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लिपुलेख दर्रे के भारतीय क्षेत्र पर नेपाल ने ठोका दावा: क्या अमेरिकी डॉलर के दम पर आँखें दिखा रहा पड़ोसी देश, जानें विवाद का पूरा इतिहास

भारत और चीन के बीच लिपुलेख से व्यापार शुरू करने के समझौते पर नेपाल ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है। दरअसल ये आपत्ति अमेरिका के कूटनीति का नतीजा है। अमेरिका के वित्तीय मदद की वजह से नेपाल इस तनाव को बढ़ा रहा है।

लिपुलेख दर्रे को लेकर विवाद एक बार फिर गरमा गया है। दिल्ली और बीजिंग लिपुलेख दर्रे के जरिए व्यापार को एक बार फिर शुरू करने पर सहमत हो गए हैं। इस पर नेपाल ने आपत्ति जताई है। नेपाल इसे ‘अपना क्षेत्र’ कह रहा है। लेकिन इसका न तो कोई ऐतिहासिक आधार है और न ही औचित्य।

दरअसल इसके पीछे अमेरिका है। नेपाल ने लिपुलेख विवाद को हाल ही में बढ़ाया है। अमेरिका ने हाल के वर्षों में उसे विदेशी सहायता उपलब्ध कराई है। नेपाल में उसका बोलबाला है।

क्या है लिपुलेख विवाद

लिपुलेख दर्रा एक त्रि-संधि क्षेत्र में स्थित है। यहाँ भारत, चीन और नेपाल की सीमा जुड़ी हैं। इस पर नेपाल और भारत दोनों अपना दावा करते हैं। नेपाल, लिपुलेख के साथ-साथ आस-पास के कालापानी और लिंपियाधुरा क्षेत्रों को अपने आधिकारिक मानचित्रों और संविधान में शामिल करता है और सुगौली संधि के अनुसार काली नदी को सीमांत क्षेत्र घोषित करता है।

2020 में, नेपाल ने एक राजनीतिक मानचित्र जारी करके कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख को देश का हिस्सा दिखाया सीमा विवाद को पैदा किया था। भारत उस वक्त भी नेपाल के दावे का खंडन किया था और दावा किया था कि नदी का उद्गम नीचे की ओर है। इसलिए यह भूमि उत्तराखंड की है।

लिपुलेख को लेकर भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौता है, जिसे हाल ही में नेपाल की आपत्तियों के बावजूद एक बार फिर सहमति बनी है। भारत का तर्क है कि नेपाल के दावों का कोई ऐतिहासिक और तथ्यात्मक आधार नहीं है। वह इस भूमि पर नियंत्रण बनाए रखते हुए बातचीत करना चाहता है।

यह समस्या अगस्त 2025 में फिर से शुरू हुई, क्योंकि भारत ने चीन के साथ लिपुलेख के माध्यम से व्यापार फिर से शुरू करने की घोषणा की। नेपाल ने उसी दिन आपत्ति जताई और इस क्षेत्र पर दावा किया।

भारत के तत्काल खंडन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि ये दावे मनगढ़ंत और निराधार हैं। भारत और चीन को लिपुलेख मार्ग जोड़ता है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

अमेरिकी आर्थिक मदद का नेपाल पर असर

लिपुलेख मुद्दे पर नेपाल के दावों के पीछे संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े राजनयिक और वित्तीय सहायता को माना जा रहा है।

हालाँकि 2025 की शुरुआत में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने नेपाल में USAID की मदद से चल रही प्रमुख विकास कार्यों को निलंबित कर दिया। इनमें करोड़ों डॉलर के स्वास्थ्य, कृषि और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम शामिल थे।

राष्ट्रपति ट्रम्प के पदभार ग्रहण करने के बाद इस सहायता राशि पर 90 दिनों के लिए रोक लगा दी थी, जिससे नेपाल में संचालित विभिन्न मानवीय कार्यक्रम और गैर-सरकारी संगठन प्रभावित हुए।

हालाँकि मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) की करोड़ों डॉलर की परियोजनाएँ जारी रही। इस मदद को अमेरिका ने शर्तें लगा कर कूटनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया और नेपाल को विवश किया।

लिपुलेख में तनाव बढ़ने के साथ ही, उसी महीने विकसित हो रहा रणनीतिक आर्थिक गठबंधन इन घटनाक्रमों पर भारी पड़ रहा था। हाल ही में अमेरिका की वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनी सुनो (Suno) ने नेपाल के सिद्धार्थ बैंक के साथ मिलकर बॉर्डरलेस बैंकिंग नामक एक अभिनव परियोजना की शुरुआत की है। इससे नेपाल-अमेरिका के आर्थिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं।

