संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने युवाओं के बीच इस्लामी कट्टरपंथ को रोकने के मकसद से एक बड़ा कदम उठाया है। यूएई ने ब्रिटेन (UK) में पढ़ाई करने के इच्छुक अपने नागरिकों को दी जाने वाली फंडिंग में भारी कटौती कर दी है। यूएई का यह फैसला उस समय आया है जब ब्रिटेन ने इस्लामी आतंकवादी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया।
ब्रिटेन (UK) के साथ बिगड़ते संबंधों के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए ब्रिटिश संस्थानों को उन ग्लोबल यूनिवर्सिटीज की लिस्ट से बाहर कर दिया है, जिनके लिए स्कॉलरशिप और डिग्री सर्टिफिकेशन की अनुमति दी जाती थी। ‘फाइनांशियल टाइम्स’ (FT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अबू धाबी का यह कड़ा कदम उन चिंताओं से उपजा है कि ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में इस्लामी कट्टरपंथ का गंभीर खतरा बढ़ रहा है।
‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, जब ब्रिटिश अधिकारियों ने यूएई से विदेशी विश्वविद्यालयों की संशोधित सूची में से अपने संस्थानों के नाम गायब होने पर सवाल किया, तो यूएई के अधिकारियों ने पुष्टि की कि यह कटौती जानबूझकर की गई है। इस चर्चा की जानकारी रखने वाले एक सूत्र के हवाले से बताया गया कि यूएई प्रशासन नहीं चाहता कि उनके बच्चे ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में जाकर कट्टरपंथ का शिकार हों।
आँकड़ों से पता चलता है कि शैक्षणिक वर्ष 2023-24 के दौरान ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज में ‘इस्लामी कट्टरपंथ’ के लक्षण दिखने की वजह से 70 छात्रों के नाम ‘प्रिवेंट डी-रेडिकलाइजेशन प्रोग्राम’ (कट्टरपंथ विरोधी कार्यक्रम) के पास भेजे गए थे। हालाँकि, ब्रिटेन में पढ़ने वाले कुल 30 लाख छात्रों की तुलना में यह संख्या बहुत छोटी है, लेकिन पिछले साल के मुकाबले यह आँकड़ा लगभग दोगुना हो गया है।
पिछले 10 सालों में यूएई ने अपने देश के भीतर कट्टरपंथियों पर बहुत कड़ा शिकंजा कसा है और 2014 में ही ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। यूएई लंबे समय से यह माँग कर रहा है कि ब्रिटेन को भी मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए, लेकिन ब्रिटेन अब तक ऐसा करने से कतरा रहा है।
ब्रिटेन की ढिलाई से बढ़े कट्टरपंथियों के हौसले: UAE ने मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े संगठनों को किया ब्लैकलिस्ट
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने जनवरी 2025 में ब्रिटेन में मौजूद 8 संगठनों को ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसे इस्लामी आतंकी संगठन से संबंध रखने के कारण ब्लैकलिस्ट कर दिया। इन संगठनों की पहचान ‘कैंब्रिज एजुकेशन एंड ट्रेनिंग सेंटर लिमिटेड’, ‘IMA6INE लिमिटेड’, ‘वेम्बली ट्री लिमिटेड’, ‘वस्ला फॉर ऑल’, ‘फ्यूचर ग्रेजुएट्स लिमिटेड’, ‘यास फॉर इन्वेस्टमेंट एंड रियल एस्टेट’, ‘होल्डको यूके प्रॉपर्टीज लिमिटेड’ और ‘नफेल कैपिटल’ के रूप में हुई है।
हैरानी की बात यह है कि कट्टरपंथी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर मिस्र, सऊदी अरब और खुद यूएई जैसे प्रमुख मुस्लिम देशों ने भी बैन लगा रखा है। इसके विपरीत, ब्रिटेन जैसा ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश इस संगठन के खिलाफ नरम रुख अपनाए हुए है। उसने अब तक न तो इसे बैन किया है और न ही इसे आधिकारिक तौर पर आतंकवादी संगठन घोषित किया है।
ब्रिटेन इन दिनों तेजी से बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ और धर्मांतरण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने ब्रिटेन में अपना नेटवर्क उन छात्रों और कट्टरपंथी निर्वासितों के जरिए फैलाया है, जो अपने देशों में हुई कार्रवाई के बाद वहाँ शरण लेने पहुँचे थे। ये संगठन दक्षिण एशिया के उन कट्टरपंथियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जो जमात-ए-इस्लामी का प्रतिनिधित्व करते हैं और अबुल आला मौदूदी के विचारों को बढ़ावा देने के लिए बने हैं।
साल 2024 में, पूर्व कम्युनिटी सेक्रेटरी माइकल गोव ने ‘मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ ब्रिटेन’ (MAB) को स्पष्ट रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ा संगठन बताया था। इससे पहले 2015 में भी ब्रिटिश सरकार की एक समीक्षा में यह खुलासा हुआ था कि MAB पर पूरी तरह से मुस्लिम ब्रदरहुड का वर्चस्व है।
एक सरकारी समीक्षा में विस्तार से बताया गया है कि कैसे ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने पिछले पाँच दशकों के दौरान धीरे-धीरे ब्रिटेन में अपना आधार मजबूत किया है। 1980 के दशक के उत्तरार्ध तक, इस संगठन ने इराक और फिलिस्तीन जैसे मुद्दों का इस्तेमाल करके ब्रिटेन में बसे दूसरी पीढ़ी के मुस्लिमों को एकजुट करना और उन्हें अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया था।
1990 के दशक तक, मुस्लिम ब्रदरहुड ने अपनी जिहादी विचारधारा को फैलाने और नए समर्थकों को लुभाने के लिए कई तरह के संगठन खड़े कर लिए थे। 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से किसी भी संगठन ने खुलकर अपनी पहचान मुस्लिम ब्रदरहुड के रूप में नहीं बताई और इस संगठन की सदस्यता हमेशा की तरह एक ‘राज’ ही बनी रही।
इसके बावजूद, मुस्लिम ब्रदरहुड ने कई सालों तक ‘इस्लामिक सोसाइटी ऑफ ब्रिटेन’ (ISB) को अपने हिसाब से चलाया, ‘मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ ब्रिटेन’ (MAB) पर अपना दबदबा बनाए रखा और ‘मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन’ (MCB) को स्थापित करने व चलाने में अहम भूमिका निभाई। MAB ने फिलिस्तीन और इराक जैसे मुद्दों के जरिए राजनीति में सक्रियता बढ़ाई और चुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे। वहीं, MCB ने सरकार के साथ बातचीत का रास्ता साफ किया। इतना ही नहीं, MAB ने सुरक्षा मुद्दों पर पुलिस के साथ मिलकर काम किया और उत्तरी लंदन की एक मस्जिद से कट्टरपंथी प्रचारक अबू हमजा को बाहर निकालने में मदद की, जिसके बाद से उस मस्जिद के प्रबंधन में MAB की अहम भूमिका बनी हुई है।

समीक्षा में यह भी सामने आया कि ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ अपने विभिन्न संगठनों के जरिए ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर चंदा (फंड) इकट्ठा कर रहा है। ‘यूके इस्लामिक मिशन’ (UKIM) और ‘इस्लामिक फोरम फॉर यूरोप’ (IFE) जैसे ब्रदरहुड के नियंत्रण वाले संगठन ब्रिटेन में दर्जनों मस्जिदें चला रहे हैं। ये संगठन फिलिस्तीनी आतंकी समूह ‘हमास’ के खुले समर्थक रहे हैं।
2015 की इस रिपोर्ट में आगे बताया गया कि भले ही ब्रिटेन में मुस्लिम ब्रदरहुड खुद को ‘अल-कायदा’ और कट्टरपंथी सलाफवाद का विरोधी बताता हो, लेकिन सच्चाई कुछ और है। ब्रिटिश सरकार की जाँच में पाया गया कि यह संगठन प्रतिबंधित आतंकी समूहों का समर्थन करता है और आतंकवाद पर इसके विचार ब्रिटेन के राष्ट्रीय हितों, मूल्यों और सुरक्षा के बिल्कुल खिलाफ हैं।
हैरानी की बात यह है कि 2015 की समीक्षा में मुस्लिम ब्रदरहुड की जिहादी प्रवृत्तियों का कच्चा चिट्ठा सामने आने के बावजूद, ब्रिटिश सरकार ने इसे बैन नहीं किया। सरकार का तर्क था कि ब्रिटेन के भीतर इस संगठन की किसी आतंकी गतिविधि में शामिल होने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।
‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की पूरी काला-चिट्ठा: खौफनाक इतिहास से लेकर ग्लोबल जिहाद तक
‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ की स्थापना साल 1928 में मिस्र के एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी। इस संगठन की नींव पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और ओटोमन साम्राज्य के पतन के बाद खत्म होते इस्लामी मूल्यों को बचाने के नाम पर रखी गई थी। अल-बन्ना ने इसे एक ‘पैन-इस्लामिस्ट’ आंदोलन के रूप में शुरू किया था, जिसका शुरुआती जोर समाज सेवा और इस्लामी वकालत पर था।
