केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने कालेधन के खिलाफ लड़ाई में इसे काफी महत्वपूर्ण कदम बताया है। दोनों देशों के बीच का यह आदान-प्रदान AEOI के तहत होगा। इससे बड़ी-बड़ी 'मछलियों' की काली कमाई का खुलासा होने की उम्मीद है।
आज बांग्लादेशी घुसपैठियों की सबसे बड़ी पैरोकार ममता बनर्जी ने एक समय (2005 में) बांग्लादेशी घुसपैठियों पर चर्चा कराने की माँग को लेकर तत्कालीन लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी पर कागज़ फेंके थे। महीना यही था अगस्त का और तारीख थी चार।
लोकतंत्र के चार खम्भे जब गिनवाए जाते हैं तो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता का नंबर भी आता है। जब पहले तीन से जनता सवाल कर सकती है तो आखिर ऐसा क्यों है कि पत्रकारिता सीजर्स वाइफ की तरह सवालों से बिलकुल परे करार दी जाती है?
"जब तक अपील करने का समय है, तब तक किसी को विदेशी नहीं माना जाएगा। राज्य सरकार कानूनी समर्थन का विस्तार करेगी। सरकार इन लोगों की परेशानियों पर ध्यान देगी और यह देखेगी कि उनका किसी तरह का उत्पीड़न न हो।"
दीनी तालीम के नाम पर चल रहे मदरसों में गरीब लोग इस उम्मीद से अपने बच्चे भेज रहे कि वह बड़ा होकर इमाम बनेगा। पर मौलवी उनसे भीख मॅंगवा रहे। पैसा लेकर नहीं आने पर पीटते हैं। गुलामों की तरह रह रहे मदरसों के एक लाख बच्चों को मौलवियों से बचाएगा कौन?
रवीश कुमार ने बीजगणित के अध्याय की तरह सब कुछ अब 'मान लिया' है। इससे बड़ी हानि यह है कि वो चाहते हैं कि उनके इसी 'मान लेने' को बाकी लोग भी मान लें, जबकि उनकी यह बीजगणित एकदम ऊसर है, इससे कुछ भी सृजन नहीं हो सकता है।
दो-चार कठमुल्ले पाकिस्तान का झंडा लेकर सड़क बंद करने खड़े तो हो गए, लेकिन उनकी कोई सुन ही नहीं रहा था। यहाँ तक कि सामने से आ रहीं गाड़ियों के न रुकने पर वे खुद कुचले जाने से बचने के लिए इधर-उधर सरकते नज़र आए।
"यदि सिंधिया को मध्य प्रदेश की राजनीति से दूर किया गया तो 500 कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली के 10 जनपद स्थित कॉन्ग्रेस कार्यालय जाकर प्रदर्शन करेंगे और फिर भी अगर बात नहीं मानी गई तो सामूहिक रूप से अपने पदों से इस्तीफ़ा दे देंगे।"
2 मिनट 17 सेकंड के इस वीडियो को गौर से देखिए - एक सिख लड़की और समुदाय विशेष के लड़के के निक़ाह का है यह वीडियो। क्या यह लड़की वैसे ही खुश है, जैसे हर लड़की अपनी शादी के दिन खुश होती है! क्या यह लड़की जो बोल रही है, वो सारे शब्द उसके हैं? देखिए और सोचिए!
यौन शोषण के ज्यादातर मामले मौलवियों के खौफ में दबा दिए जाते हैं। जो मामले सामने आते हैं उनमें भी पीड़िताओं के साथ नुसरत जैसी घटना अंजाम दी जाती है। आखिर क्यों कभी धर्म तो कभी तुष्टिकरण के नाम पर आरोपी मौलवियों के कुकर्म धुल जाते हैं?