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पादरियों को ट्रेनिंग, डोनेशन और धर्मांतरण का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क: जानें- लाखों हिंदुओं के धर्मांतरण के पीछे TTI से जुड़े विदेशी चर्चों के नेटवर्क का काला सच

OpIndia ने 'द टिमोथी इनिशिएटिव' के भारत में चल रहे ऑपरेशन्स से जुड़े कम से कम बारह विदेशी चर्चों और नेटवर्क्स का पता लगाया है। इनमें फंड जुटाने के अभियान, पास्टर्स की ट्रेनिंग, स्थानीय दौरे, डोनेशन और नए चर्च स्थापित करने का टारगेट शामिल है।

प्रवर्तन निदेशालय ने अंतरराष्ट्रीय ईसाई मिशनरी टिमोथी इनिशिएटिव यानी टीटीआई की जाँच की है, जिसके बाद भारत में लाखों हिंदुओं के धर्मांतरण के पीछे मौजूद विदेशी चर्च तंत्र को लेकर सवाल खड़ा हो गया है। यह सर्वविदित है कि कई मिशनरी, चाहे व्यक्तिगत रूप से हों या किसी चर्च से जुड़े हुए, पर्यटक वीजा पर भारत आते हैं और ईसाइयत का प्रचार करते हैं। ये वीजा नियमों का भी उल्लंघन है। जाँच में ये बात भी सामने आई है कि गाँव-गाँव तक ये फैले हुए हैं और चर्च आपस में मिलकर यानी गठजोड़ बना कर काम करते हैं, जो बिल्कुल एक अलग कहानी है।

टीटीआई ने खुद माना है कि 2007 में ‘द इंडिया प्रोजेक्ट’ बना कर उसने भारत में लाखों चर्च स्थापित किए। ऑप इंडिया की जाँच में पता चला है कि कम से कम बारह प्रमुख विदेशी चर्च टीटीआई के साथ मिलकर हिंदुओं और दूसरे समुदाय के लोगों को ईसाइयत का पाठ पढ़ा रहे हैं।

चर्च दस्तावेज, मिशन के बुक, न्यूजलेटर, अभियान अपडेट और दूसरी सामग्री से पता चलता है कि टीटीआई का भारत में कार्य किसी एक विदेशी संगठन तक सीमित नहीं रहा है। अंतरराष्ट्रीय चर्चों, विदेशी फंडिंग और मिशनरी की भागीदारी का एक व्यापक नेटवर्क बन गया है। ये वर्षों से टीटीआई की ‘हर गाँव में चर्च’ स्थापना के मिशन में खुल कर मदद कर रहा है।

ऑपइंडिया ने टीटीआई से जुड़े भारतीय संदर्भों वाले कम से कम बारह गैर-भारतीय संस्थाओं की पहचान की है, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित चर्च और एक कनाडाई संप्रदाय नेटवर्क शामिल हैं। ये संबंध केवल सामान्य मिशन संबंधी काम तक सीमित नहीं थे। कई मामलों में, चर्चों ने धन जुटाने के अभियानों, पादरी प्रशिक्षण, क्षेत्रीय दौरों, लोकल लेवल पर चर्चों की स्थापना, भारत से जुड़े डोनेशन जैसे मुद्दों पर बात की है।

इन नामों में केंसिंग्टन चर्च, मिशन ग्रोव चर्च, नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट चर्च, वुडडेल चर्च, राइज सिटी चर्च, मिशन हिल्स चर्च, फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ हैनफोर्ड, स्प्रिंगब्रुक कम्युनिटी चर्च और बैपटिस्ट जनरल कॉन्फ्रेंस ऑफ कनाडा शामिल हैं। लिबर्टी चर्च नेटवर्क, ऑल एक्सेस इंटरनेशनल, साल्टबॉक्स चर्च और वुडसाइड बाइबल चर्च के नेटवर्क और चर्चों से जुड़े संगठन भी टीटीआई तंत्र का हिस्सा थे।

टीटीआई की भारत में जड़ें और ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ की शुरुआत

