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‘माजिद फ्रीमैन के लिए हो जाओ एकजुट’: लेस्टर हिंदू-विरोधी हिंसा को भड़काने वाले के समर्थन में उतरा कट्टरपंथी संगठन Cage International, भीड़ को कोर्ट के बाहर इकट्ठा होने के लिए उकसाया

'केज इंटरनेशनल' का इतिहास आतंकवाद विरोधी कानूनों के विरोध के नाम पर कट्टरपंथियों और आतंकवादियों का बचाव करने वाला रहा है। इसका प्रमाण सितंबर 2022 में तब मिला, जब इस संगठन ने खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन के करीबी सहयोगी, मोहम्मद रहीम अल-अफगानी की रिहाई की माँग की थी।

सितंबर 2024 में मुस्लिम ‘एक्टिविस्ट’ माजिद फ्रीमैन को 2022 में लेस्टर में हुई हिंदू-विरोधी हिंसा के दौरान भड़काऊ गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में 22 हफ्ते की जेल की सजा सुनाई गई थी। उस पर आरोप था कि उसने उस हिंसा के दौरान हिंदुओं की भूमिका को लेकर झूठी और भ्रामक बातें फैलाई थीं। उस समय माजिद फ्रीमैन ने अदालत में अपने बचाव में कोई दलील भी नहीं दी क्योंकि उसके पास अपने कुकृत्यों को सही ठहराने का कोई आधार नहीं था।

अब ब्रिटेन का NGO कैज इंटरनेशनल (CAGE International) उसकी इन्हीं गतिविधियों को नजरअंदाज करते हुए इस्लामी कट्टरपंथी को निर्दोष साबित करने की कोशिश में एक अभियान चला रहा है और उसकी हिंदू-विरोधी और आपराधिक भूमिका को छिपाने का प्रयास कर रहा है।

CAGE International को पहले CagePrisoners Project के नाम से जाना जाता था। 9 जनवरी को लेस्टर मामले में होने वाले माजिद फ्रीमैन के दोबारा ट्रायल से पहले उसके समर्थन में लोगों को जुटा रहा है। इस संगठन ने एक पर्चे में फ्रीमैन को ‘मानवतावादी’ और ‘एंटी-जेनोसाइड एक्टिविस्ट’ बताया है। इसमें दावा किया गया है कि उसे ‘2022 में हिंदुत्व से प्रेरित दंगों के दौरान लेस्टर समुदाय का बचाव करने के अपराध में एक राजनीतिक रूप से प्रेरित मुकदमे में दोषी ठहराया गया’।

CAGE International ने X पर लिखा, “माजिद फ्रीमैन के लिए एकजुट हों। मानवतावादी और प्रो-फिलिस्तीन एक्टिविस्ट माजिद फ्रीमैन ने 2022 में हिंदुत्व से प्रेरित दंगों के दौरान, लेस्टरशायर पुलिस की कई नाकामियों के बाद लेस्टर के लोगों के लिए आवाज उठाई थी। उसे पिछले साल एक राजनीतिक मुकदमे में दोषी ठहराया गया। उसके दोबारा ट्रायल में उसके साथ एकजुटता दिखाएँ। हम माजिद के साथ खड़े हैं।”

हिंदू अधिकारों की वकालत करने वाले INSIGHT UK समूह ने इसे लेकर CAGE International पर सवाल उठाए हैं। INSIGHT UK ने संगठन पर ‘विक्टिम-फ्लिपिंग’ का आरोप लगाया है ताकि उसके हिंदू विरोधी कृत्यों को कम करके दिखाया जा सके।

INSIGHT UK ने लिखा, “माजिद फ्रीमैन को दोषी ठहराया गया है। इसके बावजूद CAGE ‘पीड़ित को ही अपराधी’ बता रहा है और एक ऐसा अभियान चला रहा है जो उसे एक सताए गए समुदाय के रक्षक के रूप में पेश कर रहा है और उसके उन कामों को कम करके दिखा रहा है। इसने पहले से ही तनावग्रस्त और हिंसा झेल रहे शहर में हिंदू विरोधी भावनाओं को भड़काया था। CAGE का चरमपंथियों का बचाव करने का लंबा इतिहास है और अब ऐसे व्यक्ति के लिए समर्थन क्यों जुटा रहा है जिसके कामों ने लीसेस्टर में हिंदुओं के लिए नफरत और डर को और बढ़ा दिया?”

