बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भारत केवल स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं लड़ रहा था बल्कि एक गहरी वैचारिक जंग भी उसके भीतर आकार ले रही थी। यह जंग थी स्वाधीनता के बाद के भारत को परिभाषित करने की। इसके दो ध्रुव थे- एक तरफ था कि क्या भारत सभ्यता की जड़ों, सांस्कृति की निरंतरता और समाज को केंद्र में रखने वाली सोच के साथ आगे जाएगा तो वहीं, दूसरी तरफ था कि क्या भारत पश्चिम या अन्य देशों से आयातित एक वैचारिक फ्रेमवर्क के सहारे खुद को नई तरह में गढ़ेगा। इसी संघर्ष के दो प्रमुख ध्रुव बने- वामपंथ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)।
विचारधारा की लड़ाई कोई दिन, महीनों या कुछ वर्षों की नहीं होती बल्कि इसमें दशकों लगते हैं, सैकड़ों साल तक यह जंग चलती रहती है। आज हम 21वीं सदी के शुरुआती दशकों में हैं और RSS व CPI की स्थापना के 100 वर्ष हो गए हैं। सौ वर्षों के इस वैचारिक टकराव में आज स्थिति यह है कि वामपंथ भारत में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर हाशिये पर सिमटता दिख रहा है जबकि RSS समाज के लगभग हर तबके, हर शहर-गाँव तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। RSS की यह ताकत और वामपंथ की कमजोरी आकस्मिक नहीं बल्कि कई कारणों का परिणाम है जिसकी चर्चा हम इस लेख में करेंगे।
आयातित विचारधारा और मजबूत सांस्कृतिक शुरुआत: शुरुआती दिनों में CPI और RSS
वामपंथ का मूल समझे जाने वालीं मार्क्सवाद, लेनिनवाद जैसी धाराएँ यूरोप और रूस के औद्योगिक-सामाजिक संदर्भों से निकली थीं। भारत के लिए यह आयातित विचार था। वैसे तो 1920 में एम.एन. रॉय, मोहम्मद अली, एम.पी.टी. आचार्य जैसे लोगों ने देश से बाहर थे ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नींव रखी। बाद में 1925 में कानपुर में एक सम्मेलन हुआ, जहाँ भारत के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे कम्युनिस्ट संगठन एक साथ आए और CPI को औपचारिक रूप मिला। अब वही इसका स्थापना दिवस माना जाता है।
वामपंथी विचारधारा उस समय आकर्षक लगी क्योंकि वह शोषण और असमानता के खिलाफ कड़ी बात करती थी। लेकिन इसकी एक बड़ी सीमा यह रही कि इसने भारतीय समाज को केवल ‘अमीर-गरीब’ या ‘वर्ग’ के नजरिये से देखा जबकि भारत का समाज परंपरा, धर्म, जाति और संस्कृति से मिलकर बना एक जटिल ढाँचा है।
इसी दौर में 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। RSS का उद्देश्य सत्ता पाना नहीं बल्कि समाज को मजबूत बनाना था। उसने राष्ट्र को सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई माना। संघ ने ऊपर से विचार थोपने के बजाय समाज के बीच जाकर काम करने का रास्ता चुना।
1925 से अबत तक संघ की असली ताकत उसकी तीन बातों में है- शाखा, प्रचारक और गुरु दक्षिणा। शाखा में रोज की गतिविधियों से अनुशासन और चरित्र का निर्माण होता है। प्रचारक अपना निजी जीवन त्यागकर संगठन को गाँव-गाँव तक ले जाते हैं। गुरु दक्षिणा से संघ आत्मनिर्भर रहता है और किसी बाहरी दबाव पर निर्भर नहीं होता। इन्हीं तीनों ने मिलकर RSS को सिर्फ एक विचार नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा का जीवंत आंदोलन बनाया।
