नेताजी को 1580 वोट, गाँधी के पट्टाभि को 1377 मत... फिर भी बीमार बोस जब स्ट्रेचर पर कॉन्ग्रेस के त्रिपुर सेशन में पहुँचे, तब 2 लाख लोगों के सामने उनके राजनैतिक जीवन को सबसे बड़ा झटका लगा। अध्यक्ष चुने जाने के बाद भी उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा।
फॉंसी से कुछ घंटे पहले वो वर्जिश कर रहे थे। जेल के एक अधिकारी ने पूछा- अब इसकी क्या जरूरत? जवाब मिला- हिन्दू हूॅं। पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूॅं। अगले जन्म में भारत मॉं की सेवा के लिए और तंदरुस्त होकर लौटना चाहता हूॅं।
मीडिया गिरोह ऐसे आंदोलनों की तलाश में रहता है, जहाँ अपना कुछ दाँव पर न लगे और मलाई काटने को खूब मिले। बरखा दत्त का ट्वीट इसकी प्रतिध्वनि है। यूॅं ही नहीं कहते- तू चल मैं आता हूँ, चुपड़ी रोटी खाता हूँ, ठण्डा पानी पीता हूँ, हरी डाल पर बैठा हूँ।
ओवैसी ने नागरिकता संशोधन विधेयक को करोड़ों यहूदियों की हत्या का आदेश देने वाले जर्मन तानाशाह हिटलर के कानूनों से भी बदतर बताया। साथ ही कहा कि एक ऐसा कानून लाया जा रहा है जो नागरिकता के लिए आस्था को पैमाना बनाता है।
कक्षा 10 के कमजोर छात्रों के लिए शिक्षा विभाग ने मॉडल पेपर तैयार किया है। इसमें कहा गया है, “कुबुद्धि बेहद अवगुणी और शराबी था और गाँधी जी जैसा जीवन जीता था।” यह पेपर कई महीनों से सरकारी स्कूली में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।
"महात्मा गाँधी की हत्या कॉन्ग्रेस की अनुमति से हुई थी और इसका सबसे ज्यादा फायदा भी कॉन्ग्रेस ने ही उठाया है। कॉन्ग्रेस गाँधी की हत्या का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करती रही है। कॉन्ग्रेस की अपनी कोई नीति ही नहीं है। वो सत्ता सुख के लिए कुछ भी कर सकती है।"
देश के राइट विंग की यही समस्या है कि उसे दीर्घकालिक युद्ध भी लड़ना है, लेफ्ट विंग की स्वीकार्यता भी चाहिए और अपनी नैतिकता भी बचानी है। तुमने न तो संदर्भ देखा, न सुनवाई की, बस विरोधियों के जाल में उलझ कर तुमने साध्वी प्रज्ञा को एक लाइन में नकार दिया। यही सब करना था तो उसे चुनाव क्यों लड़वाया?
मध्य प्रदेश के शिवपुरी में मेडिकल कॉलेज के नामकरण को लेकर विवाद। माधवराव सिंधिया की बजाय महात्मा गॉंधी नाम रखने का बीजेपी विधायक ने दिया था सुझाव। सुनकर भड़के कमलनाथ के मंत्री।
सरकार ने बच्चों को गुमराह करने की यह ‘कोशिश जानबूझकर’ की है। उन्होंने कहा, ‘‘चालाकी से असत्य बताया गया है। मुख्यमंत्री को इस बड़ी भूल के लिए माफी माँगनी चाहिए।’’
याद रहे कि 84 के उलट 48 में भी एक दंगा हुआ था, कॉन्ग्रेसियों ने ही कराया था। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जो हुआ, वो लगभग सबको याद है लेकिन 1948 को भी याद रखना जरूरी है, ताकि कॉन्ग्रेस के असली DNA को पहचाने सकें।