ईरान पर अमेरिकी हमले और अमेरिका के साथ उसके सहयोगियों पर ईरान के हमलों के बाद से पश्चिम एशिया का इलाका एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठ गया है। ईरान और उसके विरोधियों के बीच छिड़ी इस नई जंग ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। ऐसे में हर भारतीय के मन में यही सवाल उठ रहा है कि ईरान फिर से बना वॉर जोन, क्या हिंदुस्तान है तैयार? भारत के सामने कौन सी चुनौतियाँ हैं और कितनी तैयार है मोदी सरकार?
यह सवाल इसलिए भी बेहद गंभीर है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बहुत हद तक खाड़ी देशों पर निर्भर है। जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो उसकी सीधी आँच भारतीय रसोई से लेकर देश के राजकोष तक पहुँचती है। मोदी सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती देश की आर्थिक रफ्तार को थामे रखने और घरेलू बाजार में तेल-गैस की कीमतों को नियंत्रण में रखने की है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार का संकट पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा जटिल है क्योंकि यह सीधे तौर पर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग को प्रभावित कर रहा है।
भारत के लिए यह परीक्षा की घड़ी इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बदल रही हैं। जब मार्च के शुरुआती हफ्ते में तनाव बढ़ा, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें देखते ही देखते 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं। अभी ये दाम कर हैं, लेकिन हॉर्मुज के बंद होने के बाद कीमते फिर से तेजी से बढ़ रही हैं। हालाँकि मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा नीति में जो रणनीतिक बदलाव किए हैं, उनकी वजह से भारत इस झटके को झेलने में काफी हद तक सफल रहा है। सरकार ने न केवल तेल के आयात स्रोतों को बदला है, बल्कि देश के भीतर भी आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए मजबूत इंतजाम किए हैं।
फिर भी चुनौती छोटी नहीं है क्योंकि कच्चे तेल के साथ-साथ एलएनजी और एलपीजी की आपूर्ति को बनाए रखना एक बेहद मुश्किल काम बन गया है। इस पूरे संकट के बीच भारतीय कूटनीति और आर्थिक प्रबंधन की असली परीक्षा होनी बाकी है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की नाकाबंदी और भारत का क्रूड-एलएनजी संकट
इस पूरे युद्ध का सबसे खतरनाक पहलू स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज यानी हॉर्मुज जलडमरूमध्य का आंशिक या पूर्ण रूप से बंद होना रहा है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरती है। भारत की बात करें तो हम अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करते हैं और इस आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा यानी करीब आधा भाग इसी रास्ते से होकर हमारे देश पहुँचता है।
इससे भी बड़ी चिंता एलपीजी को लेकर है, जिसका 60 से 65 प्रतिशत आयात इसी हॉर्मुज के रास्ते होता है। जैसे ही ईरान ने इस मार्ग पर प्रतिबंध लगाए या युद्ध के कारण यहाँ जहाजों की आवाजाही बाधित हुई, वैसे ही भारत के सामने ऊर्जा का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया। कतर जैसे बड़े गैस उत्पादक देश ने भारत को होने वाली अपनी आपूर्ति पर अस्थाई रोक लगा दी, जिससे हमारी गैस पाइपलाइनों में दबाव कम होने का खतरा पैदा हो गया।
इस अप्रत्याशित संकट के बीच भारत को अपनी रणनीति में बहुत तेजी से बदलाव करना पड़ा।
एनर्जी डेटा पर नजर रखने वाली संस्था केपलर के रिसर्च गेट में छपे लेख के आँकड़ों के अनुसार, मार्च से मई के बीच जहाँ कतर से भारत का एलएनजी आयात घटकर महज शून्य दशमलव एक मिलियन टन रह गया, वहीं भारत ने अमेरिकी बाजार की तरफ रुख किया। इसी अवधि में अमेरिका भारत को एलएनजी सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश बनकर उभरा और उसने करीब डेढ़ मिलियन टन गैस की आपूर्ति की।
