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जंगल ही नहीं, शहरों से भी होंगे साफ… पूरा इकोसिस्टम होगा खत्म ताकि फिर कभी पनप न सके वामपंथी आतंक: नक्सल मुक्त भारत के बाद का रोडमैप तैयार

आज जब बस्तर के अबूझमाड़ में तिरंगा लहराता है और बालाघाट नक्सल मुक्त होता है, तो यह संदेश स्पष्ट है- 'लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है।' 2026 तक भारत की धरती वामपंथी आतंकवाद से पूरी तरह मुक्त होगी और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा सुरक्षित भारत होगा।

31 मार्च 2026… यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में एक निर्णायक लक्ष्य है- ‘नक्सल मुक्त भारत’। केंद्र सरकार, सुरक्षा एजेंसियाँ और राज्य सरकारें पिछले एक दशक से इस दिशा में लगातार और सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ रही हैं। अब जब नक्सलवाद अपने अंतिम गढ़ों तक सिमट चुका है, तो सरकार ने सिर्फ इसे हराने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की तैयारी कर ली है कि वामपंथी आतंकवाद दोबारा सिर न उठा सके।

सरकार ने इसके लिए विस्तृत एजेंडा बनाया है जिनमें अर्बन नक्सलियों पर लगाम लगाना भी शामिल है। सरकार के इस एजेंडा पर विस्तार से चर्चा करें उससे पहले बताते हैं कि किस तरह सरकार इस नक्सलियों के खात्मे के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है। 14 जनवरी 2026 को ही छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में 29 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। ये सरकार की नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ाई का एक मामूली हिस्सा है आँकड़े पर गौर करें तो दिखता है कि किस तरह बीते वर्ष में नक्सलवाद पर सबसे बड़ा प्रहार किया गया था।

नक्सली हिंसा में ऐतिहासिक गिरावट

पिछले एक दशक में सुरक्षा बलों और सरकार की साझा कोशिशों से नक्सली हिंसा में 53 प्रतिशत की बड़ी कमी दर्ज की गई है। अगर पिछले दो दशकों की तुलना करें तो साल 2004 से 2014 के बीच जहाँ हिंसा की 16,463 घटनाएँ हुई थीं, वहीं 2014 से 2024 के बीच यह घटकर 7,744 रह गईं। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों की शहादत में 73 प्रतिशत (1,851 से घटकर 509) और आम नागरिकों की जान जाने की घटनाओं में 70 प्रतिशत (4,766 से घटकर 1,495) की भारी गिरावट आई है, जो प्रभावित इलाकों में लौटती शांति का स्पष्ट संकेत है।

साल 2025: ऑपरेशंस और सरेंडर के बड़े आँकड़े

अकेले साल 2025 की बात करें तो सुरक्षाबलों ने 270 नक्सली उग्रवादियों को मुठभेड़ में ढेर किया है। इसके साथ ही 680 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 1,225 नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया गया। ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ जैसे अभियानों और बीजापुर, छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र में हुए बड़े एनकाउंटर्स ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है। अक्टूबर 2025 तक के आँकड़े बताते हैं कि मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।

मध्य प्रदेश: लाल आतंक से पूरी तरह मुक्त

दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक घोषणा हुई जब मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मध्य प्रदेश को ‘नक्सल मुक्त’ घोषित किया। बालाघाट में अंतिम दो बड़े नक्सलियों, दीपक (29 लाख इनामी) और रोहित (14 लाख इनामी) के आत्मसमर्पण ने इस राज्य से वामपंथी उग्रवाद का नामो-निशान मिटा दिया। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि सरकार का संकल्प दृढ़ हो और एजेंसियाँ सतर्क हों, तो दशकों पुरानी समस्या का अंत संभव है।

मिशन 2026: गोलियों से नहीं, अब विकास और तकनीक से होगा ‘लाल आतंक’ का अंत

ET की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सल मुक्त बनाने के लिए एक दमदार ’10-सूत्रीय’ फॉर्मूला तैयार किया है। रोडमैप का पहला हिस्सा सुरक्षा के मोर्चे पर एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। अब ध्यान ‘संघर्ष प्रतिक्रिया’ से हटकर ‘दीर्घकालिक शांति’ पर है। इसके तहत केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की जगह धीरे-धीरे राज्य पुलिस को कमान सौंपी जा रही है।

