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भारत में बैन हुए चाइनीज CCTV कैमरे, पहले से देसी कंपनियाँ बना चुकी हैं 80% पर कब्जा: जानें- इजरायल की ईरान पर हमले के बाद कैसे ‘कनेक्टेड आँखें’ बनी नेशनल सिक्योरिटी का मुद्दा

सरकार ने साफ कर दिया है कि अब सर्विलांस सिस्टम के बाजार में SQTC सर्टिफिकेट लेना जरूरी है। जो कंपनियाँ यह नियम नहीं मानेंगी, उन्हें बाजार में काम करने नहीं दिया जाएगा। साथ ही सप्लाई चेन में भी बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। इससे चीनी कंपनियाँ धीरे-धीरे देश से बाहर हो रही हैं और उनकी जगह अब भारतीय कंपनियाँ तेजी से आगे बढ़ रही हैं।

भारत में निगरानी व्यवस्था यानी सर्विलांस सिस्टम में अब बड़ा बदलाव होने जा रहा है। 01 अप्रैल 2026 से सरकार नए सख्त नियम लागू करने जा रही है, जिसके बाद चीन की कई सीसीटीवी कंपनियाँ जैसे टीपी लिंक, हिकवीजन और दहुआ भारतीय बाजार से लगभग बाहर हो जाएँगी। सरकार ने साफ कर दिया है कि अब इंटरनेट से जुड़ी वही कैमरा डिवाइस भारत में बिक सकेंगी, जिनके पास जरूरी सुरक्षा सर्टिफिकेट होगा। यह सर्टिफिकेट STQC यानी सरकारी जाँच प्रक्रिया के तहत मिलता है। जिन कंपनियों ने यह सर्टिफिकेट नहीं लिया है, वे अब अपने प्रोडक्ट भारत में नहीं बेच पाएँगी।

इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह देश की सुरक्षा मानी जा रही है। सरकार चाहती है कि भारत में इस्तेमाल होने वाले सभी निगरानी उपकरण सुरक्षित हों और उनका डेटा देश के लिए खतरा न बने। इसके साथ ही सरकार भरोसेमंद सप्लाई चेन और डेटा की सुरक्षा यानी डेटा संप्रभुता पर भी जोर दे रही है।

बाजार में क्या हो रहा है?

नए सर्टिफिकेशन नियमों का असर भारत के सीसीटीवी बाजार में तुरंत दिखाई देने लगा है। जो चीनी ब्रांड कुछ समय पहले तक बाजार का लगभग एक तिहाई हिस्सा रखते थे, अब वे या तो बाहर हो रहे हैं या अपने काम करने का तरीका पूरी तरह बदल रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब भारतीय कंपनियाँ जैसे सीपी प्लस, क्यूबो, प्रामा, मैट्रिक्स और स्पार्श मिलकर बाजार के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर कब्जा कर चुकी हैं। वहीं बॉश और हनीवेल जैसी विदेशी कंपनियों ने प्रीमियम सेगमेंट में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। दूसरी तरफ चीनी और छोटे खिलाड़ी नियमों का पालन न कर पाने की वजह से बाजार से गायब होते जा रहे हैं।

जो कंपनियाँ ज्यादा हद तक चीनी चिपसेट और सॉफ्टवेयर पर निर्भर थीं, उन्हें नए नियमों को पूरा करने में काफी परेशानी हो रही है। हिकविजन जैसी बड़ी कंपनियों को अब भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करने और चीनी सप्लाई चेन से दूर जाने के रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं, क्योंकि भारत सरकार के नियम सख्त हो गए हैं। वहीं दहुआ की मौजूदगी बाजार में लगभग 80 प्रतिशत तक घट चुकी है।

चीन से जुड़ी कंपनियाँ जैसे शाओमी और रियलमी, जो स्मार्ट होम कैमरा सेगमेंट में काफी मजबूत मानी जाती थीं, उन्होंने भी नए नियमों को पूरा करने में दिक्कत के कारण इस बाजार से दूरी बना ली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बदलाव की वजह से लागत में करीब 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि अब लोकल स्तर पर चीजें तैयार करनी पड़ रही हैं और दूसरे स्रोतों से सामान लेना पड़ रहा है। हालाँकि बाजार के बड़े खिलाड़ियों ने निचले सेगमेंट में कीमतों को काफी हद तक संतुलित रखा है।

यह पूरा बदलाव अप्रैल 2024 में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा लागू किए गए नए नियमों से शुरू हुआ था। इन नियमों के तहत किसी भी प्रोडक्ट को भारत में बेचने से पहले उसकी सुरक्षा जाँच, उसमें इस्तेमाल हाने वाले पार्ट्स का स्रोत बताना और उसकी कमजोरियों की जाँच करना जरूरी कर दिया गया है।

