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बांग्लादेश में एंटी-हिंदू वोटिंग का दिखा पैटर्न, बंगाल से सटे इलाकों में हिंदुओं की आबादी के बीच जमात की धाक: जानें- क्यों ये भारत के लिए चिंता की बात

बंगाल से सटे इलाकों में जमात की जीत चिंता पैदा करती है क्योंकि यहाँ हिंदू आबादी ज्यादा है और ऐतिहासिक रूप से 1971 के युद्ध में जमात ने पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात को पाकिस्तान समर्थक और भारत विरोधी माना जाता है।

बांग्लादेश के संसदीय चुनाव (फरवरी 2026) में जमात-ए-इस्लामी की करीब 60 से ज्यादा सीटें जीतना भारत के लिए चिंता का विषय क्यों बन रहा है? यह सवाल खासकर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जमात की जीत मुख्य रूप से भारत से सटे सीमावर्ती इलाकों में हुई है, जहाँ हिंदू आबादी 10-13% से अधिक है।

यह चुनाव शेख हसीना की सरकार के गिरने के बाद पहला बड़ा चुनाव था, जिसमें बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) ने भारी बहुमत हासिल किया, लेकिन जमात-ए-इस्लामी ने दूसरी सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरकर सबको चौंका दिया।

बांग्लादेश चुनाव के नतीजों की अहम बातें

फरवरी 2026 के चुनाव में बांग्लादेश की संसद (जातीय संसद) की 299-300 सीटों (कुछ रिपोर्ट्स में 299, कुछ में 300 बताई गईं) के लिए मतदान हुआ। नतीजों के अनुसार-

  • बीएनपी और उसके गठबंधन ने 212 सीटें जीतीं, जिससे तारिक रहमान के नेतृत्व में सरकार बनना तय हो गया।
  • जमात-ए-इस्लामी ने अकेले 68 सीटें जीतीं, और उसके 11-पार्टी गठबंधन को कुल 77 सीटें मिलीं। यह जमात के इतिहास की सबसे बड़ी सफलता है (पहले कभी 12% से ज्यादा वोट नहीं मिले थे)।
  • नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) जो 2024 के छात्र आंदोलन से निकली और हसीना को हटाने वाले युवा कार्यकर्ताओं की पार्टी है। उसकी बुरी हालत रही और उसे सिर्फ 6 सीटें मिलीं। इससे साफ है कि पूरे देश ने उन कथित आंदोलनकारियों को बड़े स्तर पर नकार दिया। जनता ने अपेक्षाकृत कम कट्टर बीएनपी को चुना न कि ज्यादा कट्टर जमात-एनसीपी गठबंधन को।

शेख हसीना के समर्थक और आंदोलनकारी ताकतों को जनता ने ठुकरा दिया। छात्रों ने हसीना को हटाया था, हालाँकि चुनाव में उनकी पार्टी को महज 6 सीटें मिलना दिखाता है कि देश बदलाव चाहता था, लेकिन कट्टरपंथ नहीं। शहरी इलाकों, पढ़े-लिखे वर्ग और महिलाओं ने जमात को काफी हद तक नकारा, खासकर उनके महिलाओं के अधिकारों पर रूढ़िवादी बयानों के कारण लेकिन ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में जमात का प्रभाव बढ़ा दिख रहा है।

हिंदू आबादी वाले प्रमुख जोन और जमात की जीत

बांग्लादेश में हिंदू आबादी कुल 7.95-8% है (2022 जनगणना के अनुसार लगभग 1.3 करोड़)। लेकिन कुछ डिवीजन में यह ज्यादा है-

सिलहट डिवीजन: 13.51% हिंदू (सबसे ज्यादा)।
रंगपुर डिवीजन: 13.01% (या 12.98%)।
खुलना डिवीजन: 11.52-11.53% (पहले 12.85% था, गिरावट आई)।

ये तीनों डिवीजन ही ऐसे हैं जहाँ हिंदू 10% से ज्यादा हैं। अन्य डिवीजन में यह कम है।

सिलहट में जमात को सिर्फ 1 या बहुत कम सीट मिली। यह इलाका पूर्वोत्तर भारत (असम, मेघालय, त्रिपुरा) से जुड़ता है। यहाँ हिंदू-मुस्लिम संबंध अपेक्षाकृत बेहतर रहे और भारत विरोध कम था। इसलिए जमात का प्रभाव यहाँ कम रहा।