वामपंथी पार्टी में टूट और RSS का विस्तार
आजादी के बाद का शुरुआती समय वामपंथ के लिए राजनीतिक मजबूती जैसा था तो वहीं RSS के लिए यह मुश्किल की घड़ी थी। 1951-52 के पहले आम चुनाव में कॉन्ग्रेस के बाद CPI दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा तो वहीं RSS पर महात्मा गाँधी की हत्या के आरोप लगाकर उसपर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई। हालाँकि, इस लड़ाई में संघ तपकर और निखरा और मजबूती के साथ देश सेवा में जुटा रहा।
1957 में केरल में वामपंथी सरकार बनने के बाद CPI बेशक मजबूत दिख रही थी लेकिन 1950–60 के दशक में अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन में सोवियत संघ और चीन के बीच बढ़ते मतभेदों का असर भारत पर भी पड़ा। 1964 में इसी वैचारिक टकराव के चलते CPI से अलग होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) CPI(M) बनी। 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन ने सशस्त्र क्रांति की राह अपनाने वाले धड़े को जन्म दिया। 1969 में CPI (मार्क्सवादी–लेनिनवादी) बनी, जिससे आगे चलकर कई नक्सली संगठन बने। अंततः 2004 में CPI (माओवादी) का गठन हुआ।
वामपंथ का आंदोलन जहाँ टूटने लगा था, वहीं RSS ने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को केंद्र में रखकर लंबी दूरी की योजना बनाई थी। RSS ने सीधे राजनीतिक दल के रूप में काम करने के बजाय समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग संगठन खड़े किए। 1948 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) छात्रों के लिए बनी। 1955 में भारतीय मजदूर संघ (BMS) ने श्रमिक वर्ग में काम शुरू किया। इसी तरह विद्या भारती (शिक्षा), विश्व हिंदू परिषद (धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र), सेवा भारती (सेवा कार्य) जैसे संगठन बनते गए। ‘आनुषांगिक मॉडल’ से संघ विस्तार करता रहा।
भारत की संस्कृति: दो ध्रुवों पर खड़े RSS और वामपंथ
वामपंथ की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि उसने भारत को कभी समझने की ईमानदार कोशिश ही नहीं की। उसका वैचारिक जन्म यूरोप की फैक्ट्रियों, वहाँ के मजदूर संघर्ष और चर्च बनाम राज्य की लड़ाई से हुआ था। वामपंथियों के वैचारिक बाप कार्ल मार्क्स ने 19वीं सदी में धर्म को ‘जनता के लिए अफीम’ कहा तो भारत में भी वामपंथियों ने वही मान लिया। भारत में धर्म कभी सिर्फ पूजा-पाठ नहीं रहा। यहाँ धर्म जीवन का तरीका है, संस्कार है, समाज को जोड़ने वाली डोर है। वामपंथ ने यह फर्क कभी समझा ही नहीं और बिना सोचे-समझे वही विदेशी चश्मा भारत की आँखों पर चढ़ाने की कोशिश की।
यहीं से वामपंथ भारत से कटना शुरू हुआ। उसने मंदिर, त्योहार, परंपरा, राष्ट्रभाव- सबको शक की नजर से देखा। कभी कहा कि ये शोषण के औजार हैं, कभी कहा कि ये पिछड़ेपन की निशानी हैं। होली, दीवाली, राम, कृष्ण, गीता ये सब वामपंथ के लिए या तो ‘मिथ’ थे या ‘अफीम’। सवाल यह है कि जो चीजें करोड़ों लोगों को जोड़ती हैं अगर उन्हें आप लगातार गाली देंगे, तो लोग आपसे जुड़ेंगे या दूर भागेंगे?