इसके अलावा भारत ने ओमान, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से भी अतिरिक्त गैस के सौदे किए। कच्चे तेल के मोर्चे पर भी रूस से आने वाले तेल ने भारत के लिए एक बड़े सुरक्षा कवच का काम किया। रूस से मिलने वाले डिस्काउंटेड तेल की वजह से भारतीय रिफाइनरियों को लगातार कच्चा तेल मिलता रहा, जिससे देश के भीतर पेट्रोल और डीजल की भारी किल्लत होने से बच गई। हालाँकि ये बात सर्वविदित है कि यह केवल तात्कालिक राहत है और अगर यह नाकाबंदी लंबे समय तक खिंचती है, तो वैकल्पिक रास्तों से माल मँगाने का खर्च भारत के व्यापार घाटे को बहुत ज्यादा बढ़ा सकता है।
मोदी सरकार की संकट प्रबंधन रणनीति और आवश्यक वस्तु अधिनियम
अंतरराष्ट्रीय बाजार में मचे इस हाहाकार का सीधा असर भारत के आम नागरिकों पर न पड़े, इसके लिए मोदी सरकार ने घरेलू मोर्चे पर बेहद कड़े और अनुशासनबद्ध कदम उठाए हैं। वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कमी को देखते हुए केंद्र सरकार ने तुरंत हरकत में आते हुए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को लागू कर दिया।
इस कानून के तहत सरकार ने देश के भीतर उपलब्ध एलपीजी और प्राकृतिक गैस के वितरण को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया। सरकार की पहली प्राथमिकता देश के करोड़ों घरों की रसोइयों को बचाना था। इसलिए रणनीतिक तौर पर यह तय किया गया कि गैस की पहली आपूर्ति घरेलू एलपीजी सिलेंडरों और घरों में आने वाली पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी को की जाएगी।
सके बाद बची हुई गैस को सीएनजी यानी पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सबसे महत्वपूर्ण रूप से देश के खाद कारखानों को दिया गया ताकि किसानों को यूरिया और अन्य खादों की कमी का सामना न करना पड़े। हालाँकि मौजूदा समय में भारत सरकार ने आंतरिक तौर पर लागू पाबंदियों को हटा लिया है, लेकिन युद्ध के फिर से छिड़ने से एक बार फिर ये समस्या खड़ी हो सकती है।
इस सख्त कदम का असर यह हुआ कि बड़े उद्योगों और निजी रिफाइनरियों के लिए गैस की आपूर्ति में थोड़ी कटौती जरूर हुई, लेकिन आम जनता को ईंधन के लिए लाइनों में नहीं लगना पड़ा। हालाँकि इस संकट के कारण घरेलू बाजार में एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कुछ बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसने आम मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट पर थोड़ा दबाव जरूर डाला, लेकिन स्थिति को नियंत्रण से बाहर नहीं जाने दिया गया।
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस वैश्विक तूफान के बावजूद भारत का घरेलू बाजार काफी मजबूत बना हुआ है। जून के महीने में देश के भीतर गाड़ियों की बिक्री में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी गई, जो यह दर्शाती है कि आम जनता का भारतीय अर्थव्यवस्था और अपनी आय पर भरोसा डिगा नहीं है। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं यानी फ्रिज, एसी जैसी चीजों की माँग भी घरेलू बाजार में बहुत तेज रही, जिसने वैश्विक मंदी के असर को भारत के भीतर हावी नहीं होने दिया।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार और ओएनजीसी का बड़ा कदम
किसी भी देश के लिए युद्ध जैसी स्थिति में सबसे बड़ा सहारा उसका अपना जमा किया हुआ तेल भंडार होता है, जिसे स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व कहा जाता है। भारत के पास इस समय लगभग 74 दिनों की खपत के बराबर कच्चे तेल और एलपीजी का आपातकालीन भंडार मौजूद है। लेकिन इस संकट ने यह साबित कर दिया कि भारत जैसे विशाल देश के लिए यह भंडार आने वाले समय में नाकाफी साबित हो सकता है।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने देश के भीतर तेल भंडारण की क्षमता को युद्धस्तर पर बढ़ाने का फैसला किया है। अभी 9 जुलाई 2026 को देश की दिग्गज सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी ने घोषणा की कि वह मंगलुरु में भारत के मौजूदा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में एक दशमलव 7.5 मिलियन टन यानी करीब पौने दो करोड़ बैरल अतिरिक्त तेल भंडारण की क्षमता जोड़ने जा रही है। वहीं, ओएनजीसी लगातार भारतीय जल क्षेत्र में ड्रिंलिंग कर कच्चे तेल की खोज कर रही है, जिसमें उसे सफलता भी मिल रही है। अंडमान के इलाके में भारत को बड़ी सफलताएँ भी इसी मुश्किल दौर में मिली हैं।
