय रिपोर्ट के अनुसार, जब नई सरकार आई थी तो उम्मीद थी कि औद्योगिक ठहराव खत्म होगा और एक ‘नई सुबह’ आएगी। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था की कमजोरियाँ खत्म नहीं हुईं, बल्कि और गहरी हो गई हैं।
राज्य सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं का एक बड़ा नेटवर्क जरूर खड़ा किया है, जिससे गरीबों को तुरंत राहत मिलती है, लेकिन अर्थव्यवस्था का ‘इंजन’ कमजोर पड़ रहा है। सरकार ज्यादा से ज्यादा पैसा बाँटने में लगा रही है, जबकि भारी उद्योग और आईटी जैसे उत्पादक क्षेत्र पीछे छूटते जा रहे हैं। इसका असर बड़े संकेतकों में साफ दिखता है।
पश्चिम बंगाल का राष्ट्रीय GDP में हिस्सा घट रहा है, प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे है और हजारों कंपनियाँ राज्य छोड़कर जा चुकी हैं। निवेश का माहौल भी प्रभावित हुआ है। ‘कट मनी’ जैसे अनौपचारिक खर्च और मजदूर मामलों में राजनीतिक दखल ने निवेशकों का भरोसा कम किया है। बुनियादी ढाँचे की कमी और फैक्ट्रियों के बंद होने से औद्योगिक ढाँचा और कमजोर हुआ है।
एक औद्योगिक दिग्गज का लंबा पतन
इतिहास में पश्चिम बंगाल भारत के उद्योग का केंद्र था। आजादी के बाद यह देश के GDP में करीब 10% योगदान देता था। यह इंजीनियरिंग कंपनियों, जूट मिलों और पूर्वी भारत की व्यापारिक राजधानी के रूप में जाना जाता था। लेकिन पिछले सात दशकों में हालात और नीतियों के कारण इसकी नींव कमजोर होती गई।
बंटवारे का झटका, ‘फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी’ जिसने खनिज आधारित उद्योगों में बंगाल की बढ़त खत्म कर दी और वाम शासन के दौरान उग्र मजदूर आंदोलन इन सबने गिरावट को लगातार बढ़ाया। 1960 में पश्चिम बंगाल भारत का तीसरा सबसे अमीर राज्य था। 2024 तक यह 24वें स्थान पर पहुँच गया।

EAC-PM की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का राष्ट्रीय GDP में हिस्सा 1960-61 के 10.5% से घटकर 2023-24 में सिर्फ 5.6% रह गया, यह किसी भी बड़े राज्य के लिए सबसे तेज गिरावट है। और भी चौंकाने वाली बात यह है कि प्रति व्यक्ति आय, जो कभी राष्ट्रीय औसत से 127.5% ज्यादा थी, अब घटकर 83.7% रह गई है।

ओडिशा जैसे राज्य, जो कभी पीछे माने जाते थे, अब आगे निकल रहे हैं। इस लंबे पतन को अक्सर ‘बंगाल कर्स’ कहा जाता है, जो अलग-अलग सरकारों की नीतिगत गलतियों का जमा हुआ नतीजा है।
वर्तमान वित्तीय संकट: विकास की कीमत पर कल्याण
TMC सरकार के दौरान राज्य की वित्तीय स्थिति और नाजुक हो गई है। राज्य अब ऐसे चक्र में फंस गया है जहाँ वह रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए कर्ज ले रहा है, बजाय भविष्य के लिए संपत्ति बनाने के। राज्य का कर्ज 7.7 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो चुका है और राजकोषीय घाटा लगातार ऊँचा बना हुआ है।
कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च खासकर चुनावों के आसपास तेजी से बढ़ता है, लेकिन पूंजीगत निवेश पीछे रह जाता है। सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज का ब्याज, वेतन और पेंशन में चला जाता है। इससे नई सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएँ बनाने के लिए बहुत कम पैसा बचता है, जो असल में निवेश और रोजगार लाते हैं।
मुख्य संकेतक इस असंतुलन को दिखाते हैं, राज्य की अपनी टैक्स आय की वृद्धि कमजोर है, क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो कम है और विदेशी निवेश भी सीमित है। MSME सेक्टर संख्या में बड़ा जरूर है, लेकिन ज्यादातर इकाइयाँ बहुत छोटी हैं और बड़े स्तर पर रोजगार देने में सक्षम नहीं हैं।
राजकोषीय और कर्ज का बढ़ता बोझ
2011 में जब TMC सत्ता में आई थी, तब राज्य का कर्ज लगभग 1.92 लाख करोड़ रुपए था। 2025-26 तक यह बढ़कर 7.7 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान है, यानी सिर्फ 15 साल में चार गुना। आज हर नागरिक पर औसतन करीब 70,653 रुपए का कर्ज है।
सरकार अपनी कमाई का 20% से 28% सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च कर रही है, जबकि दूसरे राज्यों में यह 5% से 15% के बीच होता है। सबसे बड़ी चिंता ‘रेवेन्यू डेफिसिट’ है। यानी राज्य कर्ज लेकर सब्सिडी और प्रशासनिक खर्च चला रहा है, न कि इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है।

