मोदी सरकार ने नक्सलवाद को खत्म करने के लिए देशभर में अब तक का सबसे बड़ा अभियान शुरू किया है। गृह मंत्री अमित शाह ने कई बार कहा है कि 31 मार्च 2026 तक भारत को पूरी तरह से नक्सलवाद से मुक्त कर दिया जाएगा।
सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई से नक्सलियों की संख्या और उनके शीर्ष नेतृत्व में बड़ी कमी आई है। इसके साथ ही कई नक्सली सरकार की नो-टॉलरेंस पॉलिसी और विकास कार्यों से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण भी कर चुके हैं।
इसी बीच नक्सली संगठन के भीतर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। तेलंगाना खुफिया विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, माओवादी पार्टी के दो गुट इस बात को लेकर आपस में भिड़े हुए हैं कि क्या हथियार छोड़कर समाज में शामिल होना चाहिए या फिर ‘सशस्त्र संघर्ष’ को जारी रखना चाहिए।
यह विवाद दो बड़े नेताओं के बीच है। मल्लोजुला वेंगुपाल राव उर्फ सोनू पार्टी का वैचारिक नेता है और वह आत्मसमर्पण करने और मुख्यधारा में लौटने के पक्ष में है। वहीं सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का महासचिव थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवुजी अब भी लड़ाई जारी रखना चाहता है। देवुजी तेलंगाना के जगतियाल का रहने वाला है जबकि सोनू पेद्दापल्ली से है। दोनों पर 1-1 करोड़ रुपए का इनाम घोषित है।
जहाँ एक तरफ मोदी सरकार नक्सलवाद के खात्मे का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ नक्सली संगठन के भीतर भी आत्मसमर्पण और हथियार छोड़ने को लेकर खींचतान बढ़ती जा रही है।
तीन पत्रों से महत्वपूर्ण विभाजन का चला पता
नक्सली संगठन के भीतर मतभेद की असली तस्वीर हाल ही में सामने आई तीन चिट्ठियों से उजागर हुई है। पहली चिट्ठी सोनू ने 15 अगस्त को लिखी थी, जो 17 सितंबर को सार्वजनिक हुई। इसमें सोनू ने केंद्र सरकार से शांति वार्ता की इच्छा जताते हुए कहा कि पार्टी अस्थायी रूप से हथियार डालने के लिए तैयार है।
उसने यह भी बताया कि पार्टी के पूर्व महासचिव बसवराजू भी हथियार छोड़ने के पक्ष में थे। बसवराजू पर 1.5 करोड़ रुपए का इनाम था और मई महीने में छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबुझमाड़ इलाके में 26 अन्य नक्सलियों के साथ एक बड़े ऑपरेशन में मारा गया था।
सोनू की चिट्ठी में लिखा था, “बदलते वैश्विक और राष्ट्रीय हालातों को देखते हुए और प्रधानमंत्री, गृह मंत्री व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की अपील को मानते हुए हम हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल होने के लिए तैयार हैं।”
इसके जवाब में 19 सितंबर को माओवादी पार्टी की तेलंगाना राज्य समिति ने दूसरी चिट्ठी जारी की। इसमें प्रवक्ता जगन ने साफ किया कि सोनू की यह राय सिर्फ उनकी निजी सोच है। इसके बाद पार्टी की सेंट्रल कमेटी, पोलित ब्यूरो और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी की ओर से तीसरी चिट्ठी जारी की गई। इसमें सोनू के रुख को ‘देशद्रोह’ करार दिया गया और कहा गया कि पूरी तरह से आत्मसमर्पण करना हमारी नीति नहीं है।
इस चिट्ठी में आगे लिखा गया, “बदलते अंतरराष्ट्रीय और घरेलू हालात इस बात का संकेत नहीं देते कि सशस्त्र संघर्ष को छोड़ दिया जाए। बल्कि यह परिस्थितियाँ साबित करती हैं कि सशस्त्र संघर्ष को जारी रखना और भी जरूरी है।”
आधिकारिक सूत्रों ने कहा- ‘दो गुटों के आपसी संघर्ष’
खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों का कहना है कि नक्सली संगठन के भीतर जारी चिट्ठियों से पार्टी की असली स्थिति साफ हो रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “ये चिट्ठियाँ पार्टी के भीतर चल रही ‘दो गुटों के आपसी संघर्ष’ को दिखाती हैं। एक धड़ा कह रहा है कि अब हथियार डालने का समय है, जबकि दूसरा कह रहा है कि और जोश से लड़ाई जारी रखनी चाहिए।” अधिकारी के मुताबिक, केंद्रीय समिति की ओर से आई चिट्ठी दरअसल देवुजी की मर्जी से जारी हुई है, जिसमें सशस्त्र संघर्ष जारी रखने का समर्थन किया गया।
