मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के बाद अब बांग्लादेश में आखिरकार लोकतांत्रिक सरकार बनने जा रही है। कल यानि गुरुवार (12 फरवरी 2026) को हुए आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने निर्णायक जीत हासिल कर सरकार बनाने जा रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारीक रहमान, जो 17 साल के ब्रिटेन प्रवास के बाद दिसंबर 2025 में अपने देश बांग्लादेश वापस लौटे थे, अब प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं।
300 सदस्यीय जातीय संसद (जातीय संगसद) की 299 में से 297 सीटों के नतीजे आ चुके हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार BNP और उसके सहयोगी दलों ने 210 से अधिक सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है।
वहीं, मुख्य विपक्षी गठबंधन, जो जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में 11 दलों का है, करीब 70 सीटों पर सिमटता दिख रहा है। तारीक रहमान ने ढाका-17 और बोगुरा-6, दोनों सीटों से जीत दर्ज की है और माना जा रहा है कि वह इसी हफ्ते के आखिर तक प्रधानमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। पार्टी ने जश्न मनाने के बजाय देशभर में शुक्रिया अदा करने के लिए दुआ करने की अपील की है, जो दो दशक बाद सत्ता में वापसी का संकेत है।
इन चुनावी नतीजों पर भारत की भी कड़ी नजर है, क्योंकि बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा से जुड़ी मानी जाती है। भारत में पहले से ही कुछ हलकों में चिंता जताई जा रही है।
वजह यह है कि BNP का अतीत भारत विरोधी रुख से जुड़ा रहा है। जब खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं, तब उत्तर-पूर्व भारत के अलगाववादी संगठनों, खासकर ULFA को बांग्लादेश में पनाह मिलने के आरोप लगे थे।
2001 से 2006 के कार्यकाल के दौरान बड़े पैमाने पर हथियारों की खेप भारत के लिए भेजे जाने के मामले में भी BNP सरकार पर आंखें मूंदने के आरोप लगे थे। साथ ही उस दौर में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और भारत विरोधी बयानबाजी को भी नजरअंदाज किए जाने की बात कही जाती रही है।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते
जब बांग्लादेश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार थी, तब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अपने सबसे खराब दौर में माने जाते हैं। उस समय सीमा पर झड़पें बढ़ीं, तस्करी के मामले सामने आए और सरकार का झुकाव पाकिस्तान की ओर माना गया।
हालात तब बदले जब अवामी लीग ने चुनाव जीता और शेख हसीना प्रधानमंत्री बनीं। उनके कार्यकाल में भारत विरोधी अलगाववादी संगठनों को बांग्लादेश से बाहर निकाल दिया गया, जिसके बाद उन्हें म्यांमार और दूसरे इलाकों में शरण लेनी पड़ी। दोनों देशों के बीच व्यापार भी हसीना सरकार के दौरान काफी बढ़ा।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि BNP का दोबारा सत्ता में आना भारत के लिए बहुत अच्छी खबर नहीं है। लेकिन चुनावी नतीजों को देखें तो भारत के नजरिए से यह सबसे बेहतर संभव परिणाम माना जा सकता है। इस चुनाव में असल में सिर्फ दो ही संभावित नतीजे थे और जो नतीजा सामने आया, वह दूसरे विकल्प से कहीं बेहतर है।
भारत की सबसे भरोसेमंद साझेदार रही अवामी लीग को इस बार चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। मुकाबला सिर्फ दो मोर्चों के बीच था, एक तरफ BNP और दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला 11 दलों का गठबंधन।
इस गठबंधन में कई कट्टर इस्लामी विचारधारा वाले दल शामिल हैं, जैसे जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस, खिलाफत मजलिस, बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन, निजाम-ए-इस्लाम पार्टी और कुछ छात्र संगठन जो अब नेशनल सिटीजन पार्टी के नाम से सामने आए हैं। इन दलों का मकसद शरिया कानून के आधार पर इस्लामी राज्य की स्थापना बताई जाती है।
जमात-ए-इस्लामी ने 1971 में बांग्लादेश के गठन का विरोध किया था और उस समय पाकिस्तान के साथ खड़ी रही थी, जिस पर नरसंहार के आरोप लगे थे। इस संगठन की विचारधारा लंबे समय से कट्टरपंथी मानी जाती है और उस पर पाकिस्तान के प्रति नरम रुख रखने के आरोप भी लगते रहे हैं।
शेख हसीना सरकार के दौरान इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और इसे चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी। हालाँकि, हसीना सरकार के गिरने के बाद यह प्रतिबंध हटा दिया गया और संगठन फिर से राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल हो गया।
अगर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में सरकार बनती, तो यह भारत के लिए एक रणनीतिक बुरा सपना साबित होता। इसका मतलब होता कि ढाका खुलकर पाकिस्तान और चीन की ओर झुक जाता।
भारत के साथ लगी खुली और संवेदनशील सीमा के जरिए आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा मिल सकता था। हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों में बढ़ोतरी की आशंका रहती। पानी बंटवारे जैसे मुद्दों पर विवाद और तेज होते और इंडिया आउट जैसी मुहिम को हवा मिलती। ऐसे हालात में बंगाल की खाड़ी पर चीन की पकड़ और मजबूत होती और पाकिस्तान को भी इस क्षेत्र में गलत तरीके से दखल का मौका मिल जाता।
भारत की पूर्वी सीमा पर कट्टरपंथी इस्लाम का असर बढ़ता, वही ताकतें सक्रिय हो जातीं जो पाकिस्तान में हावी हैं और जिन्होंने अफगानिस्तान और म्यांमार को अस्थिर किया। इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल, असम और देश के दूसरे हिस्सों तक महसूस किया जा सकता था।
