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1973 का इजरायल-अरब युद्ध, तेल का संकट और ब्राजील का गन्ना मॉडल: कैसे दुनिया को मिला पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का फॉर्मूला, भारत भी उसी राह पर

ब्राजील ने 1930 के दशक में गन्ने से बने एथेनॉल को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। बाद में यह नियम घरेलू तेल पर भी लागू हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति पर खतरा बढ़ने के बाद एथेनॉल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और एक समय ब्लेंडिंग 50% तक पहुँच गई थी।

भारत में 20% एथेनॉल मिलाए गए पेट्रोल यानी E20 को लेकर विवाद तेज हो गया है। सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और प्रदूषण कम होगा। वहीं कई वाहन मालिक, खासकर पुराने वाहनों का इस्तेमाल करने वाले लोग, माइलेज घटने, इंजन पर असर पड़ने और खर्च बढ़ने की आशंका जता रहे हैं। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है और वहाँ एथेनॉल कार्यक्रम से जुड़ी याचिका पर सुनवाई हो रही है।

विवाद तब और बढ़ गया जब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में E20 योजना को ‘चल रहा प्रयोग’ बताया है। सरकार ने इन रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए कहा कि अटॉर्नी जनरल ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया। केंद्र के मुताबिक, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम कोई प्रयोग नहीं बल्कि सोच-समझकर बनाई गई राष्ट्रीय नीति है

क्यों एथेनॉल मिलाए गए पेट्रोल को बढ़ावा दे रही सरकार?

सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग सिर्फ ईंधन से जुड़ा फैसला नहीं है बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक रणनीति का हिस्सा है। केंद्र के मुताबिक, गन्ने से बने एथेनॉल से पेट्रोल के मुकाबले करीब 65% और मक्के से बने एथेनॉल से करीब 50% कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है।

सरकार का दावा है कि इससे गन्ना और मक्का किसानों को फायदा हुआ है, उनकी आय बढ़ी है और गन्ना बकाया चुकाने में मदद मिली है। ESY (Ethanol Supply Year) 2014-15 से जुलाई 2025 तक भारत ने ₹1.44 लाख करोड़ से ज्यादा विदेशी मुद्रा बचाई, 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात की जगह एथेनॉल का इस्तेमाल किया और कार्बन उत्सर्जन घटाया। इस साल किसानों को एथेनॉल उत्पादन से करीब ₹40,000 करोड़ की आय और देश को करीब ₹43,000 करोड़ विदेशी मुद्रा बचत की उम्मीद है।

वाहनों के प्रदर्शन पर उठ रहे सवालों पर सरकार ने IOCL, ARAI और SIAM की स्टडी का हवाला दिया। सरकार के अनुसार E20 ईंधन E10 की तुलना में बेहतर पिकअप, शहरों में स्मूद ड्राइविंग और कम प्रदूषण देता है। हालाँकि चिंता अभी भी है क्योंकि अप्रैल 2023 से पहले बने वाहन मूल रूप से E20 के लिए डिजाइन नहीं थे। कई वाहन मालिक माइलेज कम होने और इंजन पार्ट्स के घिसने की आशंका जता रहे हैं जबकि सरकार का कहना है कि 2009 के बाद बने ज्यादातर वाहन मामूली बदलाव के साथ E20 चला सकते हैं।

नया आइडिया नहीं है एथेनॉल ब्लेंडिंग

एथेनॉल ब्लेंडिंग कोई नई नीति नहीं है। आज भले इसे लेकर बहस हो लेकिन कई देश दशकों से यातायात ईंधन में एथेनॉल का इस्तेमाल कर रहे हैं। ब्राजील इसका सबसे पुराना और सफल उदाहरण माना जाता है। अमेरिका, जापान और स्वीडन जैसे देशों ने भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने और प्रदूषण कम करने के लिए एथेनॉल को बढ़ावा दिया है।

ब्राजील का मॉडल इतना सफल रहा कि भारत और चीन समेत कई देशों ने अपने एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम बनाते समय उसका अध्ययन किया। ब्राजील में एथेनॉल की शुरुआत जलवायु चिंता से नहीं बल्कि तेल संकट के कारण हुई थी। पहले द्वितीय विश्व युद्ध और फिर 1970 के दशक के मध्य-पूर्व युद्ध ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया।

ब्राजील ने 1930 के दशक में गन्ने से बने एथेनॉल को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। फरवरी 1931 में सरकार ने सभी आयातित पेट्रोल में 5% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया। बाद में यह नियम घरेलू तेल पर भी लागू हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति पर खतरा बढ़ने के बाद एथेनॉल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और एक समय ब्लेंडिंग 50% तक पहुँच गई थी।