टीटीआई का मुख्यालय उत्तरी कैरोलिना के रैले में है। यह एक वैश्विक चर्च स्थापना संगठन के रूप में कार्य करता है। हालाँकि इसकी जड़ें भारत से गहराई से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। संगठन की वैचारिक उत्पत्ति कथित तौर पर डेविड नेल्म्स की 1992 में भारत की प्रारंभिक खोज यात्राओं से जुड़ी है, जिसके बारे में ओपइंडिया ने इस श्रृंखला के पिछले लेख में बताया था। इसके क्षेत्रीय संचालन की औपचारिक शुरुआत 2007 में आंतरिक नाम ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ के तहत हुई थी।

शुरुआत से ही घोषित उद्देश्य आक्रामक और व्यापक था। टीटीआई भारत के हर गाँव में कम से कम एक चर्च स्थापित करना चाहता था। 2009 में संगठन ने वैश्विक स्तर पर विस्तार करने के उद्देश्य से अपना नाम बदलकर द टिमोथी इनिशिएटिव कर लिया। हालाँकि भारत इसके सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों में से एक बना रहा।

टीटीआई का मकसद तेजी से चर्च बनाना और लोगों को जोड़ना है। इसमें ‘पॉल’, ‘तिमोथी’ और ‘टाइटस’ होते हैं। ‘पॉल’ स्थानीय प्रशिक्षक हैं, जो स्थानीय प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करते हैं और छात्रों के समूहों को प्रशिक्षित करते हैं। ‘तिमोथी’ शिष्य बनाने वाले और चर्च स्थापित करने वाले हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करते हैं। ‘टाइटस’ नए धर्मान्तरित लोग हैं, जिन्हें आध्यात्मिक प्रशिक्षण दिया जाता है। बाद में उन्हें भावी कार्यकर्ताओं के रूप में आगे बढ़ाया जा सकता है।

पश्चिमी चर्चों को टीटीआई का मकसद काफी आकर्षित करता है, क्योंकि इससे उसकी लागत कम हो जाती है और तेजी से ईसाइयत का प्रचार होता है। संगठन का दावा है कि एक ‘स्वदेशी चर्च’ संस्थापक को प्रशिक्षित कर करीब 240 से 400 डॉलर में स्थानीय स्तर पर चर्च स्थापित किया जा सकता है। इससे विदेशी चर्चों और डोनेशन नेटवर्क को भारत में बड़े पैमाने पर चर्च स्थापना अभियान प्रायोजित करने में मदद मिली।

इस मामले को इस तरह समझा जा सकता है। जाँच में ईडी ने बताया कि टीटीआई ने विदेशी डेबिट कार्डों का उपयोग करके छह महीनों में 95 करोड़ रुपए निकाले। अगर हम यह भी मान लें कि इसमें से केवल 40 करोड़ रुपए ही सीधे चर्चों की स्थापना के लिए इस्तेमाल किए गए, बाकी राशि पादरियों के वेतन, प्रार्थना सभाओं के आयोजन, दौरों, स्थानीय समन्वय और अन्य परिचालन खर्चों में खर्च हुई होगी, और अगर मान लें कि 1 अमेरिकी डॉलर 88 रुपये के बराबर थी, तब भी यह लगभग 454 लाख डॉलर बनता है, जो टीटीआई के बताए गए 400 डॉलर प्रति चर्च मॉडल के अनुसार 11300 से अधिक चर्च स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। यह केवल छह महीनों का अनुमान है।

जरा सोचिए, 2007 में अपनी स्थापना के बाद से यह समूह क्या कर सकता था। यह भी न भूलें कि उनके अपने दावे के अनुसार, उन्होंने 50 देशों में 268000 से अधिक चर्च स्थापित किए हैं, और भारत उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

स्रोत: टीटीआई

केंसिंग्टन चर्च और उत्तरी भारत में चर्च स्थापना

केंसिंग्टन चर्च अमेरिका के मिशिगन में मौजूद एक बहुद्देशीय चर्च है। हमारे रिसर्च के दौरान, यह टीटीआई के भारत नेटवर्क से जुड़े प्रमुख विदेशी चर्चों में से एक के रूप में सामने आया। इसके आधिकारिक टीटीआई दस्तावेज में ‘दक्षिण एशिया में 3000 से अधिक गृह चर्चों की शुरुआत’ का उल्लेख किया गया है। चर्च से संबंधित अन्य सार्वजनिक दस्तावेजों में उत्तरी भारत में चर्च स्थापित करने के लिए 200000 डॉलर से अधिक की धनराशि जुटाने का उल्लेख है।

