Monday, March 30, 2026
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बुर्के में कैद, 9 साल की उम्र में निकाह, तालीम पर पाबंदी… खामेनेई को नहीं सुहाती थी ईरानी महिलाओं की स्वच्छंदता, बना दिया मजहबी कट्टरपंथ का गुलाम

इस्लामी क्रांति 1979 से पहले महिलाओं को पढ़ने- लिखने, हिजाब नहीं पहनने और सामाजिक राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने की आजादी थी। इस्लामी क्रांति के बाद स्कूल जाने वाली छोटी छोटी बच्चियों को भी काला हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया गया। टीचर जो स्कूल में स्कर्ट टॉप पहनकर आती थीं, उन्हें नकाब और बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया गया।

ईरान में महिलाएँ अब खामेनेई की मौत पर जश्न मना रही हैं। सालों से अधिकारों से वंचित, पर्दे में रहने को मजबूर महिलाओं का मानना है कि अब वह इस्लामी क्रांति से पहले जैसी आजादी का लुत्फ उठा पाएँगी। पिछले कुछ सालों से ईरान में महिलाओं का अधिकार सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रहा है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ महिलाएँ कई बार सड़कों पर उतर चुकी हैं।

हाल ही में विरोध प्रदर्शन करने वाली एक महिला की तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें वह खामेनेई की तस्वीर से सिगरेट सुलगाते हुए नजर आई थी। खामेनई की मौत पर वह जश्न मनाते भी नजर आई। दरअसल महिलाओं का ये जश्न 1979 में इस्लामी क्रांति के बाद लगी पाबंदियों से ‘आजादी’ को लेकर है। दशकों से सख्त धार्मिक और सामाजिक पाबंदियों में जी रही महिलाओं को अब नई रौशनी मिलती दिख रही है।

इस्लामी क्रांति 1979 से पहले महिलाओं को पढ़ने- लिखने, हिजाब नहीं पहनने और सामाजिक राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने की आजादी थी। सबसे अहम बात यह है कि 1979 से पहले जब मुहम्मद रजा पहलवी के वक्त लोगों को धार्मिक आजादी थी। चाहे वह किसी भी धर्म को माने, ये उसका निजी मसला माना जाता था। किसी धर्म के आधार पर सत्ता नहीं चलती थी।

महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर हिजाब पहनने पर रोक थी। धार्मिक पहचान जाहिर करने पर रोक लगाया गया था। 8 जनवरी 1936 को कश्फ ए हिजाब का कानून लागू किया गया। इसके मुताबिक, महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर किसी तरह की धार्मिक पहचान दिखाने की इजाजत नहीं थीं। यूँ कहें कि महिलाओं को हिजाब पहनने पर प्रतिबंध था।

हिजाब पहनने के लिए बाध्य किया गया

इस्लामी क्रांति के बाद स्कूल जाने वाली छोटी-छोटी बच्चियों को भी काला हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया गया। स्कूल में टीचर स्कर्ट टॉप पहनकर आती थीं, उन्हें नकाब और बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया गया। पहले स्कूल में लड़के-लड़कियाँ सभी एक साथ पढ़ते थे। पढ़ाने वाले भी पुरुष और महिला दोनों होते थे।

स्कूलों में फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाएँ आम थी। किसी तरह की धार्मिक किताब पढ़ाने की मजबूरी नहीं थी। लेकिन इस्लामी क्रांति ने ऐसे स्कूलों को बंद करवा कर लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग स्कूल की व्यवस्था की। लड़कियों के स्कूल में सिर्फ महिलाओं की एंट्री होती थी। सभी महिलाएँ बुर्के में ढँकी होती थी। यहाँ तक कि छोटी-छोटी बच्चियाँ, जो पहले स्कर्ट-शर्ट पहनकर आती थीं, उन्हें हिजाब पहनकर स्कूल आना पड़ता है।

ग्राफिक नॉवेल राइटर और एनीमेशन आर्टिस्‍ट मरजान सतरापी के मुताबिक, शुरुआत में कई बच्चियाँ हिजाब नहीं पहनती थीं। एक दिन कट्टरपंथियों ने स्कूल जा रही बच्चियों को जबरदस्ती हिजाब पहना दी। लड़कियाँ डरते हुए स्कूल के अंदर भागीं। इसके बाद स्कूलों को नियम की अनदेखी करने पर कठोर कार्रवाई की गई।

इस्लामी क्रांति के बाद सत्ता में आए अयातुल्लाह खोमैनी का मानना था कि महिलाओं का काम पति की सेवा करना, बच्चे पैदा करना, घर में रहना और परिवार की देखभाल करना है।

कट्टर इस्लामिक कानून आ जाने के बाद अंग्रेजी, फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाओं पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। विदेशी संगीत, कपड़ों और थियेटरों पर रोक लग गई। इसका पालन नहीं करने पर जेल भेज दिया जाता था या कोड़ों की सजा दी जाती थी।

लेखक नॉवेल ने बताया है कि 1979 के बाद लड़कियों और महिलाओं की हालत बदत्तर हो गई। इस दौरान अमीर घर की 20 लाख महिलाएँ और लड़कियाँ अपना देश छोड़ कर चली गईं।