माजिद फ्रीमैन की सजा और पूरा मामला

9 सितंबर 2024 को माजिद फ्रीमैन को 22 हफ्ते की जेल की सजा सुनाई गई। उस पर आरोप था कि उसने 2022 में ब्रिटेन के लीसेस्टर शहर में हुए हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान हिंसा भड़काने की कोशिश की और सोशल मीडिया के जरिए झूठ और भ्रामक जानकारी फैलाई। नॉर्थ हैम्पटन मजिस्ट्रेट्स कोर्ट में डिस्ट्रिक्ट जज अमर मेहता ने उसे पब्लिक ऑर्डर ऑफेंस की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने कहा कि फ्रीमैन का इरादा हिंसा करवाने का था और उसने ऐसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जिनका मकसद लोगों को हिंसा के लिए उकसाना था।

जुलाई 2023 में माजिद फ्रीमैन एक और गंभीर मामले में भी घिर चुका था। उस पर आतंकवाद भड़काने और प्रतिबंधित आतंकी संगठन हमास का समर्थन करने के आरोप लगे थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, माजिद फ्रीमैन का असली नाम माजिद नोवसार्का है। उसे 9 जुलाई 2023 को काउंटर टेररिज्म से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। अदालत को बताया गया कि 26 दिसंबर 2022 से 20 जून 2023 के बीच फ्रीमैन ने कई बार ऐसे बयान दिए जो हमास जैसे प्रतिबंधित आतंकी संगठन के पक्ष में थे।

सरकारी वकील बिर्गिटे हागेम ने कोर्ट में कहा था कि माजिद फ्रीमैन 11 मार्च 2015 को सोशल मीडिया के जरिए लोगों को आतंकी गतिविधियाँ करने, उनकी योजना बनाने या दूसरों को इसके लिए उकसाने की कोशिश कर रहा था। इसका संबंध फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ पर हुए 2015 के आतंकी हमले से था।

माजिद फ्रीमैन ने लीसेस्टर में हिंदू विरोधी हिंसा भड़काई

भारत-पाकिस्तान टी20 मैच में 28 अगस्त 2022 को भारत की जीत के बाद लीसेस्टर में तनाव फैल गया। इस दौरान हुई एक झड़प में भारतीय ध्वज का अपमान किया गया। हालात बिगड़ने के बावजूद स्थानीय हिंदू समुदाय ने शांति बनाए रखने की कोशिश की और यहाँ तक कि झंडे का अपमान करने वाले व्यक्ति की मदद भी की।

इसके बावजूद माजिद फ्रीमैन ने हिंदुओं के खिलाफ झूठा प्रचार शुरू किया, जिससे हिंसा और भड़क गई। 30 अगस्त 2022 को उन्होंने यह झूठा दावा किया कि लीसेस्टर में हिंदुओं ने मुसलमानों की मौत जैसे नारे लगाए। बाद में पुलिस जाँच में यह आरोप पूरी तरह गलत पाया गया।

इसी दिन माजिद फ्रीमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह अफवाह भी फैलाई कि लीसेस्टर में कुरान का अपमान किया गया है और इसके लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराया। जाँच में यह दावा भी पूरी तरह झूठा साबित हुआ। हालाँकि, इन झूठी खबरों और भ्रामक दावों के कारण पहले ही माहौल बिगड़ चुका था और तनाव बढ़ गया था।

इसके अलावा माजिद फ्रीमैन ने एक और झूठा आरोप लगाकर माहौल को और भड़काया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू युवकों के एक समूह ने एक मुस्लिम किशोर का पीछा कर उस पर हमला किया, जबकि यह आरोप भी गलत पाया गया। 4 सितंबर 2022 को, जब लीसेस्टर में मुस्लिम भीड़ हिंदुओं पर हमला कर रही थी, उसी दौरान माजिद फ्रीमैन ने सोशल मीडिया के जरिए अपने समुदाय के लोगों को हिंदुओं के खिलाफ और उकसाया। उनके भड़काऊ पोस्टों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया और हिंसा को बढ़ावा मिला।