केंसिंग्टन आठ चर्चों के एक बड़े नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ था, जिन्होंने कथित तौर पर चर्च स्थापित करने के लिए 10 लाख डॉलर जुटाने का संकल्प लिया था। इसकी सार्वजनिक सामग्री में न केवल साझेदारी की भाषा शामिल थी, बल्कि भारत यात्रा के लिए व्यावहारिक बुनियादी ढाँचा भी था, जिसमें भारत के लिए सामान की सूची भी शामिल थी। इससे पता चलता है कि यह संबंध केवल प्रतीकात्मक या प्रार्थना कराने तक सीमित नहीं था।

इसके भारत पेज के अनुसार , यह चर्च, चर्च संस्थापकों और पादरियों के रूप में पुरुषों और महिलाओं को दो साल के प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए भर्ती करता है। यही लोग पूरे भारत में हिंदुओं को इस चर्च के माध्यम से धर्मांतरित करते हैं। इन्होंने देश भर में अस्पताल स्थापित किए हैं, चिकित्सा शिविर चलाए हैं, अनाथालय स्थापित किए हैं और भी बहुत कुछ किया है।

स्रोत: केंसिंग्टन चर्च

स्वयं चर्च के अनुसार, उसका ‘ग्रेस चिल्ड्रन्स होम’ एक समय में 125 बच्चों को ‘आश्रय’ प्रदान करता है। उसका लक्ष्य केवल वयस्क ही नहीं, बल्कि भारत में 1 करोड़ बेघर बच्चे भी हैं। चर्च के पादरी की अगली भारत यात्रा नवंबर के दूसरे सप्ताह में निर्धारित है। हालाँकि इस विशेष कार्यक्रम में टीटीआई का उल्लेख नहीं है, लेकिन भारतीय एजेंसियों द्वारा इसकी जाँच की जानी चाहिए, क्योंकि चर्च का दावा है कि वह 2000 से भारत में इस तरह की गतिविधियों से जुड़ा हुआ है।

स्रोत: केंसिंग्टन चर्च

केंसिंग्टन से जुड़े तथ्यों से साफ होता है कि यह धन जुटाने, जन लामबंदी और जमीनी स्तर पर व्यावहारिक भागीदारी को सुनिश्चित करता है। इसका उत्तरी भारत से जुड़ाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि टीटीआई के भारत में परिचालन पर अब एफसीआरए ढाँचे के बाहर विदेशी धन के कथित हस्तांतरण के लिए नियामक जाँच चल रही है।

मिशन ग्रोव चर्च ने जुटाए करीब 15.32 करोड़ रुपए

एरिजोना के केव क्रीक में स्थित मिशन ग्रोव चर्च लगातार चर्चों की स्थापना और धर्मांतरण में लगा हुआ है। मिशन ग्रोव के एक पेज में कथित तौर पर ‘अगले 4 वर्षों में उत्तरी भारत और नेपाल में 4000 चर्च स्थापित करने’ का उल्लेख किया गया था। बाद में चर्च द्वारा जारी एक लिखित दस्तावेज में कहा गया कि भारत और बांग्लादेश में 4000 से अधिक चर्च स्थापित करने के लिए 1.6 मिलियन डॉलर जुटाए गए थे।

मिशन ग्रोव मामले के संबंध में पादरी जॉन क्रैगेल का नाम सामने आया है। सार्वजनिक घटनाक्रम से पता चलता है कि चर्च ने पहले भारत और नेपाल के लिए चार साल का लक्ष्य रखा था, लेकिन बाद में भारत और बांग्लादेश के अभियान की जानकारी दी । बताया जाता है कि एरिजोना में 81 व्यक्तियों, चर्चों और संगठनों की भागीदारी से 1.6 मिलियन डॉलर जुटाए गए थे।

स्रोत: मिशन ग्रोव चर्च

मिशन ग्रोव इस बात का एक अहम उदाहरण है कि कैसे टीटीआई के भारत से जुड़े अभियानों को विदेशों में चर्च स्थापना अभियानों के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

वुडडेल चर्च और भारत, नेपाल और बांग्लादेश की प्रशिक्षण यात्रा

मिनेसोटा के ईडन प्रेयरी में मौजूद वुडडेल चर्च भी टीटीआई से जुड़ा दिखाई देता है। इसके बुलेटिन में कथित तौर पर कहा गया है कि पादरी डेल और रिचर्ड पायने ‘भारत, नेपाल और बांग्लादेश की टिमोथी इनिशिएटिव प्रशिक्षण यात्रा’ से लौट आए हैं।

