Saturday, July 4, 2020
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शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ ने बताए गुर, मोदी विरोधियों ने किया अमल: हाल के 5 मामले जब फेक न्यूज को दी गई हवा

यह छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि शेखर गुप्ता के 'द प्रिंट' की सलाह से भी काफी समय पहले से ही भाजपा के खिलाफ एक सुनियोजित तरीके से वामपंथी, उदारवादियों और विरोधी दलों, खासकर कॉन्ग्रेस ने फेक नैरेटिव, प्रोपेगेंडा और फर्जी खबरों, जो कि मूल रूप से प्रायोजित अफवाहें ही हुआ करती हैं, का जिहाद छेड़ रखा है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

शेखर गुप्ता ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रोपेगेंडा मीडिया पोर्टल ‘द प्रिंट’ के संस्थापक भी है। कुछ दिनों पहले ‘द प्रिंट’ ने एक लेख के जरिए विपक्ष को यह ज्ञान दिया था, नरेंद्र मोदी को हराने के लिए वह फेक न्यूज कैसे फैलाए।

द प्रिंट के लिए यह लेख शिवम विज ने लिखा था। विज वही पत्रकार हैं, जिन्होंने एक समय कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को ह्वाइटवॉश करने की कोशिश की थी। फेक न्यूज को लेकर लेख में अपनी बातों को सही ठहराने के लिए द प्रिंट ने अमेरिकी थिंक-टैंक रैंड कॉर्पोरेशन के लिए लिखे गए क्रिस्टोफर पॉल और मिरियम मैथ्यूज के एक लेख का हवाला दिया है।

‘द प्रिंट’ ने इसमें दावा किया था कि फर्जी खबरों से तैयार किए गए नैरेटिव विपक्षी पार्टियों को विशेष लाभ दे रहे हैं और ऐसे नेरेटिव्स को दुसरे फर्जी नैरेटिव से काटा जाना चाहिए। यह एक प्रकार से ‘लोहे को लोहे से काटने’ जैसी कहावत की ही एक परिकल्पना थी, जिसे ‘द प्रिंट’ ने राजनीतिक विचारों के साथ स्थान दिया।

यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि भारत में शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ की इस सलाह से भी काफी समय पहले से ही सत्ताधारी दल भाजपा के खिलाफ एक सुनियोजित तरीके से वामपंथी, उदारवादियों और विरोधी दलों, खासकर कॉन्ग्रेस ने फेक नैरेटिव, प्रोपेगेंडा और फर्जी खबरों, जो कि मूल रूप से प्रायोजित अफवाहें ही हुआ करती हैं, का जिहाद छेड़ रखा है।

ऐसी ही पाँच वो घटनाएँ, जिन्हें फैलाकर शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ की सलाह के अनुसार ही देश के विपक्षी दलों और वाम-उदारवादियों ने फर्जी खबरों का जमकर आतंक मचाया –

1 – ‘नए इंडिया का सच’ बताने वाले झूठे रणदीप सुरजेवाला

‘द प्रिंट’ द्वारा दी गई सत्य से आँख मोड़कर फर्जी नैरेटिव की सलाह को कॉन्ग्रेस ने ऐसे लपका जैसे मामा शकुनी की सलाह को दुर्योधन फ़ौरन लपक लेता था। इसमें पहला योगदान कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने दिया और एक नेपाली महिला की ‘मार्मिक’ तस्वीर को ट्वीट किया।

‘न्यू इंडिया का सच!’ कैप्शन के साथ सुरजेवाला ने 18 मई को रात के 11 बजकर 38 मिनट पर ये तस्वीर पोस्ट की थी। कुछ देर बाद ही बिना कोई कारण बताए डिलीट भी कर दिया, लेकिन तब तक यह बड़े स्तर पर शेयर की जा चुकी थी।

इस तस्वीर की सच्चाई यह थी कि यह जुलाई 03, 2012 को नेपालगंज में नरेंद्र श्रेष्ठा नाम के फोटोग्राफर ने यूरोपियन प्रेस फोटो एजेंसी (EPA) के लिए खींची थी।

