खुद को ‘ज्ञान का भंडार’ बताने वाला विकिपीडिया, हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ को लेकर एक खास तरह की इमेज बनाने में जुटा है। वह बार-बार इन फिल्मों को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) साबित करने की कोशिश कर रहा है। रणवीर सिंह की इन फिल्मों के चर्चा वाले पेज (टॉक पेज) को देखने से पता चलता है कि कुछ संपादक जानबूझकर लेख में राजनीति से जुड़े शब्द डाल रहे हैं।
वहीं, कुछ दूसरे संपादकों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि जानकारी को अपनी पसंद से चुन-चुनकर (चेरी-पिकिंग) एकतरफा कहानी थोपी जा रही है। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि फिल्म को बुरा बताने के लिए यूट्यूबर ध्रुव राठी की बातों को एक ‘पक्के सबूत’ की तरह इस्तेमाल किया गया है। इससे विकिपीडिया के काम करने के तरीके पर बड़े सवाल खड़े होते हैं। विवाद इतना बढ़ गया है कि फिलहाल इन पेजों पर कोई बदलाव न हो सके, इसलिए इन्हें ‘लॉक’ कर दिया गया है।
विकिपीडिया पर ‘प्रोपेगेंडा’ नैरेटिव की साजिश
विकिपीडिया पर फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) बताने का फैसला सबकी मर्जी से नहीं लिया गया था। असल में, यह एक बहुत बड़ा विवाद था जिसका कई संपादकों ने जमकर विरोध किया। फिल्म के चर्चा वाले पेज (टॉक पेज) को देखकर साफ पता चलता है कि कैसे एक तरफा कहानी थोपने की कोशिश को रोकने की पूरी कोशिश की गई थी। [आर्काइव लिंक 1] [आर्काइव लिंक 2]
एक संपादक ‘KabirDH’ ने तो इस पक्षपात की पोल ही खोल दी। उन्होंने साफ कहा कि भले ही फिल्म का कुछ हिस्सा किसी पार्टी के पक्ष में लग सकता है, लेकिन इसे गलत साबित करने के लिए जो ‘सबूत’ (Sources) दिए जा रहे हैं, वे नफरत और पक्षपात से भरे हैं। उन्होंने इन सबूतों पर सवाल उठाते हुए कहा, “यह साफ दिख रहा है कि ये बातें एक ऐसी वेबसाइट या व्यक्ति (जैसे कलकत्ता टेलीग्राफ) की ओर से आ रही हैं जो एक खास पार्टी का समर्थक है और दूसरी पार्टी का विरोधी, और वह बस अपने निजी विचारों को फैला रहा है।”

यह मामला सिर्फ भेदभाव तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यहाँ विकिपीडिया के अपने नियमों की भी धज्जियाँ उड़ाई गईं। संपादक ‘KabirDH’ ने साफ चेतावनी देते हुए कहा, “सिर्फ एक ही खबर या सोर्स के भरोसे पूरी फिल्म की कैटेगरी बदल देना और शुरुआत में ही उसे ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ लिख देना विकिपीडिया के ही कायदे-कानूनों (जैसे WP:NPOV, WP:DUE और WP:OR) के खिलाफ है।” उनका कहना था कि बिना ठोस आधार के इतना बड़ा दावा करना नियमों का पूरी तरह उल्लंघन है।

एक और संपादक, UnpetitproleX ने भी इस बात को पूरी तरह गलत बताया कि भरोसेमंद खबरों ने फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) मान लिया है। उन्होंने साफ किया, “सच्चाई तो यह है कि ‘द इंडिपेंडेंट’ (The Independent) जैसे बड़े अखबार ने अपनी रिपोर्ट में कहीं भी इस फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ नहीं कहा है।”
उन्होंने दोनों पक्षों की बात रखने पर जोर देते हुए कहा, “हमारे पास ऐसी ढेर सारी खबरें और सबूत मौजूद हैं जो इस फिल्म को प्रोपेगेंडा नहीं मानते… हम उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते। विकिपीडिया के नियमों (WP:DUE weight) के मुताबिक, किसी भी नतीजे पर पहुँचने के लिए हमें सभी तरह की भरोसेमंद खबरों को ध्यान में रखना होगा, न कि सिर्फ अपनी पसंद की।”

