"भेन मायावती तो सुषमा स्वराज के बाद देश की दूसरी सबसे ग़जब की वक्ता हैं हीं, इसलिए उनकी बातेंऊँ सारी सही हैं, लेकिन एक सही बात आज हमहूँ कहि दे रहे हैं, चाहें तो लिख कें ले लेओ कि दुनिया इतें की वितें हे जाय, आवेगो तो मोदीअई"
इस सवाल का जवाब कॉन्ग्रेस बखूबी जानती है कि मोदी ने जिस कुशलता के साथ अपने कार्यकाल को पूरा किया है, वो कॉन्ग्रेस से 70 सालों में नहीं हो सका। राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी का गिरता स्तर पता नहीं कब क्या नया बखेड़ा खड़ा कर दे, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड और एस्सार स्टील इंडिया लिमिटेड जैसे बड़े 12 मामलों में से कुछ रिज़ॉल्यूशन के उन्नत चरणों में हैं और इस वित्तीय वर्ष में हल होने की संभावना है, जिसमें लगभग 70,000 करोड़ रुपए प्राप्त होने की उम्मीद है।
मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए कॉन्ग्रेस अकेले मैदान में नहीं रही बल्कि उसने अपने गोदी मीडिया, सस्ते कॉमेडियन्स, न्यूट्रल पत्रकारों के गिरोह और अवार्ड वापसी गैंग जैसी घातक टुकड़ियों को भी इस प्रक्रिया में एड़ी-छोटी का जोर लगाने पर मजबूर किया।
एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में शीला दीक्षित ने स्वीकार करते हुए कहा कि मनमोहन सिंह आतंकवाद से लड़ने में उतने कठोर नहीं थे, जितने कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।
नरेंद्र मोदी बनारस लोकसभा क्षेत्र से 56.37% और वडोदरा से 72.75% मत पाकर विजयी हुए। साथ ही गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल में भारतीय जनता पार्टी के सभी उम्मीदवार 50% से अधिक मत पाकर जीते। मतदाताओं में चुनाव को लेकर जागरूकता आई है।
जिन्हे विपक्षी तानाशाह कहते हैं, उन्होंने छोटे से छोटे दलों को भी गले लगाया, गठबंधन बचाया, नया गठबंधन बनाया। जो मंचों से एकता का नारा देते फिरते हैं, वे ही एक-दूसरे के साथ गठबंधन नहीं कर पाए। राजग आज भी समावेशी है।
माहौल ऐसा बने कि वोट नहीं कर पाने पर व्यक्ति को पश्चाताप हो। फिर कभी देश में कुछ भी गलत दिखे तो व्यक्ति अपने आप को उसके लिए जिम्मेदार माने और सोचे कि यदि मैं उस दिन वोट करने गया होता तो ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा नहीं होती।