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सोनिया गाँधी की खामेनेई के सहारे वोट बैंक साधने की कोशिश, PM मोदी की विदेश नीति पर सवाल उठाने से पहले अपने गिरेबान में झाँकेगी कॉन्ग्रेस?

हमले के बाद ईरान ने कई खाड़ी देशों को निशाना बनाया है, होटलों से लेकर रिहायशी इलाकों तक पर हमले किए गए हैं। ऐसे में भारत बिना कुछ सोचे समझे ईरान की तरफ जाकर खड़ा हो जाए तो उस देशों में भारतीयों पर क्या असर होगा? क्या खाड़ी देश ईरान के साथ हैं?

कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद सोनिया गाँधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत को लेकर भारत सरकार पर सवाल उठाते हुए ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लंबा लेख लिखा है। सोनिया गाँधी इस बात से खफा हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुलकर क्यों ईरान के समर्थन में नहीं आ गए। अब इसके बदले में इजरायल-अमेरिका के समर्थन वाले खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों या हमारी विदेश नीति पर इसका क्या असर होगा इसकी सोनिया गाँधी को चिंता नहीं है। वो चाहती हैं कि PM मोदी खामेनेई की मौत की निंदा करें और ईरान के साथ खड़े हों।

क्या हत्या की निंदा का विदेश नीति पर असर होता है? 15 साल पीछे चलते हैं, 2011 में अरब दुनिया में शुरू हुई क्रांतियों की लहर लीबिया तक पहुँची और गद्दाफी की हिंसक तरीके से हत्या कर दी गई। उस समय कॉन्ग्रेस का शासन था और गद्दाफी से कॉन्ग्रेस की सरकार से दोस्ती थी, 2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पत्र भेजकर गद्दाफी को भारत आने का निमंत्रण दिया था। अब हिंसा और हत्या की खबर भारत तक पहुँची तो विदेश मंत्रालय ने इस पर जवाब माँगा गया। सरकार ने क्या गद्दाफी की हत्या पर भीड़ की निंदा की थी?

विदेश मंत्रालय ने कहा था, “कर्नल गद्दाफी की लीबिया के शहर सिरते में मौत हो गई है। लीबिया में चल रहे संघर्ष और वहाँ के लोगों की पीड़ा हमारे लिए चिंता का विषय रही है। हम आशा करते हैं कि लीबिया में जल्द ही शांति और स्थिरता लौटेगी। लीबिया की जनता के साथ भारत के संबंध गहरे और लंबे समय से चले आ रहे हैं। इस समय भारत एक बार फिर यह दोहराता है कि वह लीबिया के लोगों की राजनीतिक परिवर्तन प्रक्रिया और देश के पुनर्निर्माण में हर संभव मदद देने के लिए तैयार है।”

गद्दाफी की हत्या पर विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया

गद्दाफी की मौत के बाद भारत ने हत्या की निंदा करने का रास्ता नहीं चुना था, यह भारत की कमजोरी का रास्ता था या रणनीतिक चुप्पी? PM मोदी के दौर में विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत के हित सबसे ऊपर रखना है। हमने दुनिया के मसलों पर भारत के हितों को सबसे ऊपर रखा है।

भारत के हित सबसे ऊपर: विदेश नीति का भारतीय पक्ष

यह मान लेना सही नहीं है कि किसी घटना की सार्वजनिक निंदा करना ही एक सिद्धांतवादी विदेश नीति का एकमात्र पैमाना है। भारत ने हमेशा संतुलित और सोच-समझकर कूटनीति अपनाई है। रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब यह नहीं होता कि हर मुद्दे पर जोरदार बयान दिया जाए बल्कि इसका मतलब है कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखा जाए।

