भारतीय नौसेना की ताकत में बड़ा इजाफा होने वाला है। भारत और जर्मनी के बीच करीब 8 अरब डॉलर (लगभग 72,000 करोड़ रुपए) की विशाल रक्षा डील अंतिम चरण में है। इस डील के तहत भारत में 6 अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियाँ बनाई जाएँगी, जिनमें एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगा होगा।
यह डील भारत का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा समझौता बन सकती है। सूत्रों के अनुसार, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की 12-13 जनवरी 2026 की भारत यात्रा के दौरान इस पर मुहर लग सकती है।
यह डील प्रोजेक्ट-75I का हिस्सा है, जिसमें जर्मन कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारतीय मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) मिलकर काम करेंगी।
सबसे खास बात यह है कि इसमें पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा, यानी भारत को सबमरीन बनाने की पूरी तकनीक मिलेगी। इससे भारत आत्मनिर्भर बनेगा और भविष्य में खुद ऐसी पनडुब्बियाँ बना सकेगा। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि शुरुआती 6 के बाद और 3 सबमरीन्स बनाई जा सकती हैं, यानी कुल 9 तक जा सकता है।
यह डील हिंद महासागर में भारत की स्थिति मजबूत करेगी, खासकर चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों के खिलाफ। चीन अपनी पनडुब्बियाँ हिंद महासागर में ला रहा है, जबकि पाकिस्तान भी चीन की मदद से अपना सबमरीन बेड़ा बढ़ा रहा है। ऐसे में ये नई पनडुब्बियाँ भारत को बड़ा रणनीतिक फायदा देंगी।
नई सबमरीन्स की पावर और विशेषताएँ: AIP सिस्टम क्या है और इसके फायदे
इस डील में बनने वाली सबमरीन्स जर्मनी की टाइप-214 या नेक्स्ट जेनरेशन (Type 214NG) क्लास की होंगी। ये करीब 2500 टन वजनी होंगी और आधुनिक हथियारों से लैस होंगी। इनमें टॉरपीडो, मिसाइलें, अत्याधुनिक सेंसर और काउंटरमेजर सिस्टम लगे होंगे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है AIP सिस्टम।
AIP यानी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन एक ऐसी तकनीक है जो सबमरीन को बिना हवा के लंबे समय तक पानी के नीचे चलने देती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन्स को बैटरी चार्ज करने के लिए समय-समय पर पानी की सतह पर आना पड़ता है, जहाँ स्नॉर्कल से हवा लेकर इंजन चलाते हैं। इससे दुश्मन को पता लगने का खतरा रहता है। लेकिन AIP में फ्यूल सेल तकनीक (हाइड्रोजन आधारित) इस्तेमाल होती है, जो बिना हवा के बिजली बनाती है। इससे सबमरीन कई हफ्तों तक पानी के नीचे रह सकती है।
फायदे गिनाएँ तो…
- स्टेल्थ क्षमता बढ़ती है: कम शोर करती है, दुश्मन के सोनार से बचना आसान।
- लंबी गश्त: हफ्तों तक छिपकर दुश्मन की निगरानी या हमला कर सकती है।
- रणनीतिक ताकत: हिंद महासागर जैसे बड़े क्षेत्र में लंबे मिशन संभव।
- स्वदेशीकरण: शुरुआती सबमरीन्स में 45% और आखिरी में 60% भारतीय पार्ट्स, जो मेक इन इंडिया को बढ़ावा देगा।
ये सबमरीन्स ब्रह्मोस या अग्नि जैसी मिसाइलों से भी लैस हो सकती हैं, जिससे इनकी मारक क्षमता और बढ़ जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि ये सबमरीन्स भारतीय नौसेना को ‘अजेय चक्रव्यूह’ जैसी ताकत देंगी।
प्रोजेक्ट-75 की लंबी कहानी, 1997 से लटकी है डील
भारतीय नौसेना को नई सबमरीन्स की जरूरत बहुत पुरानी है। 1997 में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने प्रोजेक्ट-75 को मंजूरी दी थी। उस समय योजना थी कि 24 सबमरीन्स बनाई जाएँगी। लेकिन देरी और तकनीकी मुद्दों से यह प्रोजेक्ट लंबा खिंचता गया।