अमेरिकी राजदूत डीन आर.थॉम्पसन भी इस मौके पर वहाँ मौजूद थे। इस परियोजना का फायदा अमेरिका में रहने वाले नेपालियों को भी होगा। अमेरिका में रहने वाले नेपाली बिना उड़ान भरे नेपाल में खाते खोल सकते हैं, और वे सुरक्षित और अधिक किफायती तरीके से पैसे भेज सकते हैं।

राजदूत थॉम्पसन के अनुसार, बॉर्डरलेस बैंकिंग कार्यक्रम से अमेरिका-नेपाल संबंध को मजबूती मिली है। साथ ही दुनिया भर में नेपाली समुदायों का फायदा हुआ है। वास्तव में ये डिजिटल बैंकिंग को “वास्तव में सीमा-रहित” बना रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि अमेरिकी फिनटेक कंपनियाँ और नेपाली बैंक साइबर सुरक्षा और फिनटेक के क्षेत्रों में और अधिक मजबूती से मिलकर काम कर सकते हैं, जिससे उनके द्विपक्षीय आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।

एनएमबी बैंक के साथ मिलकर, नेपाल ने अप्रैल 2025 में अमेरिका से संबद्ध संगठनों इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (आईएफसी), ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट (बीआईआई) और मेटलाइफ के साथ 60 मिलियन डॉलर का ऐतिहासिक ग्रीन बॉन्ड समझौता किया।

इस समझौते का उद्देश्य नेपाल में निजी क्षेत्र का विकास और निरंतर विकास पर केन्द्रित है। इससे रोजगार पैदा करने और ग्रीन टेक्नोलॉजी को बढ़ावा मिलेगा।

क्षेत्रीय कूटनीति के साथ समन्वय

नेपाल विदेश व्यापार संघ के एक प्रतिनिधिमंडल ने 28 अगस्त 2025 को द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए बांग्लादेश के दूत से मुलाकात की। यह मुलाकात नेपाल में बांग्लादेश के राजदूत द्वारा नेपाल के प्रमुख नीतिगत थिंक टैंक, नेपाल आर्थिक मंच के अध्यक्ष सुजीव शाक्य से मुलाकात के एक दिन बाद हुई थी। यह दक्षिण एशियाई आर्थिक माहौल में सीमा विवाद के बावजूद क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने के लिए काठमांडू की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।

इसके अलावा इसी समय पेकिंग विश्वविद्यालय के शैक्षणिक प्रतिनिधिमंडलों ने बेल्ट एंड रोड पहल पर सहयोग को बढ़ाने के लिए बांग्लादेश और नेपाल की यात्रा की। यह इस क्षेत्र में चीन के निरंतर रणनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव को दर्शाता है, जो अमेरिका और भारत के संबंध में नेपाल के कार्यों को आंशिक रूप से प्रभावित करता है।

अमेरिका से प्रभावित है नेपाल की नीति

इन घटनाओं के क्रम और समय से ये समझा जा सकता है कि लिपुलेख के मुद्दे पर नेपाल का रुख अमेरिका से प्रभावित है। वाशिंगटन, यूएसएआईडी पहलों को रोकने और फिर से शुरू करने के दौरान बारगेन कर नेपाल के राजनीतिक और कूटनीतिक रुख को प्रभावित कर रहा है।

साथ ही, बांग्लादेश और चीन के साथ नेपाल के क्षेत्रीय कूटनीतिक जुड़ाव उसके रणनीतिक संबंधों में विविधता लाने के एक सुनियोजित प्रयास का संकेत देते हैं, जिसका उद्देश्य आंशिक रूप से भारत और चीन के क्षेत्रीय प्रभुत्व को संतुलित करना है।

ऐसा लगता है कि अमेरिका सामरिक रूप से अहम नेपाल में अपनी उपस्थिति को मजबूत कर रहा है और उसकी शह पर नेपाल लिपुलेख जैसी भारत से जुड़े विवाद पर आक्रामक रुख अपना रहा है।

नेपाल की बढ़ती बाहरी सहायता के विपरीत, जिसे संभवतः अमेरिकी कूटनीतिक और आर्थिक सहयोग से सुगम या प्रोत्साहित किया गया है, भारत द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सीमा विवादों को सुलझाने पर जोर देता है।

नेपाल के लिपुलेख पर किए दावों को अमेरिका मजबूत कर रहा है, ताकि चीन, भारत और नेपाल से जुड़े इस सीमा क्षेत्र को विवादित बनाया जा सके और भारत-नेपाल संबंधों को तनावपूर्ण बनाया जा सके।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Divyansh Tiwari
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