यह तस्वीर एक नेपाली माँ की थी, जिसने अपनी पीठ पर अपने बच्चे को बाँध रखा था। साथ ही यह तस्वीर भारत की नहीं, बल्कि काठमांडू से करीब 573 किलोमीटर दूर स्थित नेपालगंज की ओर साइकल चलाकर जा रही महिला की थी। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि पहाड़ी रास्ते होने के कारण नेपालगंज में साइकल ही आने-जाने का मुख्य साधन मना जाता है।

2 – बसों की जगह ऑटो-रिक्शा-एम्बुलेंस

उत्तर प्रदेश में कथित तौर पर कॉन्ग्रेस पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी द्वारा भेजी गईं बसों की सच्चाई शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ से निकला हुआ ‘टार’ का ही एक उदाहरण माना जा सकता है। कारण यह कि शेखर गुप्ता के प्रोपेगेंडा पोर्टल में प्रकाशित लेख में अच्छी तरह से कहा गया है कि विपक्षी दलों को झूठे नैरेटिव का सहारा लेना चाहिए।

कॉन्ग्रेस का दावा है कि उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर बड़ी संख्या में बसें योगी सरकार की अनुमति का इंतजार कर रही हैं। अब ख़बर आई है कि इन बसों के ड्राइवरों ने कॉन्ग्रेस पार्टी के ख़िलाफ़ नारेबाजी की है। कहा जा रहा है कि इन ड्राइवरों को ठीक से खाना नहीं खिलाया जा रहा था, जिस कारण उन्होंने विरोध-प्रदर्शन किया।

इससे पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ने यूपी सरकार को 1000 बसों की सूची सौंपने का दावा किया था। वो अलग बात है कि इनमें से 297 गाड़ियों में कोई न कोई गड़बड़ी है। 79 की फिटनेस नहीं है, 140 का बीमा समाप्त हो चुका है और 78 ऐसी हैं, जिनमें ये दोनों ही ख़त्म हो चुका है।

प्रियंका गाँधी द्वारा भेजे गए बसों की सूची में से 31 ऑटो थे, 69 एंबुलेंस, ट्रक या फिर अन्य वाहन थे। इसके साथ ही 70 ऐसे वाहनों की लिस्ट दी गई थी, जिसका कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं था।

3 – मार्मिक वीडियो: कॉन्ग्रेस ने कार्यालयों को रसोई बना दिया

गत 18 मई को ही ट्विटर पर कोरोना वायरस के कारण जारी लॉकडाउन का ‘मार्मिक चित्रण’ करने के सदियों पुराने और घिसे-पिटे वामपंथी नैरेटिव का इस्तेमाल करते हुए एक वीडियो शेयर किया। इसके साथ संदेश था –

“फर्क- मानवता का है। भाजपा ने कोरोना संकट के दौरान खाने के लिए तरसते गरीब देशवासियों से मुँह मोड़ लिया, जबकि कॉन्ग्रेस ने संकट की इस घड़ी में देशवासियों के लिए अपने कार्यालयों को ‘रसोई’ बना दिया।”

लेकिन कॉन्ग्रेस का यह फर्जी वीडियो भी जल्दी ही फैक्टचेक कर लिया गया, वो भी सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा। वही यूजर्स जो चुनावों के समय मतदान करते हैं। वही यूजर्स जिनके लिए कॉन्ग्रेस आरोप लगाती है कि वह वोट तो उसके लिए डालते हैं लेकिन बटन भाजपा का दब जाता है।

कॉन्ग्रेस ने जो वीडियो शेयर किया, उसमें से जिस वीडियो में कॉन्ग्रेस ने भाजपा पर निशाना साधा था, वह अगस्त 2019 का वीडियो निकला।

इस वीडियो को YouTube चैनल OMG के पेज 2 पर पिछले साल 21 अगस्त को एक कैप्शन के साथ अपलोड किया गया था – ‘कृपया अपना भोजन बर्बाद न करें।’ वीडियो में 0.21 सेकंड पर, एक व्यक्ति रेल की पटरियों पर बचे हुए लोगों के बीच भोजन के लिए छानबीन करता हुआ देखा जा रहा था।

