बालेन शाह का उदय भले ही एक ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ और युवा नेतृत्व की जीत के रूप में देखा गया हो, लेकिन नेपाल की वास्तविक राजनीतिक व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है। एक तरह से कहा जा सकता है कि एक महीने में ही बालेन शाह रूपी ‘गुब्बारा’ फूट गया है।
Crazy visuals from Indo-Nepal border as Nepali forces SNATCH even small packets from citizens & TAX them 🤯
— The Analyzer (News Updates🗞️) (@Indian_Analyzer) April 20, 2026
Balen Shah Govt has imposed a custom duty on every item, even as small as ₹100.
– Thousands of Indian traders in Bihar & Uttarakhand are also hit. Bad signs! pic.twitter.com/7DgZNHcXSw
दरअसल बालेन शाह को लेकर जिस ‘जेनरेशनल शिफ्ट’ की बात की जा रही थी, वह अभी अधूरी नजर आ रही है। यह सही है कि उन्होंने पारंपरिक दलों से हटकर अपनी अलग पहचान बनाई और युवाओं के बीच खासा समर्थन हासिल किया, लेकिन उनकी राजनीतिक टीम और निर्णय प्रक्रिया में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी काफी कम है यानी प्रतिनिधित्व के स्तर पर वही पुरानी व्यवस्था कायम है।
Gen-z का आंदोलन और सत्ता तक पहुँचे बालेन शाह
Gen-z आंदोलन के बाद 2025 में नेपाल में तख्ता पलट गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उस वक्त भी Gen-z बालेन शाह को ही अपना नेता मान रहे थे। बालेन शाह के समर्थन से ही सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। चुनाव हुए और बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने प्रचंड बहुमत पाया। 27 मार्च 2026 को बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। लेकिन Gen-z की उम्मीदों पर क्या खड़े नहीं उतर पा रहे बालेन शाह? आखिर क्यों कुछ महीने बाद ही नेपाल की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है।
भारत-नेपाल के बीच बेटी-रोटी का संबंध रहा है। भारत- नेपाल सीमा से हर दिन हजारों लोग आवाजाही करते हैं और दिनचर्चा की वस्तुएँ खरीदते हैं। बालेन सरकार ने इसे हतोत्साहित करने के लिए 100 रुपए से ज्यादा कीमत के सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगा दिया है। इससे सामान उन्हें खरीद कर नेपाल ले जाना काफी महँगा पड़ रहा है। पहले सीमा पर कड़ा पहरा नहीं था और बॉर्डर क्रॉस करने के लिए पहले से अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसके विरोध में सीमावर्ती क्षेत्रों की जनता सड़कों पर उतर आई है।
लेकिन, बालेन शाह के निर्देश के बाद स्थितियाँ काफी बदल गई हैं। सीमा पार कर हर दिन सामानों की आवाजाही होती थी, उसमें कमी आ गई है। ऐसे में नेपाल को सामानों की कमी हो रही है। इससे महँगाई बढ़ने की आशंका है। सरकार भले ही टैक्स लगाकर पैसे कमा ले, लेकिन जनता बेहाल है। यही वजह है कि वहाँ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
कई राजनीतिक संगठनों ने भी बालेन शाह की नीति का विरोध किया है। इनका कहना है कि पारंपरिक रिश्तों को कमजोर करने की कोशिश बालेन सरकार ने की है। यह नीतिगत फैसला बालेन सरकार को भारी पड़ सकता है।
भ्रष्टाचार के आरोप में गृहमंत्री गुरुंग फँसे
जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ जेन जी ने विद्रोह किया था। केपी ओली की सरकार को उखाड़ फेंका था। उस भ्रष्टाचार का दीमक एक महीने में ही बालेन सरकार को लग गया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह के कैबिनेट के अहम सदस्य गृहमंत्री सुदन गुरुंग मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में फँस गए हैं। उन पर इस्तीफा देने का राजनीतिक दबाव बन रहा है।
सुदन पर विवादित बिजनेसमैन दीपक भट्ट की कंपनियों के शेयर खरीदने के आरोप हैं। ऐसे में सबकी नजर बालेन शाह पर टिकी हुई है। आखिर भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री अब क्या कदम उठाते हैं।
नेपाली कॉन्ग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने गृहमंत्री के खिलाफ स्वतंत्र जाँच की माँग की है। सिविल सोसायटी भी चाहती है कि जब तक जाँच हो, तब तक गृहमंत्री को पद से हट जाना चाहिए, क्योंकि इससे जाँच प्रभावित हो सकता है। जेन जी रेड फोर्स ने नैतिक आधार पर इस्तीफे की माँग करते हुए कहा है कि अगर गृहमंत्री गुरुंग अपने पद पर बने रहते हैं तो इससे जनता का विश्वास नई सरकार में कमजोर होगा।
स्वास्थ्य क्षेत्र में नीति पर विवाद