विवाद की गहराई समझाते हुए UnpetitproleX ने आगे कहा, “मुद्दा यह है कि फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ कहने पर पहले से ही झगड़ा चल रहा है। ऐसे में विकिपीडिया का अपनी तरफ से इसे एक ‘सच’ (Fact) की तरह लिखना, इस विवाद में किसी एक पक्ष का साथ देने जैसा होगा। जबकि विकिपीडिया का नियम (निष्पक्षता नीति) हमें साफ तौर पर कहता है कि ‘हमें विवाद के बारे में बताना चाहिए, न कि खुद उस विवाद का हिस्सा बनना चाहिए।'”

फिल्म पर बार-बार ‘प्रोपेगेंडा’ का ठप्पा लगाने की कोशिशों से दूसरे संपादक काफी नाराज थे। संपादक KabirDH ने तंज कसते हुए कहा, “बिना किसी आपसी सहमति के फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ बताया जा रहा है। अब यह सब देखकर बहुत निराशा होती है।”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संपादकों के बीच कोई एक राय नहीं बनी है। उन्होंने आगे कहा, “जब सब एक बात पर सहमत नहीं हैं, तो लेख की पहली ही लाइन में ‘प्रोपेगेंडा’ शब्द जोड़ देना विकिपीडिया के नियमों और पुरानी परंपराओं का सीधा उल्लंघन है।”

खबरों और सबूतों के सही होने पर भी बड़े सवाल उठाए गए। संपादक ARandomName123 ने साफ तौर पर कहा, “‘ग्रैंड पिनेकल ट्रिब्यून’ की खबरें AI (कंप्यूटर प्रोग्राम) द्वारा लिखी गई हैं। विकिपीडिया के नियमों के मुताबिक, ऐसी खबरों को भरोसेमंद सबूत नहीं माना जा सकता।”

कुल मिलाकर, इस पूरी बहस से यह साफ है कि फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ (प्रचार वाली फिल्म) कहना कोई पक्का सच नहीं था, बल्कि एक विवादित दावा था। कई संपादकों ने इस बात का जमकर विरोध किया। उन्होंने साफ कहा कि यह भेदभाव है, खबरों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और विकिपीडिया के निष्पक्ष होने के नियमों को तोड़ा जा रहा है।
धुरंधर केस: विवादों के केंद्र में कौटिल्य3
बिल्कुल यही खेल फिल्म के पहले भाग में भी खेला गया था। फिल्म ‘धुरंधर’ के पुराने चर्चा वाले पेजों (Talk Pages) से साफ है कि इसे ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की साजिश बहुत पहले ही शुरू कर दी गई थी। इस पूरी कहानी को गढ़ने और हवा देने में विवादित संपादक ‘कौटिल्य3’ का सबसे बड़ा हाथ था। [Archive Link 1] [Archive Link 2]
फिल्म के पहले भाग पर चर्चा के दौरान, कौटिल्य3 ने सिर्फ आलोचकों की बातों का ही सहारा नहीं लिया, बल्कि फिल्म के मतलब को अपनी निजी सोच के हिसाब से पेश किया। उन्होंने एक कड़वी टिप्पणी करते हुए लिखा कि यह फिल्म सीधे तौर पर मोदी सरकार की आतंकवाद-विरोधी नीतियों का प्रचार (प्रोपेगेंडा) करती है।

उन्होंने इसे किसी और की राय बताकर पेश नहीं किया, बल्कि फिल्म को देखने के अपने निजी नजरिए और चुनिंदा स्रोतों के आधार पर खुद एक नतीजा निकाल लिया। अपनी बात को और विस्तार से समझाते हुए, उन्होंने ‘प्रोपेगेंडा’ शब्द के इस्तेमाल को सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया, “प्रोपेगेंडा का मतलब है… ‘ऐसी जानकारी, जो विशेष रूप से पक्षपाती या भ्रामक हो और जिसका इस्तेमाल किसी खास मकसद को बढ़ावा देने के लिए किया जाए…’… और इस मामले में, हमारे पास [सोर्स] मौजूद हैं।”