वुडडेल की 2015 की वार्षिक रिपोर्ट में लिखा था , “2015 में, टिमोथी इनिशिएटिव के साथ साझेदारी में एशिया में 600 से अधिक नए चर्च स्थापित करने के लिए 1000 से अधिक नए लोगों को प्रशिक्षित किया गया। #चर्चस्थापना”। 2023 में चर्च ने दावा किया कि उसने टीटीआई की मदद से 2000 से अधिक चर्च स्थापित किए।

स्रोत: वुडडेल चर्च

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वुडडेल के कुछ आँकड़े एशिया सेंट्रिक थे। यह सिर्फ भारत से जुड़ा नहीं था। हालाँकि भारत, नेपाल और बांग्लादेश की प्रशिक्षण यात्रा से यह स्पष्ट होता है कि चर्च और टीटीआई ने दक्षिण एशिया को टारगेट किया।

राइज सिटी चर्च और उत्तर भारत

ओरेगन के ग्रेशम में स्थित राइज सिटी चर्च ने भारत के संदर्भ में अपनी टीटीआई साझेदारी के बारे में बताया है। 2021 में चर्च ने कहा, “भारत में पादरियों को प्रशिक्षित करने और चर्च स्थापित करने में मदद करने” के लिए टीटीआई के साथ साझेदारी की है। 2022 में इसने टीटीआई को ‘भारत में तेजी से चर्च स्थापित करने वाली संस्था’ बताया।

इसके 2022 के अंत में जानकारी दी थी कि एक प्रतिनिधि ने उत्तर भारत की यात्रा की थी, ताकि उन कुछ चर्चों का दौरा कर सके, जिन्हें टिमोथी इनिशिएटिव के माध्यम से स्थापित की गई थी। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि संबंध केवल विदेशी फंडिंग तक सीमित नहीं था। राइज सिटी ने उत्तरी भारत में स्थापित चर्चों के साथ जमीनी स्तर पर जुड़ाव की जानकारी दी है।

रिपोर्ट के अनुसार, राइज सिटी के किंगडम बिल्डर्स फंड ने शुरुआती चरण में लगभग 10000 डॉलर जुटाए थे , जबकि बाद के एक योजना पृष्ठ में कहा गया कि किंगडम बिल्डर्स का बजट बढ़कर लगभग 100000 डॉलर हो गया था। इसके अपडेट में यह भी बताया गया कि किंगडम बिल्डर्स ने दो वर्षों में दुनिया भर में 56 चर्च स्थापित किए।

मिशन हिल्स चर्च और 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन

कोलोराडो के लिटिलटन में स्थित मिशन हिल्स चर्च ने टिमोथी इनिशिएटिव को अपने ‘वर्ल्ड आउटरीच पार्टनर‘ के रूप में अपने लिस्ट में शामिल किया है । इसके अपडेट में कहा गया है कि 2025 तक इसने 1000 नए चर्चों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की होगी। इसी अपडेट में भारत में एक पार्टनर को 600 से अधिक भारतीय पादरियों के लिए एक पादरी सम्मेलन आयोजित करने में सहायता करने का भी उल्लेख किया गया है।

स्रोत: मिशन हिल चर्च

1000 चर्चों की स्थापना की बात पूरे विश्व के लिए कहा गया होगा, ऐसा लगता है। हालाँकि 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन करने की बात स्पष्ट रूप से भारत से जुड़ा मामला है। यह टीटीआई के भारत में मौजूद तंत्र का एक और पहलू है, जिसमें न केवल चर्चों की स्थापना शामिल है, बल्कि पादरी प्रशिक्षण और नेतृत्वकर्ता पैदा करना भी शामिल है।

बीजीसी कनाडा और प्रति चर्च 400 डॉलर का मॉडल

कनाडा के बैपटिस्ट जनरल कॉन्फ्रेंस (बीजीसी कनाडा) के संबंध भी साफ जाहिर होते हैं। इसके आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया है कि यह टिमोथी इनिशिएटिव के साथ साझेदारी कर रहा है। इसने बताया है कि एक चर्च स्थापित करने की लागत लगभग 400 अमेरिकी डॉलर है।