यह आजकल शेयर करने के पीछे कॉन्ग्रेस का मकसद यह साबित करना था कि यह वीडियो लॉकडाउन के बीच का है, जहाँ इस दौर में कॉन्ग्रेस गरीबों की मसीहा बनी हुई है तो वहीं भाजपा देश के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए कुछ नहीं कर रही है, जिस कारण गरीबों को इस तरह के हालातों का सामना करना पड़ रहा है।

4 – प्रियंका की शान में NDTV मैदान में

NDTV के पत्रकार उमाशंकर सिंह ने अपने ट्विटर हैंडल से एक फोटो शेयर करते हुए लिखा, ‘बढ़िया खबर, यूपी सरकार ने कॉन्ग्रेस की तरफ़ से भेजी गई बसों को चलाने की इजाज़त दे दी है।”

लेकिन दुर्भाग्यवश जिस फोटो को NDTV के पत्रकार उमाशंकर सिंह ने पोस्ट किया था वह फोटो प्रयागराज में पिछले वर्ष लगे कुंभ मेले में फरवरी 28, 2019 की निकली, जहाँ विश्व की सबसे लंबी बस परेड का वर्ल्ड रेकॉर्ड बनाया गया।

तब कुंभ मेले के आयोजन के बीच उत्तर प्रदेश परिवहन निगम और प्रयागराज मेला प्राधिकरण की ओर से कुंभ की 503 शटल बसों को शहर के एक 3.2 किमी लंबे रूट पर एक साथ संचालित कराया गया था।

लेकिन कॉन्ग्रेस की शान में नेहरू के नमक के कर्ज में डूबे NDTV का तो प्रोपेगेंडा ही एकमात्र लक्ष्य तब से है, जब शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ ने फर्जी नैरेटिव के जरिए विपक्ष को बढ़त बनाने की सलाह भी नहीं दी थी।

5 -‘द हिंदू’ तथ्यात्मक रूप से फर्जी रिपोर्ट

मई 16, 2020 को, वामपंथी मीडिया संगठन, ‘द हिंदू’ ने, ‘उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुए दंगे और न्याय का सवाल’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें यह दावा किया गया था कि दिल्ली में दंगा पीड़ितों के प्रति दिल्ली पुलिस पूर्वाग्रही थी।

‘द हिन्दू’ की इस रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली पुलिस, विशेष रूप से दिल्ली दंगों से संबंधित मामलों में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में पक्षपाती थी। रिपोर्ट ने उत्तर-पूर्व के दंगों के मामलों में पुलिस को न्याय करने में दुर्भावना का परिचय देते हुए इन दंगों को पूर्व निर्धारित साजिश के रूप में पेश करने का प्रयास किया।

दिल्ली के दंगों के मुस्लिम पीड़ितों, जो कुल 53 में से 38 थे, का हवाला देते हुए अपने लेख में कहा है कि दिल्ली पुलिस सीएए के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, क्योंकि वे मुसलमान हैं।

दिल्ली पुलिस पर सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने हिंदू हमलावरों को छोड़ दिया, जबकि वे मुसलमानों के खिलाफ विशेष रूप से कठोर हो गए हैं, जिसमें ‘मुस्लिमों की अवैध गिरफ्तारी’ भी शामिल है और यह भी कहा गया कि पुलिस ने एफआईआर रिपोर्ट दर्ज करने में मुसलमानों के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया।

हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने तुरंत इस लेख को बेबुनियाद और सांप्रदायिकता से पूर्ण कहते हुए फटकार लगाई। लेख को वाहियात बताते हुए, दिल्ली पुलिस ने एक आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि जिस PUDR रिपोर्ट के आधार पर यह लेख लिखा गया है, उसने सिर्फ चुनिंदा एफ़आईआर को ही शामिल किया है, ताकि दिल्ली पुलिस को एक समुदाय विशेष के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रस्त साबित किया जा सके।

बयान में पुलिस ने सपष्ट किया कि दिल्ली दंगों के मामलों में दिल्ली पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी वैज्ञानिक और तकनीकी सबूतों के आधार पर ही आधारित थी।

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