प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जम्मू और कश्मीर के पैकेज के तहत, 30,000 से अधिक कश्मीरी पंडितों ने लगभग 2,000 पुन: आवंटित सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन किया है।
डेढ़ साल की थीं भाषा सुंबली जब अपनी माँ की गोद में रहते हुए उन्हें कश्मीर घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। 19 जनवरी 1990 की उस भयावह रात को अब 31 साल बीत गए हैं।
आरती टिकू सिंह ने अपनी आँखों से कश्मीरी पंडितों के पलायन का खौफनाक मंजर देखा है। उनसे ही सुनिए उनके अनुभव। जानिए कैसे मीडिया ने पीड़ितों को ही विलेन बना दिया।
“आज कश्मीरी पंडित नरसंहार के 31 साल पूरे हो गए हैं। मैं चाहता हूँ कि मैं अपनी मातृभूमि, कश्मीर वापस जाऊँ, जहाँ मुझे अपनी न्यायिक प्रणाली की मृत्यु के बारे में पढ़ने के लिए इंटरनेट नहीं होगा।”
बॉब सरोया ने जनवरी, 1990 में इस्लामी आतंकवादियों द्वारा कश्मीर की हिन्दू आबादी के नरसंहार की निंदा की और PM मोदी द्वारा उनके पुनर्वास के लिए किए जा रहे प्रयासों का समर्थन किया है।