चाहे मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट हो या कुछ समय पहले भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ‘आपरेशन सिंदूर’। इन हमलों-युद्धों से एक बात को साफ नजर आ रही है कि आधुनिक युद्ध की प्रकृति बदल गई है, भारी टैंकों-सैनिकों की जगह हल्के ड्रोन ने लेनी शुरू कर दी है। खासकर सस्ते और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले ड्रोन अब किसी भी देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।
दुश्मन देश अब ‘ड्रोन स्वार्म’ यानी एक साथ हजारों ड्रोन भेजकर डिफेंस सिस्टम को भेदने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत ने अपनी वायु रक्षा क्षमता को और मजबूत करने के लिए एक अहम फैसला लिया है।
भारत के रक्षा मंत्रालय ने रूस की सरकारी रक्षा निर्यात कंपनी JSC रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के साथ 445 करोड़ रुपए का समझौता किया है जिसके तहत भारतीय सेना के लिए 2K22M तुंगुस्का एयर डिफेंस सिस्टम (Tunguska Air Defence System) खरीदा जाएगा। यह सौदा न केवल स्ट्रैटेजिक दृष्टि से अहम है बल्कि यह डिफेंस सेक्टर में भारत-रूस के सहयोग की निरंतरता को भी दिखाता है।
Ministry of Defence inks Rs 858 crore contracts for Tunguska Air Defence Missile System & Inspection (Depot Level) of P8I Aircraft
— PIB India (@PIB_India) March 27, 2026
The contract for the procurement of Tunguska Air Defence Missile Systems, valued at Rs 445 crore, for the Indian Army, was signed with JSC… pic.twitter.com/9Atto14v0V
बदलते युद्ध में ड्रोन बना सबसे बड़ा खतरा
अब छोटे, सस्ते और आसानी से बनाए जाने वाले ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आए हैं। ये ड्रोन बहुत कम ऊँचाई पर उड़ते हैं और अक्सर रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते। इसी वजह से पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इन्हें पहचानना और समय रहते रोकना मुश्किल हो जाता है।
भले ही भारत के पास S-400 जैसा आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है, जो दूर से आने वाले तेज और बड़े लक्ष्यों को मार गिराने में बेहद सक्षम है लेकिन छोटे आकार और धीमी गति वाले ड्रोन इसके लिए चुनौती बन सकते हैं। ऐसे ड्रोन अचानक हमला करते हैं और संख्या में ज्यादा होने पर डिफेंस सिस्टम को भ्रम में डाल सकते हैं।
इसी समस्या को देखते हुए अब सेना अपना फोकस उन प्रणालियों पर बढ़ा रही है जो कम ऊँचाई पर उड़ने वाले खतरों को खत्म करने में माहिर हों। यानी ऐसे सिस्टम जो तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें और छोटे लक्ष्यों को भी सटीकता से निशाना बना सकें।
तुंगुस्का इसी तरह की एक खास प्रणाली है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह ड्रोन, हेलीकॉप्टर और क्रूज मिसाइल जैसे खतरों को आसानी से पहचानकर तुरंत नष्ट कर सके। खास बात यह है कि यह नजदीकी दूरी पर भी बेहद प्रभावी तरीके से काम करती है।
तुंगुस्का: मिसाइल और गन का घातक मिक्स
तुंगुस्का प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत इसका अनोखा ‘हाइब्रिड’ डिजाइन है। आसान शब्दों में समझें तो यह एक ही प्लेटफॉर्म पर दो तरह के हथियारों का इस्तेमाल करती है- मिसाइल और तेज रफ्तार गन। यही वजह है कि यह अलग-अलग दूरी और परिस्थितियों से आने वाले खतरों से एकसाथ निपट सकती है।
