लंदन में अंडे खा चुके शेख रशीद ऐसे बयान देते ही रहते हैं जिससे उनका मजाक बने। उनका दावा है कि फ़ौज ने अपनी तैयारियों पर बयान देने के उन्हें रखा हुआ है। आधिकारिक रूप से यह काम आसिफ गफूर का है जो आजकल बॉलीवुड पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
तीन तलाक को जुर्म बनाने वाले मोदी सरकार के बिल का समर्थन करने वाले खान ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया था। इस मामले में राजीव गॉंधी की सरकार ने मुस्लिम नेताओं के दबाव में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कानून संसद से पास करवाया था।
भगवा आतंकवाद की थ्योरी गढ़ने वाले दिग्विजय सिंह ने इससे पहले कहा था कि जितने भी हिंदू आतंकी पकड़े गए हैं वे आरएसएस से जुड़े हैं। उन्होंने कहा था कि हिंदू आतंकवादी संघ से आते हैं, क्योंकि संघ की विचारधारा नफरत फैलाने वाली है।
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने कालेधन के खिलाफ लड़ाई में इसे काफी महत्वपूर्ण कदम बताया है। दोनों देशों के बीच का यह आदान-प्रदान AEOI के तहत होगा। इससे बड़ी-बड़ी 'मछलियों' की काली कमाई का खुलासा होने की उम्मीद है।
आज बांग्लादेशी घुसपैठियों की सबसे बड़ी पैरोकार ममता बनर्जी ने एक समय (2005 में) बांग्लादेशी घुसपैठियों पर चर्चा कराने की माँग को लेकर तत्कालीन लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी पर कागज़ फेंके थे। महीना यही था अगस्त का और तारीख थी चार।
लोकतंत्र के चार खम्भे जब गिनवाए जाते हैं तो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता का नंबर भी आता है। जब पहले तीन से जनता सवाल कर सकती है तो आखिर ऐसा क्यों है कि पत्रकारिता सीजर्स वाइफ की तरह सवालों से बिलकुल परे करार दी जाती है?
"जब तक अपील करने का समय है, तब तक किसी को विदेशी नहीं माना जाएगा। राज्य सरकार कानूनी समर्थन का विस्तार करेगी। सरकार इन लोगों की परेशानियों पर ध्यान देगी और यह देखेगी कि उनका किसी तरह का उत्पीड़न न हो।"
दीनी तालीम के नाम पर चल रहे मदरसों में गरीब लोग इस उम्मीद से अपने बच्चे भेज रहे कि वह बड़ा होकर इमाम बनेगा। पर मौलवी उनसे भीख मॅंगवा रहे। पैसा लेकर नहीं आने पर पीटते हैं। गुलामों की तरह रह रहे मदरसों के एक लाख बच्चों को मौलवियों से बचाएगा कौन?
रवीश कुमार ने बीजगणित के अध्याय की तरह सब कुछ अब 'मान लिया' है। इससे बड़ी हानि यह है कि वो चाहते हैं कि उनके इसी 'मान लेने' को बाकी लोग भी मान लें, जबकि उनकी यह बीजगणित एकदम ऊसर है, इससे कुछ भी सृजन नहीं हो सकता है।
दो-चार कठमुल्ले पाकिस्तान का झंडा लेकर सड़क बंद करने खड़े तो हो गए, लेकिन उनकी कोई सुन ही नहीं रहा था। यहाँ तक कि सामने से आ रहीं गाड़ियों के न रुकने पर वे खुद कुचले जाने से बचने के लिए इधर-उधर सरकते नज़र आए।