रंगपुर और खुलना में जमात का प्रभाव काफी बढ़ा दिखा। रंगपुर में कई सीटें (जैसे रंगपुर-1,2,3,5,6), गाइबंदा, जॉयपुरहाट आदि में जमात को जीत मिली तो खुलना में सतखीरा जिले की सभी 4 सीटें जमात ने जीत ली। यही नहीं, इस इलाके के कुछ अन्य जिलों में भी जमात ने मजबूत प्रदर्शन किया। ये इलाके पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, 24 परगना जैसे जिलों से जुड़े हैं।

इन इलाकों में जमात की जीत चिंता पैदा करती है क्योंकि यहाँ हिंदू आबादी ज्यादा है और ऐतिहासिक रूप से 1971 के युद्ध में जमात ने पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात को पाकिस्तान समर्थक और भारत विरोधी माना जाता है। 1971 में उनकी भूमिका (राजाकारों के साथ) जगजाहिर है, जहाँ हिंदुओं पर अत्याचार हुए।

हरे रंग में जमात और सहयोगियों की सीटें, फोटो साभार: X_Epatrakaar

क्यों है भारत के लिए चिंता?

एंटी-हिंदू वोटिंग पैटर्न का संकेत: इन सीमावर्ती इलाकों में जहाँ हिंदू 11%+ हैं, मुस्लिम वोटरों का एकजुट होकर कट्टर जमात को वोट देना दिखता है। यह हिंदुओं के खिलाफ ध्रुवीकरण का संकेत हो सकता है। 1971 के बाद से कई मुस्लिम परिवार भारत से माइग्रेट होकर इन इलाकों में बसे और उनमें हिंदू विरोधी भावनाएँ बनी रहीं। जमात की जीत से लगता है कि कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हो रही हैं।

भारत विरोधी अभियान: जमात ने चुनाव में बीएसएफ (भारतीय सीमा सुरक्षा बल) के खिलाफ कैंपेन चलाया। बॉर्डर पर गोलीबारी, घुसपैठ जैसे मुद्दों पर भारत विरोध को भुनाया। पश्चिम बंगाल से सटे इलाकों में यह जीत कट्टरपंथियों को मजबूती दे रही है। भारत को डर है कि इससे सीमा पर अशांति बढ़ सकती है, तस्करी, घुसपैठ या आतंकवादी गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं। ऐसे में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत रहेगी।

ऐतिहासिक दुश्मनी: जमात 1971 में पाकिस्तान के साथ थी। आज भी पाकिस्तान से जुड़े होने का आरोप लगता है। भारत के साथ संबंधों में जमात हमेशा सतर्क रही। हालाँकि चुनाव से पहले कुछ जमात नेताओं ने ‘भारत के साथ काम करना होगा’ जैसे बयान दिए, लेकिन पश्चिम बंगाल से सटे ग्रामीण इलाकों में एंटी-इंडिया सेंटिमेंट मजबूत रहा। इसका फायदा जमात ने उठाया। उसने माहौल ही ऐसा तैयार किया था।

सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता: 4096 किमी लंबी सीमा पर रंगपुर-खुलना जैसे इलाकों में जमात की मजबूती से भारत की सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट हैं। व्यापार, पानी बंटवारा (तीस्ता जैसे मुद्दे) प्रभावित हो सकते हैं।

जनता का मैंडेट क्या कहता है?

देश स्तर पर बीएनपी की जीत दिखाती है कि जनता ने कट्टरपंथ को ज्यादा जगह नहीं दी। जमात को शहरी इलाकों में नकारा गया। महिलाओं और युवाओं ने उनके रूढ़िवादी विचारों (महिलाओं के अधिकारों पर) का विरोध किया। लेकिन ग्रामीण और बॉर्डर इलाकों में जमात का ‘धर्म और भारत विरोध’ कार्ड चला।

यह चुनाव ‘नए बांग्लादेश’ की शुरुआत है, लेकिन सीमावर्ती इलाकों में जमात की जीत से हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर सवाल उठ रहे हैं। भारत को सतर्क रहना होगा, क्योंकि बीएनपी सरकार के साथ संबंध सुधारने की कोशिश करेगी, लेकिन जमात जैसी विपक्षी ताकत दबाव डाल सकती है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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