यह कदम भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद मील का पत्थर साबित होने वाला है क्योंकि अभी तक इस तरह के भूमिगत गुफाओं वाले भंडारों का निर्माण केवल सरकार सीधे तौर पर करती थी, लेकिन अब ओएनजीसी जैसी कंपनियाँ इसमें अपनी पूँजी लगा रही हैं।
इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात की सरकारी तेल कंपनी एडनॉक भी भारत में अपनी भंडारण क्षमता को दोगुना करके चार मिलियन टन करने की योजना पर काम कर रही है।
सरकार की कोशिश है कि भारत के पास कम से कम इतने दिनों का तेल और गैस रिजर्व होना चाहिए कि अगर खाड़ी देशों में दो-तीन महीने तक पूरी तरह से कामकाज ठप भी रहे, तो भी भारत के उद्योग और गाड़ियाँ बिना रुके चलती रहें। बुनियादी ढाँचे में किए जा रहे ये सुधार ही भविष्य में भारत को किसी भी वैश्विक भू-राजनीतिक झटके से पूरी तरह सुरक्षित बना पाएँगे।
क्या अमेरिका-ईरान की यह जंग सिर्फ 60 दिनों का दबाव बनाने का खेल है?
इस युद्ध के पीछे की कूटनीति को समझने वाले अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का एक धड़ा यह भी मान रहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रही यह सीमित जंग दरअसल कोई पूर्ण युद्ध नहीं, बल्कि एक-दूसरे पर दबाव बनाने की सोची-समझी रणनीति है। इस कूटनीतिक खेल का मकसद दोनों पक्षों को एक ऐसी स्थिति में लाना है जहां वे आगामी 60 दिनों के भीतर किसी बड़े और नए समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हो जाएँ।
इतिहास गवाह है कि जब भी दो देश किसी समझौते की मेज पर बैठना चाहते हैं, तो उससे ठीक पहले वे अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करके अपनी शर्तों को मनवाने का प्रयास करते हैं। ईरान ने हॉर्मुज को आंशिक रूप से बंद करके यह दिखा दिया कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की नस दबा सकता है, वहीं अमेरिका ने प्रतिबंधों और सैन्य तैनाती से ईरान की आर्थिक रीढ़ को निशाना बनाया है।
साउथ-ईस्ट एशिया पर बड़ा प्रभाव, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी मंदी का साया
ईरान के इस वॉर जोन में बदलने का खामियाजा सिर्फ भारत को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया और खासकर एशियाई देशों को भुगतना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस साल की वैश्विक विकास दर के अनुमान को घटाकर तीन प्रतिशत कर दिया है और इसके पीछे मुख्य वजह इसी युद्ध के कारण लगा ऊर्जा का बड़ा झटका है।
खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और गैस का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा एशिया के चार बड़े देशों चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया में आता है। इसलिए इस मार्ग में होने वाली किसी भी रुकावट का सबसे पहला और सबसे बुरा असर दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशियाई देशों पर पड़ता है। वियतनाम, थाईलैंड, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देश, जो अपनी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के लिए पूरी तरह से आयातित ईंधन पर निर्भर हैं, वहाँ कारखानों की लागत बहुत तेजी से बढ़ी है।
इन देशों की सरकारों के सामने संकट यह है कि वे अपने नागरिकों को महँगी दरों पर ईंधन नहीं दे सकते क्योंकि इससे घरेलू विद्रोह का खतरा बढ़ जाता है, और अगर वे सब्सिडी देते हैं तो उनका खजाना खाली होने लगता है। चीन ने हालाँकि अपने विशाल रणनीतिक भंडार (जो करीब चौदह सौ मिलियन बैरल का है) के दम पर खुद को इस संकट से कुछ हद तक बचा लिया है, लेकिन उसने भी अपने देश से रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी है ताकि उसके अपने घरेलू बाजार में कोई किल्लत न हो।