लीसेस्टर में हिंदुओं पर 4 से 7 सितंबर के बीच मुस्लिमों ने हमले किए। स्थानीय गणेश चतुर्थी समारोह को भीड़ ने बाधित किया और हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर अंडे फेंके। एक हिंदू पुरुष पर हमला भी हुआ। एक अन्य मामले में, जब माजिद फ्रीमैन ने झूठा दावा किया कि कुछ हिंदू पुरुषों ने एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की, तो एक हिंदू पुरुष को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया। पुलिस ने बाद में खुलासा किया कि यह पूरी कहानी झूठी थी।

सोशल मीडिया पर माजिद फ्रीमैन की टीम, ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) और अमेरिका स्थित ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) जैसे कट्टरपंथी संगठन लंबे समय से एक खास कहानी को हवा दे रहे हैं। उनका दावा है कि लीसेस्टर हिंसा के दौरान फ्रीमैन ने एक हिंदू व्यक्ति की जान बचाई थी। इस नैरेटिव के जरिए वे फ्रीमैन को हिंसा भड़काने वाले अपराधी के बजाय एक ‘रक्षक’ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

हालाँकि, यह कहानी बिल्कुल वैसी ही लगती है जैसा शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में देखने को मिला था। उस समय भी ‘इस्लामो-लेफ्टिस्ट’ गुटों ने यह नैरेटिव फैलाया था कि ‘मुस्लिम हिंदू मंदिरों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखला बना रहे हैं’। यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि वे आखिर हिंदुओं की रक्षा किससे कर रहे थे?

ठीक यही बात माजिद फ्रीमैन पर भी लागू होती है। फ्रीमैन ने बुनियादी तौर पर अपने ही समुदाय के लोगों को हिंदुओं पर हमला करने के लिए उकसाया था। ऐसे में, जिस भीड़ को उसने खुद भड़काया, उसी भीड़ से कथित तौर पर एक हिंदू को बचा लेने भर से उसके दंगा भड़काने के गुनाह कम नहीं हो जाते। यह दलील देना कि वह रक्षक है, उतना ही बेतुका है जितना आग लगाने वाले का यह कहना कि उसने एक व्यक्ति को जलने से बचा लिया था।

केज इंटरनेशनल की ‘माजिद फ्रीमैन को रिहा करो’ की वकालत

वर्ष 2003 में ‘केजप्रिज़नर्स प्रोजेक्ट’ (CagePrisoners Project) के रूप में शुरू हुआ यह संगठन 2013 में ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) बन गया। अपनी वेबसाइट के अनुसार, यह संस्था उन कैदियों की स्थिति और उनके ठिकाने के बारे में जानकारी देने का काम करती है, जिन्हें ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के तहत पकड़ा गया है। यह डेटा उनके परिवारों, वकीलों, मीडिया और शिक्षाविदों के लिए जुटाया जाता है।

हालाँकि, इस एनजीओ (NGO) का इतिहास विवादों से भरा रहा है। ‘आतंकवाद विरोधी कानूनों’ के दुरुपयोग का विरोध करने के नाम पर यह संस्था कई बार इस्लामी कट्टरपंथियों और यहाँ तक कि खूंखार आतंकवादियों का बचाव करती नजर आई है। इसका एक बड़ा उदाहरण सितंबर 2022 में देखने को मिला, जब ‘केज इंटरनेशनल’ ने मोहम्मद रहीम अल-अफगानी की रिहाई की वकालत की थी। गौरतलब है कि अल-अफगानी खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन का बेहद करीबी सहयोगी रहा है।