खासकर जब मामला अमेरिका और इजरायल जैसे देशों से जुड़ा हो और हालात बेहद संवेदनशील हों। भारत का पक्ष हमेशा शांति का पक्ष रहा है। इस युद्ध में भी शांति ने सभी पक्षों से शांति की ही अपील की है। रूस-यूक्रेन के युद्ध में भी भारत ने यही नीति अपनाई है। हम अपने हितों को सबसे ऊपर रखेंगे और वैश्विक शांति के लिए जो जरूरी हो वो कदम उठाने से भी परहेज नहीं करेंगे।

हमले के बाद ईरान ने कई खाड़ी देशों को निशाना बनाया है, होटलों से लेकर रिहायशी इलाकों तक पर हमले किए गए हैं। ऐसे में भारत बिना कुछ सोचे समझे ईरान की तरफ जाकर खड़ा हो जाए तो उस देशों में भारतीयों पर क्या असर होगा? क्या खाड़ी देश ईरान के साथ हैं? कूटनीति के फैसले अगर एक झटके में होने लगे तो देश के लिए समस्याएँ ही होंगी।

सोनिया का मकसद सिर्फ वोट बैंक साधना?

सोनिया गाँधी जैसे वरिष्ठ नेता जब सरकार से सवाल उठाते हैं, तो उसका एक राजनीतिक उद्देश्य भी होता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर सरकार की भाषा जितनी संतुलित होती है, विपक्ष उतना ही उसे ‘चुप्पी’ या ‘झुकाव’ के रूप में दिखाता है। फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी यही रणनीति अपनाई गई थी और अब ईरान के मामले में भी वही रुख दिखाई देता है।

भारत में गाँधी, पटेल या बोस के नाम वोट बैंक हो या ना हो लेकिन खामेनेई के नाम का तो है ही, सुप्रीम लीडर की मौत के भारत के अलग-अलग शहरों में दर्जनों जगहों पर हो रहे प्रदर्शन इस बात की गवाही हैं। बड़ी संख्या में भीड़ खामेनेई के लिए सड़कों पर आ रही है। कॉन्ग्रेस और सोनिया गाँधी इसी वोट बैंक को साधने की कोशिश में हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हर अंतरराष्ट्रीय घटना पर सरकार को सार्वजनिक रूप से कठोर बयान देना चाहिए? विदेश नीति भावनाओं से नहीं, हितों से संचालित होती है। पश्चिम एशिया जिसे हम अक्सर मिडिल ईस्ट भी कहते हैं, भारत के लिए केवल विचारधारा मुद्दा नहीं है, वहाँ करोड़ों भारतीय काम करते हैं, भारत की ऊर्जा सुरक्षा जुड़ी है, व्यापारिक और सामरिक हित जुड़े हैं। ऐसे में सरकार का पहला दायित्व बयानबाजी नहीं बल्कि संतुलन है।

विदेश नीति का मूल उद्देश्य राष्ट्रहित की रक्षा है, न कि कोई राजनीतिक लाभ। यदि सरकार किसी संवेदनशील स्थिति में खुली निंदा से बचती है, तो संभव है कि उसके पीछे सामरिक या कूटनीतिक कारण हों जो खुले तौर पर नहीं दिखाए जा सकते। विपक्ष का अधिकार है कि वह प्रश्न उठाए लेकिन हर संतुलित रुख को ‘कमजोरी’ बताना गंभीर विमर्श को नुकसान पहुँचाता है।

कॉन्ग्रेस की आलोचना केवल सिद्धांत की लड़ाई नहीं बल्कि राजनीतिक पोजिशनिंग है। वह खुद को नैतिक आवाज के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है और सरकार को बैकफुट पर लाना चाहती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों की हकीकत ब्लैक ऐंड व्हाइट नहीं होती। भारत जैसे उभरते देश को बयानबाजी से पहले संतुलन, लंबे वक्त के लिए सोच और रणनीतिक चतुराई की जरूरत है। राजनीति अपनी जगह है लेकिन राष्ट्रीय हित उससे ऊपर होना ही चाहिए।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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