चीन के इस कदम से दक्षिण-पूर्वी एशिया के उन छोटे देशों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं जो चीनी रिफाइनरियों से पेट्रोल-डीजल खरीदते थे। इन परिस्थितियों ने पूरे क्षेत्र में एक ऐसी आर्थिक अनिश्चितता पैदा कर दी है जिससे बाहर निकलने में इन विकासशील देशों को लंबा समय लग सकता है।
पाकिस्तान की खोखली कूटनीति और आर्थिक बर्बादी का नया अध्याय
इस पूरे संकट में अगर किसी देश की हालत सबसे ज्यादा दयनीय और हास्यास्पद बनी हुई है, तो वह है हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान। कुछ समय पहले तक पाकिस्तान के हुक्मरान और राजनयिक अपनी पीठ थपथपा रहे थे कि उन्होंने अमेरिका की सरपरस्ती हासिल कर ली है और वे अमेरिकी प्रभाव का इस्तेमाल करके अपने लिए सस्ता तेल और वित्तीय मदद का रास्ता साफ कर चुके हैं।
पाकिस्तान में इस बात का ढिंढोरा पीटा जा रहा था कि उनकी ‘अमेरिकी चटाई’ वाली डिप्लोमेसी देश की बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन जैसे ही ईरान युद्ध की आग भड़की, पाकिस्तान के कूटनीतिक दावों की हवा निकल गई। पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि भारत या चीन की तरह उसके पास कोई रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार नहीं है जो संकट के दिनों में देश का पहिया चला सके।
वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ते ही पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म होने की कगार पर पहुँच गया है। जो तेल उन्हें कुछ राहत दे रहा था, उसकी आपूर्ति बाधित होते ही वहाँ पेट्रोल-डीजल की भयंकर राशनिंग शुरू हो गई है। पाकिस्तान के भीतर महँगाई की दर आसमान छू रही है और बिजली ग्रिड पूरी तरह चरमरा गए हैं क्योंकि उनके पास बिजली बनाने के लिए तेल या गैस खरीदने के पैसे नहीं बचे हैं।
अटलांटिक काउंसिल के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन का कहना है कि पाकिस्तान इस समय बेहद डरा हुआ है क्योंकि ईरान के साथ उसकी एक लंबी जमीनी सीमा लगती है। अगर यह युद्ध और भड़कता है, तो पाकिस्तान के भीतर न सिर्फ आर्थिक बल्कि सुरक्षा का भी एक ऐसा संकट पैदा हो जाएगा जिसे संभालना उसके बस की बात नहीं होगी। उनकी तथाकथित अमेरिकी डिप्लोमेसी इस समय उनके किसी काम नहीं आ रही है क्योंकि अमेरिका खुद इस युद्ध में सीधे तौर पर उलझा हुआ है।
कूटनीतिक स्वायत्तता और हरित ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़े कदमों से संभल रहा भारत
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की विशेषज्ञ विभूति गर्ग और पूर्वा जैन के अनुसार, इस पूरे संकट ने भारत को एक बहुत बड़ा सबक दिया है। भारत ने अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता के दम पर रूस और अमेरिका दोनों से अपने संबंध संतुलित रखते हुए तात्कालिक तौर पर खुद को बचा जरूर लिया है, लेकिन यह संकट इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता देश की संप्रभुता के लिए कभी भी खतरा बन सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मोदी सरकार को इस संकट को एक अवसर या उत्प्रेरक के रूप में देखना चाहिए और देश के भीतर स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण यानी क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन की रफ्तार को दोगुना कर देना चाहिए।
भारत को सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों के घरेलू विनिर्माण को इतनी तेजी से बढ़ाना होगा कि खाड़ी देशों में होने वाले किसी भी धमाके की गूंज भारत के बाजारों में सुनाई न दे। सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाए भी हैं और देश के भीतर रिन्यूएबल एनर्जी की क्षमता लगातार बढ़ रही है।
बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो ईरानी इलाके का फिर से वॉर जोन बनना भारत के लिए एक चेतावनी की तरह है कि दुनिया कभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहने वाली है। मोदी सरकार ने इस संकट के दौरान जो प्रशासनिक दृढ़ता, रणनीतिक दूरदर्शिता और त्वरित आर्थिक प्रबंधन दिखाया है, उसने देश को एक बड़ी आपदा से तो निकाल लिया है, लेकिन आत्मनिर्भरता की असली मंजिल अभी थोड़ी दूर है।