स्रोत: बीजीसी

अगस्त 2022 में भारत से प्रकाशित एक न्यूजलेटर में कथित तौर पर कहा गया था, ‘बीजीसी, टीटीआई के साथ मिलकर चर्च स्थापित कर रहा है,’ और यह भी बताया गया था कि टीटीआई को डोनेशन एडमोंटन के बीजीसी कार्यालय के माध्यम से दिया जा सकता है। न्यूजलेटर का लिंक बीजीसी कनाडा के कार्यकारी निदेशक केविन शूलर से था।

इससे पता चलता है कि किस प्रकार विदेशी संगठन टीटीआई की चर्च स्थापना से जुड़े हुए हैं और डोनेशन दे रहे हैं। हर चर्च के लिए 400 डॉलर का प्रस्ताव यह भी दर्शाता है कि कैसे अभियान को अंतरराष्ट्रीय ईसाई डोनर के लिए सरल बनाया गया, जिससे भारत में चल रहा नेटवर्क आसानी से काम कर सके।

नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट, हैनफोर्ड और स्प्रिंगब्रुक

वाशिंगटन के बेलिंगहैम स्थित नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट चर्च ने ईसाइयत के प्रचार-प्रसार करने वाले संगठन के लिस्ट में टिमोथी इनिशिएटिव को शामिल किया है और इसे भारत और नेपाल के ‘हर गाँव में एक चर्च’ स्थापित करने पर केंद्रित बताया। हालाँकि यहाँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी केंसिंग्टन या मिशन ग्रोव की तुलना में कम है, फिर भी टीटीआई चर्च के सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय मिशनों की सूची में शामिल था।

कैलिफोर्निया के हैनफोर्ड स्थित फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च का जिक्र चर्च के न्यूजलेटर के माध्यम से सामने आया । न्यूजलेटर में कहा गया था कि ‘डैन एस’ भारत के नेताओं से मजबूत संबंध बना कर चर्च स्थापना के लिए टीटीआई की मदद करवा रहे थे। इसके लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा था।

स्प्रिंगब्रुक कम्युनिटी चर्च 2014 की भारत यात्रा से जुड़ा था । पास्टर रिच के भारत पेज पर कथित तौर पर कहा गया था कि यह यात्रा द टिमोथी इनिशिएटिव और कन्वर्ज वर्ल्डवाइड के साथ साझेदारी में होगी। इस यात्रा में दक्षिण और उत्तर भारत के नेताओं और चर्च संस्थापकों से सीखने का अवसर मिलेगा।

लिबर्टी चर्च नेटवर्क, ऑल एक्सेस इंटरनेशनल और दूसरी संस्थाएँ

टीटीआई के सिस्टम में चर्च से जुड़ी दूसरी संस्थाएँ और नेटवर्क भी शामिल थे । लिबर्टी चर्च नेटवर्क ने कथित तौर पर 2011 में टीटीआई के साथ साझेदारी की और 2011 से 2012 के दौरान पूरे भारत में 780 चर्चों को आर्थिक मदद की। यह 2012 से 2013 के दौरान पूर्वोत्तर भारत के 200 चर्चों से भी जुड़ा हुआ था।

ऑल एक्सेस इंटरनेशनल ने कथित तौर पर 2026 से 2027 तक ‘अचीव साउथ एंड साउथईस्ट एशिया’ पोर्टफोलियो का प्रबंधन किया , जिसके लिए 4578240 डॉलर का बजट आवंटित किया गया था। योजना के तहत 1050 ‘पॉल’ और 19000 ‘टिमोथी’ को प्रशिक्षित करके भारत और आसपास के क्षेत्रों में 11000 ‘हाउस चर्च’ स्थापित किया जाना है। ये उन इलाकों में होगा, जहाँ तक ईसाइयत की पहुँच काफी कम है।

खबरों के मुताबिक, साल्टबॉक्स चर्च ने अपने अंतरराष्ट्रीय मिशन पोर्टफोलियो के तहत मिशन इंडिया के साथ-साथ टीटीआई के वैश्विक चर्च स्थापना मंच को भी शामिल किया । वुडसाइड बाइबल चर्च ने भारत में अपनी अलग उपस्थिति बनाए रखी और 28 भारतीय राज्यों के 180 पादरियों और चर्च संस्थापकों के प्रशिक्षण के लिए टीमें भेजीं।