एक अन्य टिप्पणी में, उन्होंने अपने इरादे और भी साफ कर दिए। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ दावा किया, “मेरा टेक्स्ट… यह कहता है कि यह फिल्म मोदी सरकार की नीतियों का ‘प्रचार’ (प्रोपेगेंडा) करती है। और यह एक सच्चाई है कि यह ऐसा करती भी है।”

इस तरह के बयान साफ तौर पर दिखाते हैं कि कैसे केवल आलोचना को रिपोर्ट करने के बजाय, एक खास विचारधारा वाली व्याख्या को ‘तथ्य’ (Fact) बनाकर पेश करने की कोशिश की गई। इस रवैये को कई अन्य संपादकों ने तुरंत चुनौती भी दी।
बाकी योगदानकर्ताओं ने इस नैरेटिव की बड़ी खामियों को उजागर किया। एक संपादक ने टाइमलाइन (समय-सीमा) पर ही सीधा सवाल उठाते हुए पूछा, “यह फिल्म मोदी सरकार का प्रचार कैसे कर सकती है, जबकि 2008-09 में तो वह सत्ता में थे ही नहीं?”

एक अन्य संपादक ने स्रोतों के चयन में असंतुलन और नैरेटिव गढ़ने के तरीके पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया, “विशेष रूप से 3-4 चुनिंदा स्रोतों का ही हवाला दिया जा रहा है… आपने बिना किसी चर्चा के सचमुच एक पूरा निबंध लिख डाला है, जैसे कि आप जानबूझकर इस पेज को नकारात्मक रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हों।”

विवाद केवल बयानों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि ‘तथ्यात्मक सटीकता और राजनीतिक संदेश’ (Factual accuracy and political messaging) नाम से एक पूरा सेक्शन बनाने पर भी बार-बार आपत्तियाँ जताई गईं। कई संपादकों का मानना था कि यह सेक्शन जानबूझकर कुछ गिने-चुने आलोचनात्मक नजरियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए बनाया गया था। एक संपादक ने तो स्पष्ट माँग की, “‘प्रोपेगेंडा’ शब्द को हटाओ और ‘तथ्यात्मक सटीकता और राजनीतिक संदेश’ वाले इस निबंधनुमा सब-हेडर को भी खत्म करो।”
यह विरोध केवल कंटेंट तक सीमित नहीं था, बल्कि संपादक के व्यवहार पर भी सवाल उठे। कौटिल्य3 पर आरोप लगा कि वे अन्य संपादकों के सुधारों को बार-बार हटा रहे थे (Reverting edits) और विरोध के बावजूद अपना ही नैरेटिव थोप रहे थे। एक संपादक ने तीखी टिप्पणी की, “उन्होंने बिना किसी चर्चा के अकेले ही सब कुछ लिख डाला और पेज पर किसी दूसरे को कुछ भी नहीं करने दे रहे हैं।”
एक अन्य संपादक ने उन पर अपनी पसंद की जानकारी चुनकर (Cherry-picking) एक खास नजरिया थोपने का आरोप लगाया और कहा कि वे ‘चुनिंदा सोर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और अनुचित तरीके से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं।’
इन तमाम आपत्तियों के बावजूद, कौटिल्य3 ने विकिपीडिया की नीतियों ‘विशेष रूप से विश्वसनीय स्रोतों और तटस्थता (Neutrality) से जुड़े नियमों’ का हवाला देते हुए लगातार अपने रवैये का बचाव किया। एक जवाब में उन्होंने कहा, “विकिपीडिया पर चर्चाएँ व्यक्तिगत विचारों के आधार पर नहीं, बल्कि WP:V (सत्यापन योग्यता) और WP:NPOV (तटस्थ दृष्टिकोण) के आधार पर चलती हैं।”
हालाँकि, अन्य संपादकों ने तर्क दिया कि इसी ढाँचे (Framework) का इस्तेमाल ‘चुनिंदा’ तरीके से किया जा रहा था, ताकि कुछ खास विचारों को हावी होने दिया जाए और बाकी को ‘अविश्वसनीय’ या ‘अप्रासंगिक’ बताकर खारिज कर दिया जाए।
इस चर्चा से यह भी उजागर हुआ कि कैसे अप्रत्यक्ष स्रोतों के जरिए विवादित रायों को ऊपर उठाया जा रहा था। एक बार फिर ध्रुव राठी की आलोचना का संदर्भ सामने आया, जिस पर कई संपादकों ने सवाल उठाया कि उनके विचारों को इतनी अहमियत क्यों दी जा रही है। एक संपादक ने सीधे तौर पर पूछा, “ध्रुव राठी की राजनीतिक बयानबाजी एक स्पष्ट सोर्स कैसे हो सकती है?”