9 साल की लड़कियों का निकाह

महिलाओं के निकाह की उम्र जो 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले 18 साल थी, उसे घटा कर 13 साल कर दिया गया। हालाँकि ईरानी कानून के तहत जबरदस्ती निकाह नहीं किया जा सकता, लेकिन लड़कियों को निकाह के लिए बचपन में ही मजबूर किया जाता है, चाहे उसकी मर्जी हो या नहीं हो।

कानून के मुताबिक, 13 साल की लड़कियों का निकाह, उसकी मर्जी से या बिना मर्जी के ईरान में धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक आधार पर सही है। 13 साल से कम उम्र होने पर भी उसकी मर्जी से उसके परिवार वाले निकाह कर सकते हैं। यहाँ तक कि अब्बू की मर्जी या कानूनी इजाजत से 8 साल और 9 महीने (9 लीप ईयर) की उम्र में भी उसका निकाह हो सकता है।

ईरान के स्टैटिस्टिकल सेंटर के मुताबिक, 2023 में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के निकाह करीब 135000 रजिस्टर्ड हुए। हालाँकि जो निकाह रजिस्टर्ड नहीं हुए उनकी संख्या इससे ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कोई लड़की यह कहती है कि उसे निकाह के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो कानून के मुताबिक उसे जुल्म माना जाएगा।

हालात ऐसे हैं कि लड़की को सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलती है। इसके अलावा लड़की की उम्र, फैमिली बैकग्राउंड, पढ़ाई-लिखाई और उसकी सोशियो-इकॉनॉमिक हालात के आधार पर तय होता है कि उसे निकाह के लिए मजबूर किया जा रहा है या नहीं।

दरअसल कानून में 9 साल की उम्र में निकाह की इजाजत दी गई है। 13 साल से उसकी मर्जी के बगैर भी निकाह करने की मान्यता है। ऐसे में कानूनी सुरक्षा भी महिला को नहीं मिल पाती है।

मुस्लिम महिलाएँ सिर्फ मुस्लिम व्यक्ति से निकाह कर सकती है और एक वक्त में एक की बीवी रह सकती है। लेकिन पुरुषों को 4 बीवियों को एक साथ रखने की इजाजत है। इतना ही नहीं अस्थाई तौर पर भी बीवियों को रखे जाने की इजाजत दी गई है।

इस्लामी क्रांति से पहले महिलाओं को वोट देने का अधिकार था

1979 से पहले महिलाओं को लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल होने का अधिकार था। ईरान दुनिया के उन कुछ मुल्कों में शामिल है, जहाँ महिलाओं को वोट देने का अधिकार था। संसद में चुनकर आने का अधिकार था। विमेन पर्सनल लॉ 1967 के अंतर्गत महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गये थे।

लड़कियों के निकाह की उम्र 18 साल तय की गई। इसके लिए लड़कियों की इच्छा अनिवार्य थी। लेकिन इस्लामी क्रांति ने महिलाओं को 200 साल पीछे भेज दिया। खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी शासन ने महिलाओं से सारी स्वायत्ता, स्वतंत्रता और अधिकार छीन लिए।

आज हालात ये है कि ईरान के समाज और उसके कानूनी सिस्टम में पुरुष और महिलाओं के बीच भेदभाव काफी गहरा है। महिलाओं और लड़कियों को पुरुषों और लड़कों से कम अधिकार प्राप्त हैं। उनकी हैसियत कम आंकी जाती है।

हर लड़की या महिला के लिए पुरुष अभिभावक अनिवार्य

मेल गार्जियनशिप कानून के मुताबिक, हर लड़की और महिला का एक पुरुष अभिभावक अनिवार्य कर दिया गया। वह न तो स्कूल या कॉलेज बगैर इजाजत के जा सकती है और न ही निकाह कर सकती है। यहाँ तक कि महिलाओं को संपत्ति खरीदने, यात्रा करने के लिए, बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए पुरुष अभिभावक की लिखित अनुमति अनिवार्य है।

ऐसे देश,जहाँ पहले महिलाएँ प्रतिनिधित्व करती थीं, वैज्ञानिक बनती थीं, उच्च शिक्षा प्राप्त कर आजादी से जिंदगी बिताती थीं,वहाँ उन्हें किसी के रहमोकरम पर रहने के लिए मजबूर कर दिया गया।

कॉस्मैटिक्स के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध

सजना-सवँरना महिलाओं का हक माना जाता है। लेकिन इस्लामी क्रांति ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। महिलाएँ किसी तरह के सौन्दर्य प्रसाधन का इस्तेमाल नहीं कर सकती थीं। व्यूटी पार्लर गैरकानूनी थे। बाल कटवाना भी बैन था। हालाँकि महिलाएँ चोरी-छिपे ब्यूटी पार्लर अपने घर पर ही चलाती थीं और महिलाएँ बुर्का पहनकर वहाँ पहुँचती थीं।

‘गश्त ए एरशाद’ लाकर शरिया कानून लागू किया गया

गश्त ए एरशाद 2006 को लागू कर ईरान में शरिया कानून लागू किया गया था। इसके माध्यम से एक गश्त एक एरशाद यानी मोरैलिटी पुलिस की नियुक्ति की गई थी, जो ये पता लगाता था कि सार्वजनिक जगहों या निजी जिंदगी में भी कौन महिला या पुरुष इस्लामी कानून का पालन नहीं कर रहा है। इसने महिलाओं की घर के अंदर की आजादी भी छीनने की कोशिश की। यही वजह है कि महिलाएँ का विद्रोह कई बार इस्लामी क्रांति के बाद देखा गया।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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