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महिला आरक्षण में दुनिया से पिछड़ा भारत, ग्लोबल रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: जानें किन देशों ने दी 50% हिस्सेदारी और कहाँ खड़ा है अपना देश

राजनीति में महिलाओं का आना सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है। इसका गहरा असर देश की नीतियों और शासन पर पड़ता है। जब महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो नियम-कानून ज्यादा समावेशी और सबके भले के लिए बनते हैं। यह समाज के उन पुराने ढांचों को भी तोड़ता है जहाँ ताकत सिर्फ पुरुषों के हाथ में रही है, और महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अपना हक माँगने के लिए प्रेरित करता है।

भारतीय संसद में महिलाओं को आरक्षण देने की कोशिश तब नाकाम हो गई, जब साल 2023 का महिला आरक्षण कानून (106वाँ संशोधन) संसद की कार्यवाही में अटक गया। अगर आज के हालात देखें, तो देश चलाने में महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है। लोकसभा में केवल 14% और राज्यसभा में 17% महिलाएँ हैं।

यह संख्या दुनिया के औसत (26%) से भी काफी कम है। सच तो यह है कि बड़े पदों पर महिलाओं का न होना सिर्फ भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की एक पुरानी समस्या है। कहने को तो भारत ने नया कानून पास करके महिलाओं को बराबरी का हक देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है, लेकिन हकीकत यह है कि यह कानून दो साल से सिर्फ कागजों पर ही है और इसके लागू होने का इंतजार खत्म ही नहीं हो रहा।

राजनीति और समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक देने की यह बहस किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। संयुक्त राष्ट्र ने भी 2030 तक जो लक्ष्य तय किए हैं, उनमें ‘लैंगिक समानता’ (स्त्री-पुरुष को बराबर हक) एक मुख्य लक्ष्य है। यह साफ है कि जब तक देश के नियम बनाने में महिलाओं की बराबर की भागीदारी नहीं होगी, तब तक समानता की बात करना बेकार है।

अच्छी बात यह है कि भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो इसके लिए कानूनी कोशिश कर रहा है। दुनिया के कई अन्य देशों ने भी महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। कुछ देशों ने संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कर दी हैं, तो कुछ ने राजनीतिक पार्टियों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे चुनाव में एक तय संख्या में महिलाओं को टिकट जरूर दें।

यहाँ उन देशों की लिस्ट दी गई है जिन्होंने महिलाओं को राजनीति में बराबर का हक देने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। इन देशों ने अपनी संसद या स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की हैं या चुनाव में उम्मीदवारों के लिए कोटा तय किया है।

नेपाल

नेपाल में महिलाओं के लिए संसद की 33% सीटें आरक्षित हैं। यहाँ के निचले सदन (Lower House) में महिलाओं के लिए 33% और ऊपरी सदन (Upper House) में 2% कोटा तय है। इसके अलावा, स्थानीय स्तर (नगर निकाय/पंचायत) पर भी महिलाओं के लिए 33% भागीदारी अनिवार्य की गई है।

पाकिस्तान

पाकिस्तान में महिलाओं के लिए कोटा तय करने की शुरुआत तो 1965 में ही हो गई थी। लेकिन साल 2002 के बाद से वहाँ की नेशनल असेंबली (संसद) में महिलाओं की कम से कम भागीदारी 17% तय कर दी गई है।

बांग्लादेश

बांग्लादेश की संसद (जातीय संसद) के निचले सदन में कम से कम 14% सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए रखी गई हैं। वहीं, स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए यह कोटा 33% तय किया गया है।

श्रीलंका

श्रीलंका ने भी महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए कदम उठाए हैं। यहाँ स्थानीय स्तर (Sub-national level) के निकायों में महिलाओं के लिए 25% कोटा तय किया गया है।

संयुक्त अरब अमीरात (UAE)

इस खाड़ी देश ने अपनी नेशनल काउंसिल के निचले सदन में महिलाओं के लिए 50% कोटा तय किया है, जो समानता की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।

इंडोनेशिया

यहाँ संसद के निचले सदन और स्थानीय स्तर, दोनों ही जगह महिलाओं के लिए कम से कम 30% भागीदारी तय की गई है।

यूनान (ग्रीस)

यूनान की संसद के निचले सदन और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 40% सीटें आरक्षित रखी गई हैं।

इटली

इटली में संसद के दोनों सदनों (ऊपरी और निचले) में महिलाओं के लिए 40% सीटें तय हैं। साथ ही, स्थानीय स्तर पर भी 40% आरक्षण दिया गया है। यहाँ की राजनीतिक पार्टियों ने खुद आगे बढ़कर महिलाओं को टिकट देने का कोटा अपनाया है।

स्पेन

स्पेन में निचले सदन में 40% और ऊपरी सदन में 50% सीटें महिलाओं के लिए हैं। स्थानीय स्तर पर भी 40% सीटें आरक्षित हैं। इटली की तरह यहाँ की पार्टियों ने भी चुनाव में महिलाओं को करीब 44% टिकट देने का नियम खुद बनाया है।

नार्वे

इस देश ने स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए 40% कोटा तय कर रखा है।

दुनिया भर के मौजूदा हालात

हैरानी की बात यह है कि अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन जैसे बड़े पश्चिमी देशों में महिलाओं के लिए संसद में कोई सीटें आरक्षित नहीं हैं। अगर 1 जनवरी 2026 तक के आँकड़ों को देखें, तो दुनिया के सिर्फ 28 देशों में 30 महिलाएँ सरकार या देश की प्रमुख (जैसे राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री) के तौर पर काम कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN Women) के डेटा के मुताबिक, दुनिया भर के मंत्रालयों में केवल 22.4% महिलाएँ ही कैबिनेट मंत्री के पद पर हैं।

समानता अभी भी कोसों दूर

एक अनुमान के मुताबिक, जिस रफ्तार से अभी सुधार हो रहा है, उस हिसाब से राजनीति में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक मिलने में 2063 तक का समय लग सकता है। भले ही दुनिया के अमीर और गरीब दोनों तरह के देशों में बराबरी का यह लक्ष्य अभी दूर है, लेकिन सीटों का आरक्षण इस दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम साबित हुआ है।

क्यों जरूरी है महिलाओं की भागीदारी?

राजनीति में महिलाओं का आना सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है। इसका गहरा असर देश की नीतियों और शासन पर पड़ता है। जब महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो नियम-कानून ज्यादा समावेशी और सबके भले के लिए बनते हैं। यह समाज के उन पुराने ढांचों को भी तोड़ता है जहाँ ताकत सिर्फ पुरुषों के हाथ में रही है, और महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अपना हक माँगने के लिए प्रेरित करता है।

(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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