एक अन्य संपादक ने तंज कसते हुए कहा, “आपने फिल्म ‘धुरंधर’ पर ध्रुव राठी की राय को बतौर सबूत पेश किया है…वाह!”

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ अन्य संपादक ध्रुव राठी के विचारों पर सवाल उठा रहे थे, वहीं कौटिल्य3 ने उन्हें एक ‘उल्लेखनीय सोर्स’ (Notable Source) करार दिया।

फिर भी, जैसा कि इसके सीक्वल (दूसरे भाग) की चर्चा में भी देखा गया, एक बार जब इन व्यक्तिगत रायों को मीडिया आउटलेट्स द्वारा रिपोर्ट कर दिया गया, तो उन्हें विकिपीडिया के ‘सोर्सिंग’ नियमों के तहत वैध बताकर उनका बचाव किया गया।
फिल्म के पहले भाग के ‘टॉक पेज’ से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि ‘धुरंधर’ को ‘प्रोपेगेंडा’ के रूप में पेश करने की कोशिश कोई आपसी सहमति का नतीजा नहीं थी। इसके बजाय, यह एक सोची-समझी संपादकीय जिद, तथ्यों की चुनिंदा व्याख्या और कुछ गिने-चुने सोर्स पर बार-बार निर्भरता का परिणाम था।
वही तर्क, वही विरोध और विवाद का वही पुराना पैटर्न बाद में फिल्म के सीक्वल (दूसरे भाग) की चर्चाओं में भी फिर से दिखाई दिया। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि एक खास दिशा में नैरेटिव गढ़ने की कोशिशें लगातार जारी थीं।
गौरतलब है कि उदय रेड्डी, जो ब्रिटेन (UK) स्थित विकिपीडिया संपादक कौटिल्य3 है, उनपर 2024 में मणिपुर पुलिस द्वारा मामला दर्ज किया गया था। उन पर मणिपुर में समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और ‘मैतेई’ समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप है।
ऑपइंडिया का खुलासा: विकिपीडिया का पक्षपात और ‘धुरंधर’ कनेक्शन
विकिपीडिया के पक्षपात पर ऑपइंडिया (OpIndia) की रिपोर्ट (डोजियर) ने पहले ही यह साफ कर दिया था कि यह तथाकथित ‘विश्वकोश’ केवल जानकारी दर्ज नहीं कर रहा, बल्कि संपादकों के एक नेटवर्क, चुनिंदा सोर्स और ‘पॉलिसी’ की आड़ में जानबूझकर नैरेटिव गढ़ रहा है। डोजियर में बताया गया है कि कैसे संपादकों का एक छोटा सा समूह अक्सर पेजों पर कब्जा कर लेता है, केवल अपने पसंदीदा ‘स्वीकार्य’ प्रकाशनों के भरोसे रहता है, और विकिपीडिया के आंतरिक नियमों का इस्तेमाल अपनी खास विचारधारा थोपने के लिए करता है।
फिल्म ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ से जुड़े घटनाक्रम ठीक उसी पैटर्न में फिट बैठते हैं जिसका जिक्र उस डोजियर में किया गया था। जैसा कि ‘टॉक पेज’ की चर्चाओं से साफ है, फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की जिद किसी व्यापक आपसी सहमति से नहीं उपजी थी। इसके बजाय, यह कुछ खास संपादकों द्वारा गिने-चुने आलोचनात्मक विचारों को एक ‘तय नैरेटिव’ बनाने की बार-बार की गई कोशिशों का नतीजा था।