वित्तीय वर्ष 2024-25 में राजकोषीय घाटा 4.02% तक पहुँच गया, जो सुरक्षित सीमा 3% से ज्यादा है। 2020 से 2025 के बीच राज्य ने 1.49 लाख करोड़ रुपए का राजस्व घाटा जमा किया। राज्य की पूंजीगत आय का 80% हिस्सा कर्ज से आ रहा है, यानी उधार पर सिस्टम चल रहा है।
औद्योगिक पलायन: क्यों जा रही हैं कंपनियाँ?
2011 के बाद से 6,600 से ज्यादा कंपनियाँ, जिनमें 110 सूचीबद्ध कंपनियाँ भी शामिल हैं, पश्चिम बंगाल छोड़ चुकी हैं। यह सिर्फ अस्थायी गिरावट नहीं, बल्कि पूंजी का स्थायी पलायन है। कंपनियाँ महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जा रही हैं, क्योंकि वहाँ का माहौल ज्यादा अनुकूल है।

राज्य में ‘बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट’ जैसे बड़े आयोजन होते हैं और बड़े निवेश के वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर केवल करीब 4% प्रस्ताव ही लागू हो पाते हैं। एक बड़ा कारण ‘सिंडिकेट सिस्टम’ है, जहाँ राजनीतिक समर्थन वाले समूह निर्माण सामग्री और मजदूरों पर नियंत्रण रखते हैं और ‘कट मनी’ माँगते हैं।
इसके अलावा ‘घेराव’ संस्कृति भी नए रूप में वापस आई है, जिससे TMC शासन में 177 फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, जबकि पिछली सरकार में यह संख्या 83 थी। औद्योगिक उत्पादन भी घटकर 13.5% से सिर्फ 3.9% रह गया है।
श्रम और क्षेत्रीय संकट: पतन की मानवीय कीमत
आर्थिक संकट का असर सीधे लोगों की जिंदगी पर पड़ा है। रोजगार की कमी के कारण पश्चिम बंगाल अब देश के सबसे बड़े श्रम आपूर्तिकर्ता राज्यों में से एक बन गया है। 2025 तक करीब 22.4 लाख मजदूर राज्य से बाहर केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में काम कर रहे हैं।
यह एक तरह से ‘खामोश जनमत’ है कि अगर राज्य में अवसर होते, तो लोग अपने घर छोड़कर बाहर काम करने नहीं जाते। उत्तर बंगाल के चाय बागानों में स्थिति बेहद गंभीर है। 2025 में उत्पादन 50-60% तक गिर गया और 80% बागान घाटे में हैं।
मजदूरी में भारी अंतर है, जहाँ सिक्किम में 500 रुपए रोज मिलते हैं, वहीं बंगाल में सिर्फ 250 रुपए मिलते हैं। इसका नतीजा कुपोषण और एनीमिया के रूप में सामने आया है। अलीपुरद्वार जिले में 36% मजदूर कुपोषित हैं और 88% एनीमिया से पीड़ित हैं। कुछ बंद बागानों में तो लोग भूख से मरने तक की स्थिति में पहुँच गए हैं।
व्यापक आर्थिक कमजोरी: बाकी राज्यों से पीछे
मैक्रो स्तर पर भी पश्चिम बंगाल पीछे रह गया है। राज्य का GDP में हिस्सा घट चुका है और प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे है। वित्तीय वर्ष 25 में राज्य की विकास दर सिर्फ 9.91% रही, जो बड़े राज्यों में सबसे कम है। क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो 46% से 52% के बीच है, जो राष्ट्रीय औसत से करीब 30% कम है।
इसका मतलब है कि यहाँ जमा पैसा दूसरे राज्यों में निवेश हो रहा है। MSME सेक्टर में 99.9% इकाइयाँ माइक्रो हैं यानी छोटे स्तर की, जो बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं दे सकतीं। 2019 से 2024 के बीच 2,200 से ज्यादा MSMEs बंद हो चुके हैं। राज्य का खुद का टैक्स संग्रह भी कमजोर है और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च 5.3% से घटकर सिर्फ 3% रह गया है।
इन सभी आँकड़ों से एक साफ और चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। पश्चिम बंगाल एक उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था से हटकर निर्भरता आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यह औद्योगिक रोजगार से हटकर प्रवासी मजदूरों की कमाई पर निर्भर होता जा रहा है। राज्य का आर्थिक हिस्सा घट रहा है, फैक्ट्रियाँ बंद हो रही हैं और कर्ज बढ़ता जा रहा है।
आज की आर्थिक चुनौतियाँ किसी अस्थायी मंदी का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरे संरचनात्मक असंतुलन का नतीजा हैं। कल्याणकारी खर्च बढ़ाने के साथ उत्पादन, निवेश और उद्योग पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिससे यह कमजोर आर्थिक मॉडल बन गया है। उच्च कर्ज, कम निवेश, उद्योगों का पलायन और बढ़ता प्रवासन, ये सभी उसी असंतुलन के जुड़े लक्षण हैं।
यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
url- West Bengal economy witnessed massive decline under TMC government after 2011