कुल मिलाकर इन सभी संस्थाओं की कार्यप्रणाली देखने से पता चलता है कि टीटीआई का भारत से संबंधित कार्य कोई अनौपचारिक या हवा में नहीं हो रहा। यह चर्चों, नेटवर्कों, दानदाताओं, प्रशिक्षकों और मिशन निकायों के एक व्यापक गठजोड़ का हिस्सा है।

जाति आधारित रणनीति

विदेशी चर्च नेटवर्क की मौजूदगी तब और भी चिंताजनक हो जाती है, जब इसे टीटीआई की क्षेत्रीय रणनीति के संदर्भ में देखा जाता है। स्थानीय प्रशिक्षण केन्द्र और स्थानीय लोगों को टारगेट करने के सुनियोजित चाल का पता चलता है, ताकि हिंदू बहुसंख्यक ग्रामीण समुदायों में पैठ बनाया जा सके। इससे स्थानीय विरोध को कम किया जा सकता है।

सबसे विवादित जाति आधारित मध्यस्थ रणनीति थी। आम जनता को उपदेश देने के बजाय, टीटीआई के माध्यम से चर्च संस्थापकों को निर्देश दिया गया था कि वे अलग-अलग जातियों के प्रमुख नेताओं की पहचान करें और उनका धर्म परिवर्तन कराएँ। इसके पीछे का तर्क आसान था। चूँकि जातियाँ स्थानीय सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं, इसलिए किसी विशेष जाति के नेता को धर्म परिवर्तन कराने से उसी समूह के अन्य लोगों को भी धर्म परिवर्तन कराने का मार्ग प्रशस्त हो सकता था।

एक बार जब ऐसा कोई प्रभावशाली व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर लेता है, तो उसे समुदाय को भीतर से प्रभावित करने के लिए मध्यस्थ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि भारत की मौजूदा सामाजिक संरचनाओं को ध्यान में रखते हुए व्यापक रणनीति के तहत धर्मांतरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

हिंदू धर्म की कर्म- पुनर्जन्म जैसी बातों को टारगेट करना

रिपोर्ट के अनुसार, टीटीआई के पाठ्यक्रम में कर्म और पुनर्जन्म जैसे प्रमुख हिंदू विचारों को भी टारगेट किया गया था। इसके दसवें मैनुअल में ग्रामीण दर्शकों के सामने हिंदू दार्शनिक अवधारणाओं को नए सिरे से प्रस्तुत करने के तरीके बताए गए थे।

कथित तौर पर कर्म को एक ऐसा चक्र बताया गया, जिसमें क्षमा नहीं मिलती। ईसाइयत में चर्च में जाकर माफी माँगने से मसीह के माध्यम से तत्काल मुक्ति मिलने और दिव्य कृपा होने की बात कही गई। इसी प्रकार पाप के बारे में बताया गया।

यह महज एक धार्मिक चर्चा नहीं थी। यह गैर-ईसाई समुदायों को आकर्षित करने और उनके धर्मांतरण पाठ्यक्रम का हिस्सा था।

प्रतिरोध से बचने के लिए रणनीति

रिपोर्ट के अनुसार, टीटीआई ने कार्यकर्ताओं को उन क्षेत्रों में खुलेआम ईसाइयत के प्रचार से बचने की सलाह दी गई थी, जहाँ विरोध की आशंका थी। बाइबिल ले जाना, पर्चे बाँटना या धार्मिक फिल्में दिखाने से विरोध हो सकता था। इसलिए यहाँ रणनीति में बदलाव किया गया।

कार्यकर्ताओं को धर्मग्रंथों को याद करने और मौखिक तौर पर बताने, कहानियाँ सुनाने और धीरे-धीरे लोगों से संबंध मजबूत करने के निर्देश दिए गए, ताकि गाँवों के रोजमर्रा के कामों और सामाजिक जीवन में घुला-मिला जा सके।

इससे पता चलता है कि परिचालन मॉडल केवल आर्थिक मदद और प्रशिक्षण तक ही सीमित नहीं था। इसमें स्थानीय माहौल के हिसाब से बदलाव भी शामिल था।