1973 के मिडिल ईस्ट युद्ध ने कैसे बदली ब्राजील की तेल नीति

1973 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद अरब देशों ने तेल प्रतिबंध लगाया, जिससे दुनिया भर में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं। उस समय ब्राजील अपने करीब 80% ईंधन के लिए आयात पर निर्भर था, इसलिए उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ा। कुछ ही महीनों में देश मंदी में चला गया और विदेशी मुद्रा कमाई का लगभग 40% हिस्सा आयातित तेल खरीदने में खर्च होने लगा।

इसके बाद ब्राजील को समझ आया कि आयातित तेल पर इतनी निर्भरता टिकाऊ नहीं है। 1975 में जनरल अर्नेस्टो गाइजल की सैन्य सरकार ने पेट्रोल में गन्ने से बने 10% एथेनॉल की मिलावट अनिवार्य कर दी। अगले पाँच वर्षों में यह अनुपात बढ़कर 25% तक पहुँच गया। इससे पेट्रोल की बचत हुई और देश के गन्ना किसानों के लिए स्थायी बाजार तैयार हुआ।

सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए कर्ज दिए और टेक्नोलॉजी व ईंधन ढाँचे में निवेश किया। वाहन कंपनियों ने भी एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियाँ बनाईं। बाद में ब्राजील में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन आए, जिनमें चालक पेट्रोल और एथेनॉल में से सस्ता विकल्प चुन सकता था।

आज ब्राजील में शुद्ध पेट्रोल से चलने वाली हल्की गाड़ियाँ नहीं बिकतीं। वहाँ E25 यानी 25% एथेनॉल वाला पेट्रोल आम है जबकि E100 भी फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए उपलब्ध है। इन्हीं कदमों के कारण ब्राजील को दुनिया की पहली सफल ‘सस्टेनेबल’ बायोफ्यूल अर्थव्यवस्था माना गया और उसका मॉडल कई देशों के लिए उदाहरण बना।

कैसे रही है भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की यात्रा

भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की नीति मौजूदा सरकार से कई साल पुरानी है। RTI से मिले सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इसका पहला औपचारिक कदम अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय उठा था। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में पायलट प्रोजेक्ट सफल रहने के बाद सितंबर 2002 में केंद्र ने नोटिफिकेशन जारी कर जनवरी 2003 से 9 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों में पेट्रोल में 5% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया था।

इसका उद्देश्य वही था जो आज बताया जा रहा है: प्रदूषण कम करना, किसानों को फायदा देना और आयातित तेल पर निर्भरता घटाना। बाद में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान 2004 और 2006 में इस कार्यक्रम को और राज्यों तक बढ़ाया गया। 2013 में तेल कंपनियों को 10% तक एथेनॉल मिला पेट्रोल बेचने का निर्देश दिया गया, जिससे इसके देशव्यापी विस्तार की नींव पड़ी।

मोदी सरकार ने इस कार्यक्रम को तेज किया। 2019 में देश के अधिकतर हिस्सों में E10 लागू किया गया, 2021 में E100 को कानूनी मान्यता मिली और उसी साल E20 को मंजूरी दी गई। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से E20 लागू हुआ और इस साल यह देश का मानक ईंधन बन गया।

E20 पर मौजूदा बहस भले ही वाहनों की क्षमता, माइलेज और उपभोक्ताओं की चिंता पर केंद्रित हो लेकिन एथेनॉल ब्लेंडिंग का विचार न तो नया है और न ही केवल भारत तक सीमित है। ब्राजील ने करीब 5 दशक पहले तेल संकट के बाद आयातित ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए यह रास्ता अपनाया था। भारत भी दो दशक से ज्यादा समय पहले इसी दिशा में बढ़ना शुरू कर चुका था और अलग-अलग सरकारों ने समय के साथ इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।

अब जब भारत आने वाले वर्षों में एथेनॉल ब्लेंडिंग को और बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, तो बहस इस बात पर नहीं रह जाती कि यह कोई नया प्रयोग है या नहीं। असली सवाल यह है कि देश ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए जिससे कई सरकारों और पीढ़ियों में विकसित हुई इस नीति को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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Divya Bharti
Divya Bharti
I am a digital journalist specializing in political analysis. My goal is to break down complex stories into easy, engaging reads for everyone.

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