इसके अलावा, केज इंटरनेशनल (CAGE International) ‘लेडी अल-कायदा’ के नाम से कुख्यात आफिया सिद्दीकी की रिहाई के लिए भी वकालत कर चुका है। सिद्दीकी फिलहाल अफगानिस्तान में अमेरिकी अधिकारियों पर हमले के जुर्म में दोषी करार दिए जाने के बाद 86 साल की जेल की सजा काट रही है। ऑपइंडिया की एक पिछली रिपोर्ट के अनुसार, 2008 में अमेरिकी न्याय विभाग ने उसके पास से कई संदिग्ध चीजें बरामद की थीं। इनमें उसके हाथ से लिखे कुछ नोट्स भी शामिल थे, जिनमें बड़े पैमाने पर जनहानि करने वाले हमलों का जिक्र किया गया था।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) फिलिस्तीनी इस्लामिक आतंकी संगठन हमास का भी कट्टर समर्थक है। अगर फिर से माजिद फ्रीमैन की बात करें, तो इसी ‘इस्लामिस्ट एनजीओ’ ने जुलाई 2025 में फ्रीमैन के समर्थन में एक एकजुटता कार्यक्रम आयोजित किया था। इस संस्था ने दावा किया कि फ्रीमैन पर आतंकवाद के आरोप सिर्फ इसलिए लगाए गए हैं क्योंकि उन्होंने फिलिस्तीन के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए कुछ शब्द साझा किए थे।

लीसेस्टर में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा के मामले में माजिद फ्रीमैन को दोषी करार दिए जाने के तुरंत बाद, ‘केज इंटरनेशनल’ने एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की। इस कट्टरपंथी संगठन ने दावा किया कि फ्रीमैन को एक ‘राजनीति से प्रेरित हिंदुत्व दंगा ट्रायल’ के तहत जेल भेजा गया है।

हैरानी की बात यह है कि इस संगठन ने लीसेस्टर के पीड़ित हिंदुओं को ही ‘हिंदुत्ववादी आंदोलनकारी’ बता दिया और उन्हें 2022 की उस हिंसा का गुनहगार ठहराने की कोशिश की, जो असल में कट्टरपंथियों द्वारा सुनियोजित थी। जबकि सच यह है कि उस समय हिंदू समाज ही इन हमलों का शिकार हुआ था और इस पूरी हिंसा की आग को माजिद फ्रीमैन द्वारा फैलाई गई झूठी खबरों (डिसइन्फॉर्मेशन) ने ही हवा दी थी।

लीसेस्टर में हुई हिंसा को लेकर ‘केज इंटरनेशनल’ ने बेहद गंभीर और भ्रामक दावा किया है। इस संगठन का कहना है कि ‘2022 में लीसेस्टर में ‘हिंदुत्व’ से प्रेरित जो दंगे हुए, उनमें लीसेस्टरशायर पुलिस और विशेष रूप से चीफ कांस्टेबल रॉब निक्सन स्थिति को संभालने में पूरी तरह नाकाम रहे। पुलिस ने मुस्लिम मोहल्लों में हिंदुत्ववादी आंदोलनकारियों को अर्धसैनिक शैली (paramilitary-style) में मार्च करने की इजाजत दी, जिससे सीधे तौर पर सामुदायिक तनाव पैदा हुआ।’

हालाँकि, सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। भले ही माजिद फ्रीमैन, मोहम्मद हिजाब (एक अन्य कट्टरपंथी और हिंसा का मुख्य उकसाने वाला) और उनके समर्थक लगातार ‘हिंदुत्व’ और हिंदुओं को इस हिंसा का दोषी ठहराने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन ब्रिटेन की अदालत ने उनके इस प्रोपेगेंडा की धज्जियाँ पहले ही उड़ा दी हैं। कोर्ट की जाँच में यह साफ हो चुका है कि हिंदुओं के खिलाफ हिंसा सुनियोजित थी।

अब, 9 जनवरी को होने वाले माजिद फ्रीमैन के दोबारा ट्रायल से पहले, ‘केज इंटरनेशनल’ (मुख्य रूप से पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश मुस्लिम चलाते हैं) कट्टरपंथियों को लीसेस्टर क्राउन कोर्ट के बाहर जुटने के लिए उकसा रहा है। इसे ‘एकजुटता’ दिखाने का नाम दिया जा रहा है, लेकिन जानकारों के बीच यह चिंता बढ़ गई है कि यह एकजुटता नहीं, बल्कि अदालती कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए ‘शक्ति प्रदर्शन’ की एक सोची-समझी कोशिश है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

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Shraddha Pandey
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