नई नीति की पूरी व्यवस्था को समझिए

04 फरवरी 2026 को भारत सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया, जिसमें बाजार में हो रहे बदलावों के पीछे की नीति को साफ तौर पर समझाया गया। इस सर्कुलर में बताया गया कि अब सीसीटीवी कैमरों की सुरक्षा से जुड़ी जाँच एक ही तरीके से होगी और इसके लिए STQC यानी मानक परीक्षण औऱ गुणवत्ता सर्टिफिकेशन की जाँच को जरूरी बनाया गया है, जो आवश्यक आवश्यकताओं के ढाँचे के तहत होगी।

सरकार ने दो अहम नियमों को आपस में जोड़ दिया है। पहला है अनिवार्य पंजीकरण आदेश और दूसरा है मेक इन इंडिया के तहत सरकारी खरीद में प्राथमिकता देने वाला नियम। अब इन दोनों के लिए अलग-अलग प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। एक ही STQC की सुरक्षा जाँच रिपोर्ट दोनों नियमों का पालन करने के लिए काफी होगी। इस फैसले से पहले जो भ्रम की स्थिति थी, वह अब खत्म हो जाएगी और नियमों को लागू करना भी ज्यादा सख्त और आसान हो जाएगा।

यह बात समझना बहुत जरूरी है कि इस सर्कुलर में साफ कर दिया गया है कि सुरक्षा सर्टिफिकेशन का संबंध मेक इन इंडिया के तहत होनो वाली वैल्यू एडिशन यानी स्थानीय हिस्सेदारी की शर्तों से अलग है। आसान शब्दों में कहें तो अगर कोई उत्पाद लोकलाइजेशन यानी देश में बनने के मानकों को पूरा भी करता है, तब भी यह सुरक्षा जाँच से बच नहीं सकता।

यहाँ इंटरनेट से जुड़े उपकरणों के लिए बनने वाली सर्टिफिकेशन योजना यानी IoT सिस्टम सर्टिफिकेशन स्कीम की अहम भूमिका होती है। सीसीटीवी कैमरे भी IoT डिवाइस माने जाते हैं, यानी ये इंटरनेट से जुड़े उपकरण हैं। इसलिए इनकी जाँच सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि साइबर सुरक्षा के लिए नजरिए से भी इनकी कड़ी जाँच होती है। इस व्यवस्था के तहत ऐसे उपकरणों को कई सख्त मानकों पर खरा उतरना होता है, जैसे संरक्षित संचार प्रणाली, डाटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन, छेड़छाड़ से बचाव और हार्डवेयर तक पहुँच को नियंत्रित रखना।

IoT से जुड़े नियमों में यह भी साफ किया गया है कि SQTC सर्टिफिकेट सभी ऐसे उपकरणों पर एक समान तरीके से लागू होगा। इसका मतलब यह है कि कोई भी निर्माता अलग-अलग नियमों का फायदा उठाकर जाँच से बच नहीं सकता। इससे सरकार को भी अलग-अलग क्षेत्रों में जाँच की प्रक्रिया और सर्टिफिकेशन के तरीके को एक जैसा बनाने में मदद मिलेगी।

सरकार ने उन कंपनियों के नाम भी सार्वजनिक कर दिए हैं जिन्हें यह क्लियरेंस सर्टिफिकेट मिल चुका है। इसके साथ ही हर कंपनी का प्रमाणपत्र PDF के रूप में वेबसाइट पर भी जारी किया गया है, जिसे लोग आसानी से देख सकते हैं।

2025 में सरकार ने सर्टिफिकेशन की समय सीमा बढ़ाने से किया इनकार

साल 2025 में सरकार ने सर्टिफिकेशन की समय सीमा बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया था और यहीं से बाजार में आ रहे मौजूदा बदलाव की नींव पड़ी। उसी समय सरकार ने सीसीटीवी कैमरों की जाँच का दायरा बढ़ाकर सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सॉफ्टवेयर और यहाँ तक कि सोर्स कोड स्तर तक की जाँच को भी इसमें शामिल कर लिया।

जैसा कि मई 2025 में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया था, निर्माताओं को अपने उपकरणों को सरकारी लैब में गहनता से सुरक्षा जाँच के लिए जमा करना अनिवार्य कर दिया गया था। इस जाँच में फर्मवेयर का विश्लेषण, एन्क्रिप्शन यानी डाटा को सुरक्षित रखने के तरीके की पड़ताल और उन संभावित कमजोरियों की पहचान शामिल थी, जिनके जरिए कोई दूर से सिस्टम तक पहुँच बना सकता है या डाटा चोरी कर सकता है।