सूत्रों के अनुसार, संगठन के भीतर यह टकराव पिछले 12 महीनों से चल रहा है। एक साल पहले सोनू की पत्नी तारक्का ने महाराष्ट्र में आत्मसमर्पण कर दिया था और सितंबर में उसके भाई किशनजी की पत्नी पी पद्मावती ने भी तेलंगाना में हथियार डाल दिए। 2024 में पार्टी की पोलित ब्यूरो की ओर से जारी एक नोट में भी यह स्वीकार किया गया था कि संगठन कमजोर हो रहा है और उसे पीछे हटने पर विचार करना चाहिए।
एक अन्य अधिकारी ने कहा “पार्टी का एक धड़ा, जो वैचारिक रूप से मजबूत माना जाता है, आत्मसमर्पण कर लोकतांत्रिक रास्ता अपनाने पर विचार कर रहा है। वहीं दूसरा धड़ा लगातार सशस्त्र संघर्ष का समर्थन कर रहा है।” उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पहले कई सशस्त्र संगठन लोकतांत्रिक रास्ता अपना चुके हैं, जिनमें सबसे बड़ा उदाहरण भाकपा (माले) है।
यह आंतरिक विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब सुरक्षा बल नक्सलियों के खिलाफ अभियान और तेज कर चुके हैं। कभी 19 सदस्यीय रही केंद्रीय समिति अब घटकर सिर्फ 10 सदस्यों तक रह गई है। एक अधिकारी ने स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, “संगठन संकट में है और इसके दो धड़े इस संकट का सामना अलग-अलग तरीकों से कर रहे हैं।”
वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध
केंद्र सरकार की सख़्त कार्रवाई के बाद नक्सलवाद को बड़ा झटका लगा है। जनवरी 2024 में मोदी सरकार ने ‘ऑपरेशन कागर’ शुरू किया, जो नक्सलवाद पर ज़ीरो टॉलरेंस नीति का हिस्सा है। इस अभियान के तहत सुरक्षा बलों ने नक्सल गढ़ों को तोड़ने के लिए बड़े स्तर पर सैन्य अभियान चलाए, केंद्र और राज्य की सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाया और विकास कार्यों को भी तेज किया।
इन प्रयासों का असर यह हुआ कि जो इलाके कभी माओवादी हिंसा के बड़े केंद्र थे, वहाँ अब विकास लौट रहा है और लोग मुख्यधारा से फिर से जुड़ रहे हैं। कई नक्सली भी अब अपनी जान बचाने और आंदोलन के पूरी तरह खत्म होने के डर से सरकार से बातचीत की माँग कर रहे हैं।
सीपीआई (माओवादी) के दो गुटों के बीच जारी टकराव भी इस बात का संकेत है कि संगठन के बड़े नेता खुद भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। कई नेता अब आत्मसमर्पण के पक्ष में हैं, जिससे पार्टी के भीतर गहरा संकट और वैचारिक कमजोरी साफ दिख रही है।
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी लगातार घट रही है। 2015 में 10 राज्यों के लगभग 106 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे। यह संख्या पहले घटकर 38 हुई और 2024 में केवल 18 जिले रह गए। इनमें भी 12 जिले सबसे ज्यादा प्रभावित थे, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 6 रह गए हैं। यह सरकार और सुरक्षा बलों की रणनीति और प्रयासों की बड़ी सफलता मानी जा रही है।
वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध
केंद्र सरकार की सख़्त कार्रवाई के बाद नक्सलवाद को बड़ा झटका लगा है। जनवरी 2024 में मोदी सरकार ने ‘ऑपरेशन कागर’ शुरू किया, जो नक्सलवाद पर ज़ीरो टॉलरेंस नीति का हिस्सा है। इस अभियान के तहत सुरक्षा बलों ने नक्सल गढ़ों को तोड़ने के लिए बड़े स्तर पर सैन्य अभियान चलाए, केंद्र और राज्य की सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाया और विकास कार्यों को भी तेज किया।
इन प्रयासों का असर यह हुआ कि जो इलाके कभी माओवादी हिंसा के बड़े केंद्र थे, वहाँ अब विकास लौट रहा है और लोग मुख्यधारा से फिर से जुड़ रहे हैं। कई नक्सली भी अब अपनी जान बचाने और आंदोलन के पूरी तरह खत्म होने के डर से सरकार से बातचीत की माँग कर रहे हैं।
सीपीआई (माओवादी) के दो गुटों के बीच जारी टकराव भी इस बात का संकेत है कि संगठन के बड़े नेता खुद भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। कई नेता अब आत्मसमर्पण के पक्ष में हैं, जिससे पार्टी के भीतर गहरा संकट और वैचारिक कमजोरी साफ दिख रही है।
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी लगातार घट रही है। 2015 में 10 राज्यों के लगभग 106 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे। यह संख्या पहले घटकर 38 हुई और 2024 में केवल 18 जिले रह गए। इनमें भी 12 जिले सबसे ज्यादा प्रभावित थे, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 6 रह गए हैं। यह सरकार और सुरक्षा बलों की रणनीति और प्रयासों की बड़ी सफलता मानी जा रही है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)