नेपाल में स्वास्थ्य क्षेत्र का राजनीतिकरण और भ्रष्टाचार के साथ साथ स्वास्थ्य बीमा का खस्ता हालत से लोग त्रस्त हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण से हाई क्वालिटी की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए काफी खर्च करना पड़ता है। वहीं सरकारी अस्पतालों की हालत बुरी है। बुनियादी ढाँचा भी चरमरा गया है जिससे आम जनता का ठीक से इलाज करना दूभर हो गया है।
स्वास्थ्य संस्थानों में कर्मचारी संगठनों का बोलबाला है। इससे प्रबंधन और सेवाओं पर असर पड़ रहा है। जनता चाहती है कि हर हाल में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत में सुधार हो, लेकिन सरकार इसे सुधारने के बजाए निजीकरण करने पर जोर दे रही है, जिससे आम जनता में असंतोष फैल रहा है।
छात्र राजनीति पर प्रतिबंध का पड़ रहा असर
जिस जेन जी के दम पर सत्ता तक पहुँचे बालेन शाह, उन्होंने अपने 100 दिनों के एक्शन प्लान में सबसे पहले छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया। बालेन शाह ने साफ कहा कि शिक्षण संस्थान अब राजनीति के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान का केन्द्र होंगे यानी अब तक ‘राजनीति’ हो रही थी, वह गलत था।
छात्रों को दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर स्टूडेंट काउंसिल बना कर अपनी समस्याओं को रखने का मौका उन्होंने दिया। ‘स्टुडेंट काउंसिल’ या ‘वॉइस ऑफ स्टूडेंट’ जैसे गैर राजनीतिक संगठन विकसित किए जाने की बात उन्होंने कही। छात्रों को अपनी समस्या के समाधान के लिए सरकार की छात्रों के लिए बनाए गए संगठन में जाने का विकल्प दिया है। छात्रों के अंदर इसको लेकर भी असंतोष पैदा हो रहा है।
दरअसल नेपाल में बालेन शाह का चुनाव दक्षिण एशियाई राजनीति में एक बदलाव को दर्शाता है। Gen-Z की जबरदस्त भागीदारी से बनी सरकार से लोगों को स्वच्छ शासन, प्रशासनिक दक्षता और पारंपरिक राजनीतिक ढाँचों से पूरी तरह अलग व्यवस्था बनाने की उम्मीद थी। उन्होंने योग्यता, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे नारे बुलंद किए थे। पुरानी व्यवस्था की जगह एक जवाबदेह सिस्टम बनाने का विश्वास दिलाया था।
लेकिन एक महीने में ही जनता का विश्वास हिलने लगा है। Gen-Z आंदोलन की दीर्घकालिक सफलता केवल नेतृत्व पर ही नहीं, बल्कि नागरिकों की निरंतर भागीदारी पर भी निर्भर करती है। देश के नागरिक लोकतंत्र में केवल वोट ही नहीं देते बल्कि सरकार के कामकाज पर अपना फैसला भी वोट के माध्यम से बताते हैं।
नेपाल का सिस्टम अभी भी नहीं बदला है। नौकरशाही पुरानी है और कामकाज का तरीका भी उनका पुराना ही है। इसमें बदलाव जरूरी है। शासन केवल लोकप्रियता या अच्छे इरादों से ही नहीं चलता, यह उन संस्थागत ढाँचों को बदलने की क्षमता पर निर्भर करता है, जो समाज में गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुकी हैं।
बालेन शाह की असली परीक्षा अब शुरू हुई है। अगर प्रचंड जनादेश के बाद भी नेपाल की स्थिति नहीं बदलती है तो इसका परिणाम लोकतंत्र के लिए भी घातक हो सकता है। अभी तक लोकतंत्रिक बदलाव को जनता आशाभरी नजरों से देख रही है, वह शायद इसकी प्रभावशीलता पर ही सवाल उठाने लगे।
युवाओं का अगर मोहभंग हुआ, तो ये और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। नेपाल ने आंदोलन के दौरान हुई हिंसक वारदातों और बड़े पैमाने पर खून खराबा झेला है। अगर फिर युवा सड़कों पर उतरे तो लोकतंत्र के लिए ‘काला दिन’ साबित होगा क्योंकि अब लोकतंत्र ही उनके चपेट में आएगा।
भारत में विपक्ष को Gen-z आंदोलन का था इंतजार
भारत की विपक्षी पार्टियों को भी Gen-z आंदोलन काफी पसंद रहा था। राहुल गाँधी से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं ने जेन जी को भड़काना चाहा। उन्होंने पीएम मोदी के आवास तक में घुसने की अपील कर दी थी। सत्ता विरोधी लहर को नेपाल और बांग्लादेश की तरह भारत में आक्रमकता तक पहुँचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
‘संविधान बचाओ’ और ‘लोकतंत्र की रक्षा’ की बात कह जेन जी को अपनी राजनीतिक लड़ाई में शामिल करने की काफी कोशिश विपक्ष ने की, लेकिन सब बेकार हो गया। भारत में जेन जी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन रखते हैं। उन्हें वोट के जरिए अपनी आक्रमकता दर्शाने का मौका संविधान ने दे रखा है। वे इसका इस्तेमाल भी वोटर के तौर पर करते रहे हैं और विपक्ष को पटखनी देते रहे हैं।