उस समय कई निर्माताओं ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि इससे प्रक्रिया में देरी होगी, जाँच का बोझ बढ़ेगा और उनके गोपनीय सोर्स कोड पर भी खतरा आ सकता है। उद्योग से जुड़े संगठनों ने यह भी चेतावनी दी थी कि इससे आर्थिक नुकसान हो सकता है और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर भी असर पड़ेगा। लेकिन सरकार ने इन नियमों में किसी तरह की ढील देने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि यह कदम देश की सुरक्षा से जुड़े एक गंभीर मुद्दे को ध्यान में रखकर उठाया गया है।

इन नियमों के तहत अधिकारियों को यह अधिकार भी दिया गया कि वे जरूरत पड़ने पर भारत के बाहर स्थित निर्माण इकाइयों का भी निरीक्षण कर सकते हैं। साथ ही कंपनियों के लिए यह जरूरी कर दिया गया कि वे अपने उपकरणों में मजबूत सुरक्षा फीचर्स शामिल करें, जैसे डाटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन, मालवेयर यानी हानिकार सॉफ्टवेयर की पहचान और उसे रोकने की व्यवस्था और सुरक्षित संचार प्रणाली।

सरकार ने सीसीटीवी इकोसिस्टम में मौजूद कमजोरियों को लेकर जताई चिंता

सीसीटीवी से जुड़े डाटा की सुरक्षा को लेकर चिंता कोई नई बात नहीं है। साल 2021 में लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने पहले ही विदेशी कंपनियों के सर्विलांस सिस्टम से जुड़ी कमजोरियों की ओर इशारा किया था। इससे साफ होता है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार लंबे समय से सीसीटीवी सिस्टम के जरिए होने वाले संभावित डाटा लीक को रोकने की कोशिश कर रही है।

सरकार ने यह भी बताया था कि सरकारी संस्थानों में लगे करीब 10 लाख सीसीटीवी कैमरे चीनी कंपनियों से खरीदे गए थे। सरकार ने माना कि इन उपकरणों के जरिए रिकॉर्ड किया गया वीडियो डाटा विदेशों में मौजूद सर्वर तक भेजा जा सकता है, जिससे सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं।

सरकार ने उस समय सिस्टम में मौजूद कमियों की ओर इशारा करते हुए कहा था कि जोखिम को कम करने के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं, जैसे संदिग्ध URL और IP एड्रेस को फिल्टर करना। इसके अलावा मौजूदा कानूनों के तहत आयात को नियंत्रित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए भी उपाय किए गए कि सभी उपकरण भारतीय सुरक्षा मानकों का पालन करें।

इन शुरुआती चेतावनियों ने आगे चलकर नियमों को सख्त बनाने की नींव रखी। इससे यह साफ संकेत मिला कि सरकार लंबे समय से ऐसी नीति पर काम कर रही है, जिसका मकसद निगरानी से जुड़े ढाँचे को ज्यादा सुरक्षित बनाना है।

गैजेट में जारी अधिसूचना, जिसने सीसीटीवी सिस्टम को हमेशा के लिए बदला

मौजूदा नियमों की पूरी व्यवस्था की कानूनी नींव 9 अप्रैल 2024 को जारी किए गए गैजेट के नोटिफिकेशन पर टिकी हुई है। इस नोटिफिकेशन के जरिए सरकार ने औपचारिक रूप से सीसीटीवी कैमरों को अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था के तहत शामिल कर लिया।

इस अधिसूचना में इलेक्ट्रॉनिक्स और IT उपकरणों से जुड़े आदेश में बदलाव किया गया और सीसीटीवी कैमरों को ऐसी श्रेणी में रखा गया, जिनकी बिक्री से पहले जरूरी सर्टिफिकेशन लेना अनिवार्य होगा। इसके तहत भारतीय सुरक्षा मानकों का पालन करना और नए लागू किए गए जरूरी सुरक्षा नियमों को मानना भी जरूरी कर दिया गया।

इसका मुख्य मकसद यह है कि सीसीटीवी सिस्टम हर स्तर पर सुरक्षित हों। इसमें हार्डवेयर, फर्मवेयर, नेटवर्क और सप्लाई चेन सभी शामिल हैं। ये नियम सिर्फ सामान्य गुणवत्ता जाँच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाने पर खास ध्यान देते हैं।