इसमें इस्तेमाल होने वाली 9M311 श्रेणी की मिसाइलें करीब 8 से 10 किलोमीटर तक दूर मौजूद लक्ष्य को मार सकती हैं और लगभग 3500 मीटर की ऊँचाई तक उड़ रहे खतरों को भी खत्म कर सकती हैं। यानी अगर कोई दुश्मन हेलीकॉप्टर, ड्रोन या क्रूज मिसाइल थोड़ी दूरी से हमला करने की कोशिश करता है तो ये मिसाइलें उसे रास्ते में ही रोक सकती हैं।
इसके अलावा, इसमें लगी दो 30 मिमी की ऑटोमैटिक गन इसकी ताकत को और बढ़ा देती हैं। ये गन इतनी तेज हैं कि एक मिनट में लगभग 5000 गोलियाँ दाग सकती हैं। इसका मतलब है कि अगर कोई छोटा या तेज लक्ष्य बहुत करीब आ जाए जैसे ड्रोन या लो-फ्लाइंग मिसाइल तो यह सिस्टम तुरंत फायरिंग करके उसे नष्ट कर सकता है।
कुल मिलाकर तुंगुस्का को ऐसे समझा जा सकता है जैसे सुरक्षा की आखिरी ढाल। जब दूर की मिसाइलें काम कर चुकी होती हैं और खतरा नजदीक पहुँच जाता है, तब यह सिस्टम तेजी से प्रतिक्रिया देकर दुश्मन के हमले को वहीं खत्म कर देता है। यही वजह है कि इसे ‘क्लोज-इन वेपन सिस्टम’ कहा जाता है और मौजूदा वक्त के युद्ध के बदलते हालातो में इसकी भूमिका और अहम हो जाती है।
रडार, ट्रैकिंग के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में बढ़त
तुंगुस्का में 360 डिग्री कवरेज वाला अत्याधुनिक रडार सिस्टम लगा होता है जो करीब 18 किलोमीटर की दूरी तक हवाई लक्ष्यों का पता लगा सकता है। इसके साथ डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम जुड़ा होता है और यह लक्ष्य को सटीकता के साथ ट्रैक कर उसे नष्ट करने में मदद करता है।
इसकी एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की स्थिति में भी काम कर सकता है। यदि दुश्मन रडार सिस्टम को बाधित करने की कोशिश करता है तो यह ऑप्टिकल ट्रैकिंग के जरिए लक्ष्य पर निशाना साध सकता है। यह क्षमता आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माहौल में इसे और अधिक विश्वसनीय बनाती है।
युद्धक्षेत्र में गतिशीलता और रणनीतिक उपयोग
तुंगुस्का को ट्रैक्ड आर्मर्ड चेसिस पर लगाया गया है जिससे यह टैंक और अन्य बख्तरबंद वाहनों के साथ कठिन इलाकों में भी आसानी से चल सकता है। यह प्रणाली युद्धक्षेत्र में लगातार मूव करती सेना के साथ तालमेल बनाए रखते हुए उन्हें हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रणाली भारत के मल्टी लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करेगी। यह न केवल अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों की रक्षा करेगी बल्कि बड़े एयर डिफेंस सिस्टम और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को भी सुरक्षा प्रदान करेगी।
सैन्य आधुनिकीकरण का हिस्सा
यह सौदा ऐसे समय में हुआ है जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब 2.38 लाख करोड़ रुपए के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी है। प्रस्तावों में सिर्फ एयर डिफेंस सिस्टम ही नहीं बल्कि टैंक के लिए आधुनिक गोला-बारूद, उन्नत संचार नेटवर्क, धनुष तोप और ऐसी निगरानी प्रणालियाँ भी शामिल हैं जो बिना रनवे के काम कर सकती हैं। साफ है कि सेना को हर मोर्चे पर मजबूत करने की व्यापक तैयारी चल रही है।
तुंगुस्का प्रणाली की खरीद को सिर्फ एक साधारण रक्षा सौदे के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह इस बात का संकेत है कि भारत अब युद्ध के बदलते रूप को समझते हुए अपनी रणनीति को अपडेट कर रहा है। पहले जहाँ युद्ध बड़े टैंकों, लड़ाकू विमानों और पारंपरिक हथियारों पर आधारित होते थे तो वहीं अब तकनीक और ड्रोन के असीमित खतरों का दौर है।