इसके मुकाबले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) अलग है। उसमें कई कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन वह मजहबी राज्य की वकालत करने वाली पार्टी नहीं, बल्कि खुद को राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में पेश करती है।
शासन का अनुभव रखने वाली BNP से यह उम्मीद की जा रही है कि वह व्यावहारिक रुख अपनाएगी और समझेगी कि भारत से अलग-थलग रहकर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती।
अगर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में सरकार बनती, तो यह भारत के लिए एक रणनीतिक बुरा सपना साबित होता। इसका मतलब होता कि ढाका खुलकर पाकिस्तान और चीन की ओर झुक जाता।
भारत के साथ लगी खुली और संवेदनशील सीमा के जरिए आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा मिल सकता था। हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों में बढ़ोतरी की आशंका रहती। पानी बंटवारे जैसे मुद्दों पर विवाद और तेज होते और इंडिया आउट जैसी मुहिम को हवा मिलती। ऐसे हालात में बंगाल की खाड़ी पर चीन की पकड़ और मजबूत होती और पाकिस्तान को भी इस क्षेत्र में गलत तरीके से दखल का मौका मिल जाता।
भारत की पूर्वी सीमा पर कट्टरपंथी इस्लाम का असर बढ़ता, वही ताकतें सक्रिय हो जातीं जो पाकिस्तान में हावी हैं और जिन्होंने अफगानिस्तान और म्यांमार को अस्थिर किया। इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल, असम और देश के दूसरे हिस्सों तक महसूस किया जा सकता था।
इसके मुकाबले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) अलग है। उसमें कई कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन वह मजहबी राज्य की वकालत करने वाली पार्टी नहीं, बल्कि खुद को राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में पेश करती है। शासन का अनुभव रखने वाली BNP से यह उम्मीद की जा रही है कि वह व्यावहारिक रुख अपनाएगी और समझेगी कि भारत से अलग-थलग रहकर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती।
On arrival in Dhaka, met with Mr Tarique Rahman @trahmanbnp, Acting Chairman of BNP and son of former PM of Bangladesh Begum Khaleda Zia.
— Dr. S. Jaishankar (@DrSJaishankar) December 31, 2025
Handed over to him a personal letter from Prime Minister @narendramodi.
Conveyed deepest condolences on behalf of the Government and… pic.twitter.com/xXNwJsRTmZ
भारत और BNP के रिश्ते
भारत ने साफ संकेत दिया कि भले ही उसने शेख हसीना को शरण दी है, लेकिन वह बांग्लादेश की नई सरकार के साथ काम करने को तैयार है। जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) चुनाव जीतने जा रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधिकारिक नतीजों का इंतजार किए बिना ही तारीक रहमान और BNP को बधाई दे दी।
यह सही है कि BNP का अतीत भारत के लिए पूरी तरह भरोसेमंद नहीं रहा है, लेकिन मौजूदा हालात में यही नई हकीकत है और दूसरे विकल्प की तुलना में बेहतर भी। दूसरा विकल्प एक इस्लामी गठबंधन था, जो बांग्लादेश को पाकिस्तान-चीन धुरी की ओर ले जा सकता था और भारत के खिलाफ माहौल को और भड़का सकता था।
खास बात यह भी है कि छात्रों द्वारा बनाई गई नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP), जिसने हसीना सरकार को हटाने में भूमिका निभाई थी, चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा रही NCP ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 6 सीटें जीत सकी। चूँकि NCP खुलकर भारत विरोधी रुख रखती है, इसलिए उसका कमजोर प्रदर्शन भारत के लिए सकारात्मक माना जा रहा है।
एक और जरूरी बात यह है कि बांग्लादेश के मतदाताओं ने BNP को स्पष्ट और भारी बहुमत दिया है। पार्टी किसी सहयोगी दल पर निर्भर नहीं है। स्थिर और मजबूत BNP सरकार का मतलब है कि सीमा सुरक्षा पर बेहतर तालमेल हो सकता है और तस्करी व घुसपैठ पर सख्ती बढ़ सकती है।
अब भारत-बांग्लादेश संबंध आगे बढ़ सकते हैं। तीस्ता नदी के पानी बंटवारे, भारत-बांग्लादेश-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे के जरिए कनेक्टिविटी और द्विपक्षीय व्यापार जैसे मुद्दों पर बातचीत फिर शुरू हो सकती है। यह भी उम्मीद है कि BNP के शासन में ढाका चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति का पूरी तरह हिस्सा नहीं बनेगा।
हालाँकि एक बड़ा सवाल अब भी बना रहेगा शेख हसीना का भारत में रहना। बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उन्हें ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ के मामले में मौत की सजा सुनाई है।
अगर BNP सरकार अगर उनके वापस आने पर दबाव बढ़ाती है, तो दोनों देशों के रिश्ते जटिल हो सकते हैं और फैसला भारत के पाले में होगा। चुनाव से पहले BNP समेत कई दलों ने भारत से हसीना को सौंपने की माँग की थी।
फिलहाल नई सरकार के सामने शपथ लेने के बाद कई बड़ी जिम्मेदारियाँ होंगी, इसलिए शेख हसीना का मुद्दा तुरंत प्राथमिकता में नहीं भी हो सकता है। बांग्लादेश के मतदाताओं ने जुलाई चार्टर पर जनमत का समर्थन किया है, जिसके तहत नई सरकार और संसद को पहले 150 दिनों में कई बड़े बदलाव लागू करने होंगे। इसमें एक नया उच्च सदन बनाना और संविधान में कई अहम संशोधन शामिल हैं।
( मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )


