Wednesday, August 12, 2020
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प्रोपेगेंडा का Outlook: जब मोदी घृणा से कीबोर्ड तड़-तड़ाए तो पन्ने फड़-फड़ फड़फड़ाए

प्रोपेगेंडा, वो भी मोदी घृणा के चाशनी में डूबा हुआ। उत्तेजना ऐसी कि आप गहरी नींद से जाग उठें, दरवाजे पर खड़े क्रांति कुमार का इस्तकबाल करने के लिए। नशा ऐसा घुमड़-घुमड़ घुमड़े कि निगमबोध घाट तक दौड़ आएँ यह सोच कि धू-धू जलते राष्ट्रवाद, दक्षिणपंथ, मोदी, भाजपा, हिंदुत्व सब एक साथ दिख जाएँगे।

प्रोपेगेंडा। यानी, दुष्प्रचार। एक ही झूठ सौ बार बोलो। हजार बार बोलो। पहले से ज्यादा जोर से बोलो। लगातार बोलो। इतना चिल्लाओ की अंत में वह सच लगने लगे। यह वामपंथियों का पुराना और आजमाया हुआ हथियार है। लेकिन, आपने कभी सोचा है कि ये प्रोपेगेंडा होता कैसा है? देखने में कैसा लगता है? इसे पढ़कर और सुनकर कैसा महसूस होता है?

वक्त है प्रोपेगेंडा के ‘आउटलुक’ से साक्षात्कार का है। वो भी मोदी घृणा के चाशनी में डूबा हुआ। उत्तेजना ऐसी कि आप गहरी नींद से जाग उठें, दरवाजे पर खड़े क्रांति कुमार का इस्तकबाल करने के लिए। नशा ऐसा घुमड़-घुमड़ घुमड़े कि आप निगमबोध घाट तक दौड़ आएँ यह सोच कर कि धू-धू कर जलते राष्ट्रवाद, दक्षिणपंथ, मोदी, भाजपा, हिंदुत्व सब एक साथ दिख जाएँगे।

एक पत्रिका है आउटलुक। अंग्रेजी में साप्ताहिक तो हिंदी में पाक्षिक। हिंदी आउटलुक का टैग लाइन है ‘सच को समर्पित’। इसी ‘सच’ के दर्शन कराती है, आउटलुक हिंदी की ताजा कवर स्टोरी। कवर स्टोरी रिपोर्ताज कम, कहानी ज्यादा लगती है। प्रोपेगेंडा के परफेक्ट स्क्रिप्ट के माफिक। शब्दों के चुनाव पर करीने से ध्यान दिया गया है ताकि आप सुध-बुध खोकर राजपथ पर क्रांति को उतरते देखने के लिए पहुँच जाएँ।

कवर स्टोरी जेएनयू की हालिया हिंसा और सीएए तथा एनआरसी के विरोध पर आधारित है। आमुख कथा की हेडिंग है- युवा बोले हम देखेंगे। कहानी की शुरुआत इन शब्दों से होती है- नाराज नारों से सारा आकाश तड़-तड़ाने लगे, तो धरती भी धड़-धड़ धड़कने लगती है। देश का कोई भी कोना इन आवाजों से दूर शायद ही ढूँढ़ा जा सके- दिल्ली, मुंबई, बेगलूरू, चेन्नै, चंडीगढ़, अमृतसर, जयपुर, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, कोलकाता, गुवाहाटी… उँगलियों पर गिनती थम सकती है मगर इस फेहरिस्त का सिलसिला नहीं टूटता, न ही विश्वविद्यालयों और आला शिक्षा संस्‍थानों की सूची रुकती है।

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कीबोर्ड के तड़-तड़ाने से निकले शब्दों की बाजीगरी का नशा काफूर हो गया हो तो जरा गिनिए देश में कितने यूनिवर्सिटी हैं। नहीं गिन पा रहे तो केंद्रीय गृह​ मंत्री अमित शाह के हालिया बयान को स्मरण कर लीजिए। इसमें उन्होंने बताया है कि देश में 224 यूनिवर्सिटी हैं। इनमें से 3-4 यूनिवर्सिटी में सीएए को लेकर विरोध देखा गया है। ये कौन से यूनिवर्सिटी हैं? इनकी व्याख्या आउटलुक अपनी कहानी में कुछ यूँ करता है- यह कोई कोरी कल्पना भी नहीं, बल्कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंसक घटनाक्रम तो जैसे इसकी गवाही दे रहे हैं। कवर स्टोरी की आमुख और अन्य कहानियों में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं किया गया है कि देश के अन्य यूनिवर्सिटी क्यों इससे दूर हैं? यह भी नहीं बताया गया है कि इसी दिल्ली में दिल्ली यूनिवर्सिटी, इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी और आंबेडकर यूनिवर्सिटी भी हैं, जहाँ कोई शोर-शराबा नहीं है। लेकिन, आउटलुक जैसे वामपंथी विषबेल जिनका खालिस एजेंडा प्रोपेगेंडा रचना ही है, वे शायद ही इनकी गिनती यूनिवर्सिटी में करते हों। इनके लिए सेंट स्टीफंस के 50 छात्रों का विरोध ही दिल्ली यूनिवर्सिटी है, क्योंकि ये इनके एजेंडा को सूट करता है। इन्हें सीएए के समर्थन में देश के अलग-अलग शहरों में रोज निकल रही विशाल रैलियाँ नहीं दिखतीं।

अपने प्रोपेगेंडा का तानाबाना बुनने के लिए आउटलुक आगे लिखता है- ऐसे नजारे देश ही नहीं, कई ताकतवर देशों में भी इतिहास बना चुके हैं। सत्तर के दशक के कई महादेशों में फैले छात्र आंदोलनों को ही नहीं, अपने देश में गुजरात के नव-निर्माण आंदोलन की रोशनी में शुरू हुए बिहार छात्र आंदोलन और फिर जेपी आंदोलन की यादें बरबस ताजा हो उठती हैं। फर्क सिर्फ यह है कि उस वक्त चिंगारी फीस और मेस शुल्क में हुई वृद्धि से भड़की थी। इस समय इसके अलावा ‘भारत के बुनियादी विचार’ और संविधान बचाने की टेक भी इससे जुड़ गई है। जाहिर है, इसकी भी वजहें बेबुनियाद नहीं हैं।

यकीनन, ऐसा लिखने की वजह बेबुनियाद नहीं है। विरोध के नाम पर जिस तरह हिंसा के लिए, पुलिस को निशाना बनाने के लिए कॉन्ग्रेस और वामपंथियों ने मुसलमानों को उकसाया, उसी तरह ये मीडिया संस्थान शब्दों से उन्हें उकसाने का काम कर रहे। उनके मन में डर को गहरा करने के संविधान और बुनियादी विचार जैसे शब्द पहले शब्दकोष से तराश निकाला गया और फिर कहानी में ठूँसा गया। साथ ही यह सुखद एहसास भी कराया गया है कि तुम लगे रहो इस बार तो मोदी का बोरिया-बिस्तर बँधना ही है।

कवर स्टोरी में आगे लिखा गया है- इसमें नया तत्व तो सिर्फ नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के मुद्दों ने जोड़ा है। शिक्षा संस्‍थानों में तो मौजूदा सरकार के पिछले कार्यकाल से ही शोले भड़कने शुरू हो गए थे। जेएनयू में मौजूदा दौर में ही नकाबपोश नहीं उतरे, 2016 में भी नकाबपोशों की वजह से “टुकड़े-टुकड़े गैंग” और “राष्ट्रविरोध” का विमर्श खड़ा हो गया था, मगर नकाबपोशों को आज तक दिल्ली पुलिस नहीं ढूँढ़ पाई।

लेकिन, बड़ी चालाकी से यह बात छिपा ली गई है कि 2016 के जेएनयू के जिस घटनाक्रम का जिक्र किया गया है उसकी फाइल पर दिल्ली की आप सरकार कुंडली जमाए बैठी है। वह कन्हैया कुमार और उसके साथियों के खिलाफ अभियोग चलाने की इजाजत दिल्ली पुलिस को नहीं दे रही है। आगे रोहित वेमुला की खुदकुशी, IIT, IIM के छिटपुट प्रदर्शनों, आर्थिक बदहाली, बेरोजगारी का हवाला देकर यह बताया गया है कि गुस्सा लंबे समय से घुमड़ रहा था। इसकी आड़ में हिंसक घटनाक्रमों को जायज ठहराने की कोशिश भी की गई है।

अब कवर स्टोरी की अन्य कहानियों की हेडलाइन पर गौर करिए;

इन कहानियों को जब आप पढ़ेंगे तो आउटलुक का एकपक्षीय नजरिया समझते देर नहीं लगेगी। कहानियों को कुछ यूँ पिरोया गया है कि आप मान लें कि जेएनयू हिंसा के लिए एबीवीपी कसूरवार है। उन वायरल वीडियो का जिक्र विस्तार से नहीं किया गया है, जिसमें वामपंथी खेमे के छात्र पत्थरबाजी करते और छात्र संघ की अध्यक्ष उनको रास्ता दिखाते नजर आती है। सहूलियत से यह कहकर उन वीडियो से कन्नी काट ली गई है कि आउटलुक इनकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता। पत्रकारीय संतुलन बनाने के लिए एबीवीपी के एक नेता का दो लाइन का कोट भी डाला गया है। यह भी दावा किया गया है- यह भी अपशकुनी संयोग जैसा है कि महज 20 दिनों के भीतर ही देश के तीन विश्वविद्यालयों में हिंसा का जैसा तांडव हुआ है, उसकी कोई मिसाल इसके पहले बमुश्किल ही ढूँढ़े मिलेगी। शायद, इस कहानी को गढ़ने वाले रिपोर्टर ने अपने प्रतिद्वंद्वी संस्थान इंडिया टुडे की वो रिपोर्ट नहीं पढ़ी होगी, जो आउटलुक के पैदा होने से बरसों पहले लिखी गई थी।

करीब 40 साल पुरानी इंडिया टुडे की उस रिपोर्ट में बताया गया है कि अपनी स्थापना के कुछ सालों के भीतर ही जेएनयू अकादमिक कुचक्र, वैचारिक कलह और छात्रों की अराजकता का गढ़ बन गया था। इसके लिए वामपंथी बुद्धिजीवियों को जिम्मेदार ठहराया गया है। यह रिपोर्ट इंदिरा गाँधी द्वारा जेएनयू में 46 दिनों तक की गई तालाबंदी के बाद की गई थी।

आउटलुक का प्रोपेगेंडा उसके संपादक के कॉलम ‘आजकल’ में और गाढ़ा हो जाता है। अवाक, स्तब्ध, क्षुब्ध!! संपादक कहते हैं कि जेएनयू के वीसी पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं। उनका यह भी दावा है- जेएनयू में हिंसा का स्वतःस्फूर्त विरोध भी पूरे देश में जारी है। इसमें छात्र ही नहीं, कलाकार और प्रबुद्ध नागरिक भी शामिल हैं। राजनैतिक दल अपनी प्रतिक्रिया अपने तरीके से दे रहे हैं।

संपादक भी सीएए समर्थक बहुसंख्यकों का जिक्र करना जरूरी नहीं समझते। उन कलाकार और प्रबुद्ध नागरिकों का कोई उल्लेख नहीं करते जो प्रोपेगेंडा के खिलाफ खड़े हैं। लेख में यह तो कहा गया है कि राजनैतिक दल अपने तरीके से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, पर यह नहीं बताया गया है कि दिल्ली से लेकर तमाम राज्यों में हिंसा में विपक्षी दल के नेता, वामपंथी और एक समुदाय विशेष के लोग नामजद तक हुए हैं।

वैसे, मोदी और बीजेपी से आउटलुक की घृणा नई नहीं है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में बीजेपी विधायकों की क्रॉस वोटिंग को वह कमलनाथ का मास्टरस्ट्रोक बताती है। लेकिन, गोवा में जब कॉन्ग्रेस विधायक पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो जाते हैं तो वह लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देने लगती है। इसे जनता के साथ धोखा बताती है, यह कहते हुए कि ये लोग चुनाव कॉन्ग्रेस के निशान और एजेंडे पर जीते थे। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के प्रेस कॉन्फ्रेंस पर लहोलोहाट होने वाला यह मीडिया संस्थान अयोध्या पर शीर्ष अदालत के फैसले को हैरान करने वाला बताता है।

मोदी से इस संस्थान की घृणा का अंदाजा आम चुनावों से पहले इसकी कवर स्टोरीज को देखकर भी लगाया जा सकता है। मोदी के अंध विरोध में यह संस्थान प्रोपेगेंडा रचने के लिए जमीनी हकीकतों और जनता की आवाज को अनसुना कर देता है। नतीजतन, पाठकों का सच से कोई सारोकार नहीं रह पाता। आम चुनावों के नतीजों से ऐन पहले भी यह संस्थान क्षेत्रीय क्षत्रपों के भरोसे राहुल गाँधी पर दाँव लगा रहा होता है। उससे पहले आउटलुक हिंदी के 22 अप्रैल 2019 संस्करण के कवर पेज की हेडिंग है- नई सियासत सूत्र और सूरमा। कवर पर जिन नेताओं की तस्वीर है, उसमें जयंत चौधरी भी हैं। कुछ जिलों की एक पुश्तैनी पार्टी जो हर दिन सिकुड़ती जा रही है, के नेता में किंगमेकर की छवि देखने की दो ही वजहें हो सकती है। पहला- उस नेता के साथ उस संस्थान या उसके नुमाइंदे की निजी हितें जुड़ी हों। दूसरा- संस्थान प्रोपेगेंडा का ऐसा बादल घुमड़-घुमड़ घुमड़ाना चाहता हो, जिससे पाठक को भी सावन के अंधे की तरह सब कुछ हरा-हरा ही दिखे। फिर एक दिन इसी बहकावे में आकर कोई सुलेमान कट्टा लेकर प्रदर्शन करने निकलेगा और किसी कॉन्सटेबल मोहित के पेट में गोली मार देगा।

आउटलुक जैसे संस्थान सुलेमान की कतार खड़ी करना चाहते हैं। क्यूँकि इससे उनके राष्ट्रवाद और हिंदुत्व विरोधी प्रोपेगेंडा को टिम-टिम टिमाने के लिए ईंधन मिलता है। लेकिन, इस प्रोपेगेंडा के असर क्या होंगे, यह गर्भ में नहीं है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक लोग इनके प्रोपेगेंडा का गुर्दा छील रहे हैं। छीलते रहेंगे। छीलने की रफ्तार जब चरम पर पहुँचेगी तो धुक-धुक धुका रहे इन संस्थानों की फड़-फड़ फड़ाहट खुद-ब-खुद दफन हो जाएगी। हम यह देखेंगे। मैथिली में कहें तो;

हमहूँ देखबै!
देखबे करबै!

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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