पहले चरण में फ्रांस की कंपनी DCNS (अब नवाल ग्रुप) से 6 स्कॉर्पीन क्लास सबमरीन्स की डील हुई। ये मझगांव डॉक में बन रही हैं और अब तक कुछ कमीशन हो चुकी हैं। लेकिन इनमें AIP सिस्टम नहीं था (बाद में जोड़ा जा रहा है)। प्रोजेक्ट-75I दूसरा चरण था, जिसमें AIP वाली 6 सबमरीन्स बननी थीं।
यह प्रोजेक्ट कई साल लटका रहा। रूस, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और दक्षिण कोरिया ने बोली लगाई। कई बार टेंडर रद्द हुए, भ्रष्टाचार के आरोप लगे और तकनीकी जरूरतें पूरी नहीं हुईं।
साल 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत मोदी सरकार ने विदेशी कंपनियों को भारत में निर्माण और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए मजबूर किया। इसके बाद अब जर्मनी का TKMS चुना गया है, क्योंकि उनका AIP सिस्टम आजमाया हुआ और भरोसेमंद है। स्पेन की S-80 भी दौड़ में थी, लेकिन जर्मनी आगे निकला।
इस डील से फ्रांस को झटका लग सकता है, क्योंकि भारत फ्रांस से 3 और स्कॉर्पीन खरीदने की योजना रद्द कर सकता है। ये डील रूस पर से भी निर्भरता कम करेगी।
भारतीय नौसेना की वर्तमान स्थिति और भविष्य के प्रोजेक्ट्स
फिलहाल भारतीय नौसेना के पास करीब 16-18 सबमरीन्स हैं। इनमें ज्यादातर पुरानी रूसी किलो क्लास और कुछ नई फ्रांसीसी स्कॉर्पीन हैं। लेकिन कई पुरानी हो चुकी हैं और रिटायर हो रही हैं। चीन के पास 60 से ज्यादा सबमरीन्स हैं, जिनमें न्यूक्लियर भी शामिल हैं। इसलिए भारत को जल्दी नई सबमरीन्स चाहिए।
भविष्य के प्रोजेक्ट्स
- प्रोजेक्ट-75I: यही मुख्य, 6 (संभावित 9) AIP वाली सबमरीन्स।
- न्यूक्लियर सबमरीन्स: अरिहंत क्लास के तहत S4, S5 जैसे प्रोजेक्ट। S4 2026 तक शामिल हो सकती है। ये बैलिस्टिक मिसाइलें ले जा सकती हैं, जो भारत की न्यूक्लियर डिटरेंस मजबूत करेंगी।
- स्वदेशी कन्वेंशनल सबमरीन्स: L&T और MDL मिलकर डिजाइन कर रहे हैं, 2026-27 तक डिजाइन पूरा हो सकता है।
- अतिरिक्त स्कॉर्पीन: DRDO का AIP सिस्टम जोड़कर और बनाई जा सकती हैं।
भारतीय नौसेना के लिए 2026 बड़ा साल होगा। नेवी कई नए जहाज और सबमरीन्स शामिल करेगी। प्रोजेक्ट 17A फ्रिगेट्स, विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर भी आ रहे हैं। कुल मिलाकर नौसेना 2030 तक 170-200 जहाजों का लक्ष्य रख रही है।
चीन और पाकिस्तान के खिलाफ मजबूती का रणनीतिक महत्व
हिंद महासागर भारत के लिए जीवनरेखा है। यहाँ से तेल और व्यापार आता है। चीन अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत श्रीलंका, पाकिस्तान और अफ्रीका में पोर्ट बना रहा है। उसकी पनडुब्बियाँ भारतीय जल में घुसपैठ कर रही हैं। पाकिस्तान को चीन 8 नई सबमरीन्स दे रहा है।
ये नई जर्मन सबमरीन्स भारत को छिपकर निगरानी और हमले की क्षमता देंगी। AIP से दुश्मन को पता नहीं चलेगा। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से भारत का डिफेंस इंडस्ट्री मजबूत होगा, साथ ही हजारों नौकरियाँ पैदा होंगी।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
यह डील सिर्फ सबमरीन्स नहीं, भारत-जर्मनी संबंधों की नई शुरुआत है। जर्मनी रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अपनी डिफेंस इंडस्ट्री बढ़ा रहा है और भारत बड़ा बाजार है। प्रधानमंत्री मोदी और चांसलर मर्ज की मुलाकात में यह डील हाइलाइट होगी।
भारतीय नौसेना अब पुरानी निर्भरता से निकलकर आधुनिक, स्वदेशी ताकत की ओर बढ़ रही है। ये सबमरीन्स हिंद महासागर को भारत का बनाए रखेंगी। आने वाले सालों में भारत समुद्री महाशक्ति बनेगा।


