रवीश आज भी नेहरू-इंदिरा के अहंकार के उस दौर से आतंकित हैं, जब मनचाहे तरीकों से सत्ता, समाज और संस्थाओं को अपने नियंत्रण में रखा करती थी। लप्रेकी रवीश इस नींद से जागना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें 'दंगा साहित्य' पसंद है।
इस कलाकार के इरादे इस दिशा में तब और मजबूत हुए, जब 19 जनवरी को उन्होंने कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार पर 30 साल बीत जाने पर भी लोगों को चुप देखा।
प्रसार भारती की भूतपूर्व अध्यक्ष और पत्रकार मृणाल पांडे ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम 'बंदर' से भी जोड़ दिया है। उनका कहना है कि गुजराती में पोर्ट को बन्दर कहते हैं।
वीर सावरकर ने एक बार लंदन में लेनिन को 3 दिन तक शरण दी थी। कम्युनिस्ट यह स्वीकार नहीं कर पाते कि सावरकर को कई प्रमुख वामपंथियों ने वीर कहने का साहस किया था।
इस बार निशाने पर "भारत" शब्द है। इसके पीछे जो कारण दिया गया है वह है 'भारत ' का एक संस्कृत शब्द होना और 'इंडिया' के लिए भारतीय भाषाओं में 'भारत' का उपयोग किया जाना।
कुछ दिन पहले ही शेहला ने ट्वीट के जरिए नरेन्द्र मोदी के समर्थन में चंद शब्द लिखे थे, लेकिन अब ऐसे ट्वीट्स की मात्रा बढ़ती जा रही है, जिसने लिबरल्स की परेशानियाँ बढ़ा दी हैं।
विचारधारा के आधार पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। इसके कारण संपादकीय टीम में एक डर का माहौल है। जो लोग भी बीजेपी के समर्थक समझे जाते हैं उनमें से ज़्यादातर ने सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखना बंद कर दिया है। जबकि वामपंथी, कॉन्ग्रेसी और आम आदमी पार्टी समर्थक माने जाने वालों पर ऐसी कोई पाबंदी लागू नहीं है।