डेटा के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में 576 किलेनुमा पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं और 336 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं। साथ ही, नक्सलियों की फंडिंग रोकने के लिए NIA, ED और आयकर विभाग को समन्वित जाँच का जिम्मा दिया गया है। NIA ने अब तक नक्सलियों की ₹40 करोड़ और ED ने ₹12 करोड़ की संपत्ति जब्त की है, जिससे उनके वित्तीय नेटवर्क की कमर टूट गई है। शहरी क्षेत्रों में छिपे ‘अर्बन नक्सलियों’ और उनके फ्रंट संगठनों की पहचान कर उन्हें प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी गई है।

आँकड़े बताते हैं कि नक्सल प्रभावित 38 प्राथमिकता वाले जिलों में गरीबी दर 20% से अधिक है, जबकि राष्ट्रीय औसत 15% है। सुकमा, मलकानगिरी और पश्चिम सिंहभूम जैसे जिलों में तो यह 40% से भी ऊपर है। इसे देखते हुए सरकार ने 137 केंद्रीय योजनाओं को इन क्षेत्रों में शत-प्रतिशत लागू करने का लक्ष्य रखा है।

कनेक्टिविटी के मोर्चे पर 17,589 किमी सड़कों के लिए ₹20,815 करोड़ स्वीकृत किए गए हैं, जिसमें से 12,000 किमी का काम पूरा हो चुका है। संचार क्रांति के लिए 8,527 4G टावर मंजूर किए गए हैं। ड्रोन तकनीक के जरिए ‘स्वामित्व योजना’ को गति दी जा रही है ताकि हर ग्रामीण परिवार के पास अपनी जमीन का डिजिटल रिकॉर्ड हो, जिससे भूमि विवाद और नक्सलियों के बहकावे की गुंजाइश खत्म हो जाए।

बस्तर जैसे क्षेत्रों के आर्थिक विश्लेषण से पता चला है कि 70% घरों की आय ₹10,000 से कम है। रोडमैप का लक्ष्य इस मासिक आय को बढ़ाकर ₹25,000-30,000 तक ले जाना है। इसके लिए कौशल विकास और बाजार संपर्कों को मजबूत किया जा रहा है। अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिन्हें पुनर्वास नीति के तहत ₹5 लाख तक की आर्थिक मदद और ₹10,000 का मासिक वजीफा दिया जा रहा है। बस्तरिया बटालियन (1,143 जवान) जैसे प्रयोगों ने स्थानीय युवाओं को ‘बंदूक’ की जगह ‘वर्दी’ और ‘सम्मान’ की राह दिखाई है। सरकार का यह ‘ममता और कठोरता’ वाला मिश्रण नक्सलियों के भर्ती आधार को पूरी तरह खत्म कर रहा है।

हिंसा के विचार का अंत और भारत का नया सवेरा

इस रोडमैप की सबसे बड़ी ताकत इसका ‘पोस्ट-LWE’ विजन है। अतीत में हमने देखा है कि सुरक्षा बल जब किसी क्षेत्र को खाली कराते थे, तो शासन की अनुपस्थिति में नक्सली फिर लौट आते थे। लेकिन अब ‘सड़क, स्कूल और सुशासन’ की तिगड़ी ने उन दरारों को भर दिया है। NIA और ED के जरिए उनके ‘अर्बन इकोसिस्टम’ पर चोट करना एक मास्टरस्ट्रोक है, क्योंकि लाल आतंक को ऑक्सीजन शहरों के वातानुकूलित कमरों में बैठे बौद्धिक मददगारों से ही मिलती थी।

आज जब बस्तर के अबूझमाड़ में तिरंगा लहराता है और बालाघाट नक्सल मुक्त होता है, तो यह संदेश स्पष्ट है- ‘लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है।’ 2026 तक भारत की धरती वामपंथी आतंकवाद से पूरी तरह मुक्त होगी और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा सुरक्षित भारत होगा जहाँ विकास की धारा हर उस अंतिम छोर तक पहुँचेगी जिसे नक्सलियों ने कभी ‘अंधेरा’ बनाए रखा था।

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