अन्य संपादकों द्वारा जताया गया विरोध, जिन्होंने यह साफ कहा था, “कुछ चुनिंदा लेखों को चुनकर उन्हें सामान्य बयान बना देना बेहद संदिग्ध (Fishy) लगता है” और “गिने-चुने अखबारों की 3-4 राय पूरी फिल्म का आधार नहीं बन सकतीं”, सीधे तौर पर ऑपइंडिया (OpIndia) के निष्कर्षों में जताई गई चिंताओं की पुष्टि करता है।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट (डोजियर) में खास तौर पर बताया गया था कि विकिपीडिया कैसे सिर्फ गिने-चुने ‘भरोसेमंद सूत्रों’ (Reliable Sources) के सहारे चलता है, जिससे एकतरफा बातों को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा मिलता है। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में भी यही खेल दिखा। यहाँ मुट्ठी भर अखबारों और ध्रुव राठी जैसे लोगों की नकारात्मक बातों को बार-बार लेख में डालने का दबाव बनाया गया, जबकि फिल्म की तारीफ करने वालों और दूसरे नजरिए रखने वालों की बातों को या तो अनसुना कर दिया गया या पूरी तरह हटा दिया गया।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट से एक और बड़ी बात सामने आई थी। वह यह कि विकिपीडिया पर कुछ ‘रसूखदार’ संपादक ही अपनी मर्जी चलाते हैं। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में भी संपादक कौटिल्य3 पर बिल्कुल यही आरोप लगे। एक दूसरे संपादक ने तो यहाँ तक कह दिया कि ‘इन्होंने बिना किसी से पूछे अकेले ही सब कुछ लिख डाला और दूसरे किसी को पेज पर कुछ करने ही नहीं दे रहे।’ एक और व्यक्ति ने उन पर आरोप लगाया कि वे ‘सिर्फ अपनी पसंद की खबरें चुन रहे हैं और गलत तरीके से अपनी बात थोप रहे हैं।’
यह ऑपइंडिया के उस दावे को सच साबित करता है कि विकिपीडिया कहने को तो सबके लिए खुला है, लेकिन असलियत में यहाँ नियमों की आड़ लेकर कुछ मुट्ठी भर संपादक ही राज करते हैं। ये लोग आम लेखकों के मुकाबले पूरी कहानी (नैरेटिव) को अपने कब्जे में रखने में कहीं ज्यादा माहिर होते हैं।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट ने यह भी साफ किया था कि कैसे घुमा-फिराकर बाहरी और विवादित बातों को विकिपीडिया के लेखों में डाल दिया जाता है। ध्रुव राठी की बातों को आधार बनाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। विकिपीडिया के ‘टॉक पेज’ पर दूसरे संपादकों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए पूछा था, “ध्रुव राठी की राजनीतिक बयानबाजी को सही जानकारी (Source) कैसे माना जा सकता है?” और “किसी यूट्यूबर की राय पर भला कैसे भरोसा किया जा सकता है?” इसके बावजूद, यह दलील दी गई कि चूंकि कुछ मीडिया घरानों ने उन बातों को छापा है, इसलिए उन्हें विकिपीडिया पर रखा जा सकता है।
साफ है कि फिल्म ‘धुरंधर’ के साथ जो हुआ, वह कोई इकलौता मामला नहीं है। यह उसी पुरानी समस्या को दोहराता है जिसका खुलासा ऑपइंडिया पहले ही कर चुका है। इससे पता चलता है कि विकिपीडिया का काम करने का तरीका पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है, बल्कि नियमों का बहाना बनाकर इसका इस्तेमाल किसी खास एजेंडे या सोच को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है।
ज्ञान का भंडार या नैरेटिव गढ़ने का औजार?