FCRA उल्लंघन की ED कर रही जाँच

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच ने टीटीआई के भारत में संचालन को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया है। अप्रैल 2026 में ईडी ने टीटीआई संचालकों से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। एजेंसी ने पाया कि टीटीआई विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत पंजीकृत नहीं थी, जिसके कारण यह भारत में विदेशी दान प्राप्त करने या वितरित करने के लिए कानूनी रूप से अयोग्य थी।

जाँचकर्ताओं ने पाया कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और विदेशी नागरिक ट्रांजिट हब के माध्यम से भारत में प्रवेश करते थे। बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर माइग्रेशन से जुड़े अधिकारियों ने ‘मिका मार्क’ या ‘जोस बेल’ नाम एक कूरियर को पकड़ा, जो कथित तौर पर लुक आउट सर्कुलर के तहत काम कर रहा था।

खबरों के मुताबिक, उसकी तलाशी के दौरान 24 विदेशी बैंक डेबिट कार्ड बरामद किए गए, जो अमेरिका के ट्रूइस्ट बैंक द्वारा जारी किए गए और विदेशों में खातों से जुड़े थे। फॉरेंसिक जाँच में पता चला कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच, कई राज्यों में सुनियोजित तरीके से एटीएम से बड़ी रकम निकाले गए। इनमें से 95 करोड़ रुपए भारत में भेजे गए।

खबरों के मुताबिक, इस पैसे को एक विदेशी नियंत्रण वाले ऑनलाइन बिलिंग और अकाउंटिंग डेटाबेस के माध्यम से ट्रैक किया गया था। संवेदनशील क्षेत्रों में कथित तौर पर 6.5 करोड़ रुपए का पता चला जाँचकर्ताओं को उस वक्त ज्यादा हैरान हुई जब लगभग 6.5 करोड़ रुपए छत्तीसगढ़ के बस्तर और धमतारी के साथ-साथ झारखंड में पाया गया। ये रकम संवेदनशील, आदिवासी बहुल और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में भेजे गए थे।

यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चिंता की बात है। जनजातीय संवेदनशीलता और विदेशी फंडिंग वाले मिशनरी गतिविधियों के कारण ये क्षेत्र पहले से ही असुरक्षित हैं। इन क्षेत्रों में औपचारिक एफसीआरए चैनलों के बाहर एक नकदी-प्रधान समानांतर सिस्टम चल रहा है।

विदेशी चर्च नेटवर्क क्यों महत्वपूर्ण है?

अंतर्राष्ट्रीय चर्चों के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे दर्शाते हैं कि टीटीआई का भारत में संचालन केवल स्थानीय या अचानक नहीं था। विदेशी चर्चों ने सार्वजनिक रूप से धन जुटाया, चर्च स्थापना लक्ष्यों को बढ़ावा दिया, टीमें या प्रतिनिधि भेजे, पादरियों के प्रशिक्षण का समर्थन किया और भारत को एक ‘रणनीतिक मिशन क्षेत्र’ बनाया।

केंसिंग्टन का उत्तरी भारत अभियान, मिशन ग्रोव का 1.6 मिलियन डॉलर का धन उगाहना, बीजीसी कनाडा का प्रति चर्च 400 डॉलर का मॉडल, राइज सिटी की उत्तरी भारत यात्रा, मिशन हिल्स का 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन और वुडडेल की दक्षिण एशिया प्रशिक्षण यात्रा, ये सभी एक वैश्विक नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं।

असल सवाल यह नहीं है कि टीटीआई को विदेशी मदद मिल रही है या नहीं। असली सवाल यह है कि एक विदेशी समर्थित चर्च स्थापना प्रणाली ने नकदी का कारोबार कैसे भारत में करने लगा। उसने नेटवर्क कैसे बनाया। इसके बारे में जाँचकर्ताओं का कहना है कि यह एफसीआरए की निगरानी से बाहर चल रहा था।

सबूतों से पता चलता है कि भारत में टीटीआई की उपस्थिति सीमित नहीं थी। इसके पास धन, प्रशिक्षण प्रणाली, विदेशी चर्च की मदद, जातियों और संप्रदायों के नेटवर्क, स्थानीय स्तर पर जन अभियान में वह शामिल था। दूसरे शब्दों में, टीटीआई के इर्द-गिर्द फैला नेटवर्क एक संगठन से कहीं अधिक व्यापक था और भारत पर केंद्रित एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय चर्च ढाँचे का एक हिस्सा था।

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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