Saturday, June 12, 2021
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‘2015 से ही कोरोना वायरस को हथियार बनाना चाहता था चीन’, चीनी रिसर्च पेपर के हवाले से ‘द वीकेंड’ ने किया खुलासा: रिपोर्ट

"मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि चीनी वैज्ञानिक कोरोना वायरस के अनेक रूपों को मिलिट्री वेपन के तौर पर इस्तेमाल करने के बारे में सोच रहे हैं। वे यह सोच रहे हैं कि इसे कहाँ डिप्लॉय किया जाय।”

दुनियाभर में कोरोना वायरस के कहर के बीच “द वीकेंड ऑस्ट्रेलियन” मैग्जीन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। मैग्जीन ने 6 साल पहले 2015 के चीनी वैज्ञानिकों के रिसर्च पेपर के जरिए दावा किया है कि SARS कोरोना वायरस के जरिए चीन दुनिया के खिलाफ जैविक हथियार बना रहा था।

“द अननैचुरल ओरिजिन ऑफ सार्स एंड न्यू स्पीसीज ऑफ मैन-मेड वायरस टू जेनेटिक बायो वेपन” शीर्षक वाले इस शोध पत्र में चीनी वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य अधिकारियों ने भविष्यवाणी की थी कि किस तरह से तीसरे विश्व युद्ध में “जैविक हथियारों” का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे SARS कोरोनावायरस को “जेनेटिक हथियारों” के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें कृत्रिम रूप से हेरफेर करके मानव रोग वायरस में बदला जा सकता है। वैज्ञानिकों ने इस बात पर भी चर्चा की है कि इस वायरस को ऐसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसे पहले कभी नहीं देखा गया होगा।

रिसर्च पेपर की यह हैरान करने वाली जानकारी 6 साल पहले प्रकाशित हुई थी, लेकिन कोरोना के कारण उपजे वैश्विक संकट से यह अस्वाभिक रूप से समानता है। ऑस्ट्रेलियाई रणनीतिक संस्थान के कार्यकारी निदेशक पीटर जेनिंग्स ने डॉक्यूमेंट्स में “स्मोक गन” के रूप में इस रहस्य पर से पर्दा उठाया है। उन्होंने इस मामले में जोर देकर कहा, “मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि चीनी वैज्ञानिक कोरोना वायरस के अनेक रूपों को मिलिट्री वेपन के तौर पर इस्तेमाल करने के बारे में सोच रहे हैं। वे यह सोच रहे हैं कि इसे कहाँ डिप्लॉय किया जाय।”

कोरोना वायरस की स्वतंत्र जाँच से पीछे हट रहा चीन

जेनिंग्स कहते हैं, “इसे इस बात की संभावनाओं के बारे में जानने के लिए शुरू किया गया था कि वायरस का सैन्य इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर इसका फैलाव होता है तो इससे चीन को मदद मिलेगी। लेकिन हम इसके उलट हैं।” एएसपीआई के कार्यकारी निदेशक ने बताया कि कैसे कोरोना वायरस की उत्पत्ति की स्वतंत्र जाँच कराने से चीन बचता रहा है।

रिसर्च पेपर में पीएलए के समर्थन वाले कई लेखक थे

इस रिसर्च पेपर के 18 राइटर्स में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) से जुड़े वैज्ञानिक और हथियार विशेषज्ञ शामिल हैं। इसे साइबर वेरीफिकेशन एक्सपर्ट रॉबर्ट पॉटर ने वेरिफाई किया था। रॉबर्ट पॉटर ने इसको लेकर कहा था, “हम एक हाई कॉन्फिडेंस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ये जेनुइन है। लेकिन अब यह किसी और पर निर्भर है कि यह कितना गंभीर है। इसे कुछ साल पहले ही ईजाद किया गया था अब चीन इसे निश्चित तौर पर हटाने की कोशिश करेगा। अब इसे कवर किया गया है।”

हालाँकि, रॉबर्ट पॉटर ने चीनी वैज्ञानिकों के रिसर्च पर चर्चा करने को लेकर संदेह व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि यह खुद से ही नहीं बना, बल्कि चीनी सरकार द्वारा इस पर कार्रवाई की गई थी। रॉबर्ट पॉटर आगे लिखते हैं, “यह हकीकत में बहुत ही दिलचस्प लेख है, जिसके जरिए यह दिखाया जा सके कि उनके वैज्ञानिक और शोधकर्ता क्या सोच रहे हैं।” जब कोरोना वायरस की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम ने चीन का दौरा किया था, तब इसका उल्लेख किया जाना चाहिए था।

वैज्ञानिकों ने डब्ल्यूएचओ की जाँच में खामियों की ओर किया इशारा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और चीनी विशेषज्ञ मिशन की संयुक्त टीम ने दावा किया है कि कोरोना वायरस दिसंबर 2019 से पहले चीन के वुहान प्रांत में था ही नहीं। बीते 4 मार्च को वैज्ञानिकों के एक समूह ने संयुक्त राष्ट्र को एक ओपेन लेटर लिखा था, जिसमें कोरोना वायरस के जाँच की वैज्ञानिक वैधता से समझौता किए जाने के बारे में जानकारी दी गई थी।

इस पत्र में 26 लोगों में अपने हस्ताक्षर किए थे, जिसमें वुहान कोरोना वायरस के उत्पत्ति की निष्पक्ष जाँच की माँग की गई थी। वैज्ञानिकों ने अफसोस जताया है कि वायरस की उत्पत्ति का स्थान महामारी के फैलने के एक साल बाद भी नहीं पता चल सका है। उन्होंने कहा, “हम यह आवश्यक मानते हैं कि महामारी की उत्पत्ति के बारे में सभी परिकल्पनाओं की पूरी तरह से जाँच की जाती है और राजनीतिक या अन्य संवेदनशीलता के संबंध में सभी आवश्यक संसाधनों तक पूरी पहुँच दी जाती है।”

वैज्ञानिकों का कहना है, “हमारे विश्लेषण के आधार पर जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और चीनी अधिकारियों द्वारा बुलाई गई ग्लोबल स्टडी में पता चला है कि इस वायरस के प्राकृतिक उत्पत्ति का कोई सबूत नहीं हैं।” भविष्य की समस्याओं की तरफ इशारा करते हुए पत्र में कहा गया है कि वैज्ञानिक इस तथ्य के बारे में सार्वजनिक जागरूकता लाना चाहते हैं कि उस जाँच टीम में आधे चीनी नागरिक शामिल हैं, जिनकी वैज्ञानिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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