अगर हम फिल्म ‘धुरंधर’ के विवाद और ऑपइंडिया की रिपोर्ट को साथ मिलाकर देखें, तो विकिपीडिया की साख पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। जिसे दुनिया ‘सबकी जानकारी वाला’ एनसाइक्लोपीडिया मानती है, वह असल में एक ऐसी जगह बनता जा रहा है जहाँ जानकारियों को काट-छाँटकर एक खास दिशा में मोड़ा जाता है।
फिल्म ‘धुरंधर’ को ‘प्रोपेगेंडा’ बताने की जो बार-बार कोशिश हुई, भले ही दूसरे संपादक इसके खिलाफ थे और ठोस सबूत भी नहीं थे, उससे साफ है कि कैसे नियमों का फायदा उठाकर अपनी बात थोपी जा सकती है। जब कोई संपादक यह दावा करता है कि ‘यह फिल्म मोदी सरकार की नीतियों का प्रचार करती है’ और इसे ‘एक सच’ बताता है, तो वह निष्पक्ष जानकारी देने के बजाय अपनी निजी राय को सच बनाकर पेश करने लगता है।
इसके अलावा, जो लोग इन बातों का विरोध करते हैं, उन्हें विकिपीडिया के नियमों के जाल में फँसाकर चुप करा दिया जाता है। उनकी सही बातों को भी ‘निजी राय’ या ‘बिना सबूत की बात’ कहकर खारिज कर दिया जाता है, भले ही वे तथ्यों की कमी उजागर कर रहे हों। इसका नतीजा यह होता है कि ‘निष्पक्षता’ अपने आप नहीं आती, बल्कि वे लोग इसे अपनी मर्जी से तय करते हैं जो विकिपीडिया के सिस्टम को चलाना जानते हैं।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट ने पहले ही आगाह किया था कि विकिपीडिया का सिर्फ गिने-चुने अखबारों या वेबसाइटों को ही ‘भरोसेमंद’ मानना, असल में एक खास सोच को थोपने का तरीका है। फिल्म ‘धुरंधर’ के मामले में यही खेल खुलकर दिखा। एक बार जब कोई बात इस खास दायरे (जैसे चुनिंदा लेख या रिव्यू) में आ जाती है, तो उसे विकिपीडिया के पेज पर एक ‘बड़ी सच्चाई’ के रूप में डाल दिया जाता है, फिर चाहे उस दायरे के बाहर उस बात पर कितना भी विवाद क्यों न हो।
यह पूरा मामला लोगों की सोच को प्रभावित करने में विकिपीडिया की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े करता है। जब लाखों लोगों द्वारा पढ़े जाने वाले पेज किसी एकतरफा या विवादित राय को ‘बड़े सच’ की तरह दिखाने लगते हैं, तो इसका असर सिर्फ विकिपीडिया तक नहीं रहता। इससे यह तय होता है कि आम जनता किसी भी मुद्दे को कैसे समझेगी और उस पर क्या राय बनाएगी।
अब सवाल यह नहीं रह गया है कि क्या विकिपीडिया पक्षपाती (Biased) है, बल्कि सवाल यह है कि यह पक्षपात होता कैसे है। ऑपइंडिया की रिपोर्ट और फिल्म ‘धुरंधर’ के विवाद से जवाब साफ है, यह सब दबंग संपादकों, अपनी पसंद की खबरों को चुनने और नियमों का बहाना बनाकर अपनी बात थोपने का एक मिला-जुला खेल है।
भले ही विकिपीडिया खुद को निष्पक्ष होने का दावा करे, लेकिन उसके खिलाफ अब काफी सबूत हैं। हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद गूगल (Google) जैसा बड़ा सर्च इंजन आज भी किसी भी विषय (जैसे हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’) की जानकारी और सारांश दिखाने के लिए सबसे ज्यादा विकिपीडिया पर ही भरोसा करता है।
(यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