निर्माताओं के लिए यह जरूरी कर दिया गया है कि वे अपने उपकरणों में मजबूत फिजिकल सुरक्षा सुनिश्चित करें। इसका मतलब है कि डिवाइस का ढाँचा ऐसा हो जो आसानी से खोला या छेड़ा न जा सके, ताकि कोई भी व्यक्ति अंदर के हिस्सों तक बिना अनुमति पहुँच न बना सके। सॉफ्टवेयर के स्तर पर भी सख्त नियम लागू किए गए हैं, जैसे मजबूत लॉगिन सिस्टम, अलग-अलग लोगों के लिए सीमित और तय पहुँच और समय-समय पर अपडेट देना।

सबसे अहम बात डाटा की सुरक्षा से जुड़ी है। कैमरों से भेजा जाने वाला वीडियो डाटा एन्क्रिप्शन यानी सुरक्षित तरीके से भेजा जाना जरूरी है, ताकि कोई बीच में उसे देख या बदल न सके। इसके अलावा डिवाइस को इस तरह तैयार करना होगा कि वह साइबर हमलों का सामना कर सके। इसके लिए पहले से जाँच की जाती है, जिसमें सिस्टम की कमजोरियों को परखा जाता है।

सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया में कंपनियों को अपने उत्पाद से जुड़ी पूरी तकनीकी जानकारी देनी होती है। इसमें सिस्टम का ढाँचा कैसे काम करता है, फर्मवेयर की जानकारी और सुरक्षा से जुड़े नियम शामिल होते हैं। साथ ही यह भी साबित करना होता है कि डिवाइस सुरक्षित तरीके से शुरू होता है, उसके सॉफ्टवेयर के साथ छेड़छाड़ नहीं हो सकती और किसी तरह का छिपा हुआ बैकडोर एक्सेस मौजूद नहीं है।

एक और अहम शर्त सप्लाई चेन की पारदर्शिता से जुड़ी है। निर्माताओं को यह बताना जरूरी है कि उनके उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले जरूरी पुर्जे, जैसे चिपसेट, कहाँ से आए हैं और यह भी साबित करना होगा कि वे भरोसेमंद स्रोतों से लिए गए हैं। खासकर चीनी पुर्जों को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच यह नियम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

नोटिफिकेशन में डिवाइस की पूरी लाइफ साइकिल की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि उपकरणों में सुरक्षित तरीके से फर्मवेयर अपडेट होने चाहिए, पुराने और कमजोर वर्जन पर वापस जाने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए और सॉफ्टवेयर से जुड़ी सभी जानकारियों और कमजोरियों का रिकॉर्ड भी रखा जाना जरूरी है।

जाँच की प्रक्रिया उन मान्यता प्राप्त लैब में होती है, जिन्हें भारतीय मानक ब्यूरो ने मंजूरी दी होती है। किसी भी उत्पाद को तब तक सर्टिफिकेशन नहीं मिलता, जब तक वह इन सभी परीक्षणों में सफल नहीं हो जाता। इसके बाद ही उसे भारतीय बाजार में बेचने की अनुमति दी जाती है।

कुल मिलाकर, इस अधिसूचना ने सीसीटीवी कैमरों को सिर्फ निगरानी करने वाले साधारण उपकरण से आगे बढ़ाकर एक सख्त नियमों के तहत आने वाले डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बना दिया है, जहाँ सुरक्षा, पारदर्शिता और पूरी जानकारी देना अनिवार्य हो गया है।

बिना निगरानी वाले सीसीटीवी नेटवर्क राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा क्यों पैदा करते हैं?

खतरे की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में केंद्रीय एजेंसियों ने देशभर के बड़े शहरों में लगे सीसीटीवी नेटवर्क का ऑडिट कराने का आदेश दिया है। यह निर्देश उस समय जारी किया गया जब पाकिस्तान से जुड़े एक जासूसी गिरोह का पर्दाफाश हुआ। न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं थी। जाँच में सामने आया कि इस जासूसी नेटवर्क ने सिर्फ पहले से लगे कैमरों का फायदा ही नहीं उठाया, बल्कि संवेदनशील जगहों पर अपने गुप्त कैमरे भी लगा दिए थे, जिनमें दिल्ली कैंट रेलवे स्टेशन और सोनीपत रेलवे स्टेशन जैसे इलाके शामिल हैं।

इनमें से कुछ कैमरों में सोलर पावर सिस्टम भी लगाया गया था. ताकि बिना रुके लगातार लाइव फुटेज मिलती रहे। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, यह फुटेज सीमा पार बैठे ISI से जुड़े लोगों तक भेजी जा रही थी। इसके बाद केंद्रीय एजेंसियों ने पुलिस और अन्य सुरक्षा इकाइयों को निर्देश दिया है कि वे खुद मौके पर जाकर जाँच करें, बिना अनुमति लगे कैमरों की पहचान करें और यह भी देखें कि मौजूद सिस्टम में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं या नहीं।