अपने शुरुआती सालों में, मुस्लिम ब्रदरहुड ने मिस्र की कमजोर सरकारों की कमियों का फायदा उठाकर गरीबों और अनपढ़ लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनवाईं। इसके साथ ही, उसने धर्मनिरपेक्षता और साम्राज्यवाद के ‘इलाज’ के रूप में इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की सर्वोच्चता) का प्रचार करना शुरू किया। मुस्लिम ब्रदरहुड का नारा (मोटो) यह साफ कर देता है कि भले ही शुरुआत में यह सीधे तौर पर हिंसा से न जुड़ा रहा हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा से इसका मूल रास्ता रहा है।
‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ का मूल नारा (मोटो) उनके इरादों को पूरी तरह साफ करता है, “अल्लाह हमारा उद्देश्य है; पैगंबर हमारे नेता हैं; कुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; और अल्लाह की राह में मरना हमारी सर्वोच्च इच्छा है।”
1930 के दशक तक, हज़ारों सदस्यों के साथ यह संगठन राजनीति में कदम रख चुका था। हालाँकि, इस कट्टरपंथी संगठन की ‘सीक्रेट अपैरेटस’ (al-Nizam al-Khas) नाम की एक पैरामिलिट्री विंग भी थी, जो राजनीतिक हत्याओं और जिहादी हिंसा को अंजाम देती थी। साल 1948 में, इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने के कारण ‘सीक्रेट अपैरेटस’ के सदस्यों ने मिस्र के प्रधानमंत्री महमूद अल-नोकराशी पाशा की हत्या कर दी थी। इसके बदले में, 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने संगठन के संस्थापक हसन अल-बन्ना की हत्या कर दी।
‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की गुप्त शाखा (Secret Apparatus) के सदस्यों को कड़ा शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था, जिसमें हथियार चलाना और गुप्त अभियानों को अंजाम देना शामिल था। धोखे और गोपनीयता (तक़िया) का सहारा लेकर ये जिहादी राजनीतिक दलों, सेना, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शिक्षण संस्थानों और एनजीओ तक में घुसपैठ कर उन्हें भीतर से खोखला कर देते हैं। ब्रिटेन जैसे देशों में भले ही वे सीधे तौर पर हिंसा न कर रहे हों, लेकिन मीडिया, राजनीति और चैरिटी के जरिए अपना जिहादी एजेंडा आगे बढ़ाना आज भी जारी है।
मिस्र में साल 2012 में इस संगठन ने चुनाव जीता और मोहम्मद मुर्सी राष्ट्रपति बने, लेकिन 2013 में जनरल अब्दुल फतह अल-सीसी के नेतृत्व में हुए सैन्य तख्तापलट ने उन्हें सत्ता से हटा दिया। इसके बाद मिस्र में इस संगठन को बैन कर ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया गया। आज भी मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका की कई सरकारें इसे अपनी स्थिरता के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में, टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने भी मुस्लिम ब्रदरहुड और ‘काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस’ को ‘विदेशी आतंकवादी और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन’ मानने का ऐलान किया है।
यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस जैसे देश पहले ही ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं। अप्रैल 2025 में जॉर्डन ने भी इस समूह पर तब बैन लगा दिया, जब उसने रॉकेट और ड्रोन के जरिए हमलों की साजिश रचने वाले इसके सदस्यों को गिरफ्तार किया।
मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की ‘जमात-ए-इस्लामी’ को भी प्रभावित किया था। भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैसे सिमी (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं के खिलाफ जिहादी हमलों और भारत को एक इस्लामी राष्ट्र बनाने की साजिशों में शामिल रहे हैं, वे भी मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों से प्रेरणा लेते हैं। भारत में सक्रिय आतंकी समूहों को उकसाने के अलावा, इस संगठन ने 2021 में भारत के आर्थिक हितों को चोट पहुँचाने के लिए ‘भारतीय उत्पादों के बहिष्कार‘ (#BoycottIndianProducts) का अभियान चलाया था। वहीं 2023 में, पैगंबर मुहम्मद के सम्मान की रक्षा के बहाने इस संगठन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने की गहरी साजिश रची थी।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)