दरअसल, सीसीटवी कैमरे सिर्फ अपराध रोकने के साधन नहीं होते। अगर इनसे समझौता हो जाए। तो यही कैमरे दुश्मन के लिए खुफिया जानकारी जुटा का जरिया बन सकते हैं। अलग-अलग एजेंसियों, ठेकेदारों और स्थानीय निकायों द्वारा बिना एक समान निगरानी व्यवस्था के लगाए गए कैमरों का बिखरा हुआ नेटवर्क कई ऐसी कमजोरियाँ पैदा करता है, जिनका फायदा दुश्मन देश, आतंकी संगठन या जासूसी करने वाले लोग उठा सकते हैं।

निगरानी से जुड़े ढाँचे में अगर सेंध लग जाए तो उसका खतरा सिर्फ कल्पना तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया में इसके खतरनाक उदाहरण सामने आ चुके हैं। ऑपइंडिया की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने कई सालों तक ईरान के ट्रैफिक कैमरा नेटवर्क और मोबाइल सिस्टम में घुसपैठ कर वहाँ के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनकी सुरक्षा टीम की गतिविधियों पर नजर रखी थी, उस हमले से पहले जिसमें उनकी मौत हुई बताई जाती है।

बताया जाता है कि इस निगरानी के जरिए इजरायली एजेंसियों ने सुरक्षाकर्मियों, ड्राइवरों और बडे़ अधिकारियों की हरकतों को ट्रैक किया। उन्होंने यह भी समझ लिया कि सुरक्षित परिसर के अंदर गाड़ियाँ कहाँ और कैसे खड़ी होती हैं, लोग किन रास्तों से आते जाते हैं और सुरक्षा में लगे लोगों की दिनचर्या क्या है। इन सब जानकारियों को इकट्ठा करके एक तरह से पूरा डाटा तैयार किया गया।

रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ट्रैफिक कैमरों से मिलने वाला डाटा सुरक्षित करके इजरायल के सर्वर तक भेजा गया, जबकि आसपास के मोबाइल नेटवर्क में भी दखल देकर किसी तरह की चेतावनी को देर से पहुँचाने या रोकने की कोशिश की गई।

यह उदाहरण दिखाता है कि अगर कैमरों में सेंध लग जाए, तो वे जंग के स्तर की खुफिया जानकारी जुटाने का साधन बन सकते हैं। इससे लोगों की आदतें, उनकी दिनचर्या, कमजोरियाँ और सही अहम बातें पता चल जाती हैं। जब इसे सिग्नल इंटरेस्पशन, डाटा एनालिसिस और मानव खुफिया जानकारी के साथ जोड़ा जाता है, तो दुश्मन के लिए निशाना तय करना और सटीक हमला करना आसान हो जाता है।

इसलिए भारत के लिए यह सिर्फ तकनीकी नियमों का पालन करने या कागजी प्रक्रिया भर का मामला नहीं है। यह देश की संप्रभुता, जासूसी के खिलाफ सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंबीर मुद्दा है। अगर निगरानी का नेटवर्क सुरक्षित नहीं है या उसकी सही तरीके से जाँच नहीं होती, तो यह सिर्फ एक छोटी सी चूक नहीं बल्कि दुश्मन के लिए एक बड़ा मौका बन सकता है।

सिर्फ बाजार में बदलाव नहीं, बल्कि पूरे ढाँचे में बड़ा परिवर्तन

पिछले कुछ सालों में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों का असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है और इसी वजह से भारत के निगरानी सिस्टम में एक बड़ा ढाँचागत बदलाव आ गया है। जो शुरुआत में सिर्फ डाटा सुरक्षा की चिंता से शुरू हुआ था, वह अब पूरे नियमों के मजबूत ढाँते में बदल चुका है। यह ढाँचा सप्लाई चेन को नया रूप दे रहा है, देश में निर्माण को बढ़ावा दे रहा है और बिना जाँची परखी विदेशी तकनीक पर रोक लगा रहा है।

हालाँकि, इस बदलाव के कारण शुरुआत में लागत बढ़ी है और कुछ समय के लिए दिक्कतें भी आई हैं, लेकिन इसके साथ ही भारतीय कंपनियों के लिए बड़े मौके भी पैदा हुए हैं। आने वाले सालों में इस बाजार के तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, जिसमें घरेलू निर्माता मजबूत पकड़ बना सकते हैं।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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