इसके उलट RSS ने वो रास्ता लिया जो भारत को जैसा है, वैसा ही स्वीकार करता है। संघ ने संस्कृति को बोझ नहीं, ताकत माना और उसने परंपरा को साथ लेकर आगे बढ़ता गया। RSS ने हिंदू त्यौहारों को शाखाओं पर भी मनाया। जहाँ वामपंथ को भारत की पहचान से समस्या थी तो वहीं RSS ने उसी पहचान को समाधान माना। वामपंथ के लिए धर्म और राष्ट्र सब संदेह के घेरे में रहे तो RSS ने उन्हीं के सहारे लोगों को एकजुट किया।
हिंसा VS सेवा: वामपंथ VS RSS
हिंसा का प्रश्न इस वैचारिक जंग का एक अहम पहलू रहा है। वामपंथी आंदोलनों का एक बड़ा हिस्सा सशस्त्र संघर्ष और क्रांति की अवधारणा से जुड़ा रहा। नक्सलवाद इसका चरम उदाहरण है, जहाँ ‘देश के खिलाफ युद्ध’ को वैध ठहराया गया। इसके चलते जनजातीय क्षेत्रों में विकास रुक गया, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ प्रभावित हुईं और आम नागरिक हिंसा के बीच पिसता रहा। वामपंथियों के हमलों में सैकड़ों सुरक्षाबलों के जवान मारे गए।
केरल में वामपंथियों ने RSS के कार्यकर्ताओं तक को निशाना बना गया। वैचारिक युद्ध को हत्याओं तक पहुँचा दिया गया, स्वयंसेवकों को मारा-पीटा गया। इसके उदाहरण के तौर पर सदानंदन मास्टर जैसे स्वयंसेवक हैं। कम्युनिस्टों ने 1994 में उनके पैर काट दिए और अब उन्हें राष्ट्रपति ने राज्यसभा के सांसद के तौर पर मनोनीत किया है।
इसके उलट RSS ने सैद्धांतिक रूप से हिंसा को संगठनात्मक साधन के रूप में स्वीकार नहीं किया। 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध और लगातार आलोचनाओं के बावजूद RSS ने स्वयं को सामाजिक कार्यों, आपदा राहत, शिक्षा और सेवा के माध्यम से स्थापित किया। इससे उसकी छवि एक ‘ग्रासरूट’ संगठन की बनी, ना कि केवल विरोध की राजनीति करने वाले समूह की।
RSS देश के दूर-दराज और उपेक्षित इलाकों में सेवा कार्यों के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में बदलाव ला रहा है। वनवासी कल्याण आश्रम से लेकर सेवा भारती जैसे दर्जनों संगठन अपने-अपने तरीके से सेवा कार्यों में जुटे हैं। वनवासी कल्याण आश्रम देशभर में 20,000 से अधिक एकल विद्यालय चला रही है, जिनके माध्यम से लगभग 30 लाख आदिवासी बच्चों को बुनियादी शिक्षा मिल रही है। एकल विद्यालय की व्यवस्था सरल लेकिन प्रभावशाली है, जहाँ एक ही शिक्षक पूरे गाँव के बच्चों को पढ़ाता है।
वहीं, सेवा भारती जैसे संगठन शहरों और गाँवों दोनों में गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए काम कर रहे हैं- चाहे वह स्वास्थ्य शिविर हों, आपदा के समय राहत पहुँचाना हो या महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना। ऐसे ही प्रयासों के जरिए आरएसएस से प्रेरित करीब 1.6 लाख से अधिक सेवा प्रकल्प देशभर में चल रहे हैं, जहां स्वयंसेवक बिना किसी स्वार्थ के समाज को जोड़ने और राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहे हैं। ये काम किसी विदेशी फंड या बड़े प्रचार के सहारे नहीं बल्कि लाखों स्वयंसेवकों के त्याग और समाज की भागीदारी से चल रहे हैं। RSS ने सेवा को समाज को स्थायी रूप से सशक्त करने का माध्यम मान लिया है।
वामपंथी शासन की विफलता वैचारिक पतन की बड़ी वजह
करीब दो दशक पहले तक भारतीय राजनीति में वामपंथी दल एक निर्णायक ताकत माने जाते थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट पार्टियों ने कुल 59 सीटें जीती थीं और केंद्र की सत्ता में उनकी भूमिका इतनी प्रभावी थी कि UPA सरकार बाहर से उनके समर्थन पर टिकी थी। इसके बाद शुरू हुआ पतन अब लगभग अस्तित्व के संकट तक पहुँच चुका है।
2004 में 59 सीटों से शुरू हुआ लेफ्ट का सफर 2009 में सिमटकर 24 सीटों पर आ गया। 2014 में यह संख्या घटकर सिर्फ 10 रह गई और 2019 में तो वामपंथ महज 5 लोकसभा सीटों तक सीमित हो गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भले ही कुल सीटों की संख्या थोड़ी बढ़ी हो लेकिन यह बढ़त भी राजनीतिक तौर पर रसातल में जाने का संकेत ही है। इनमें वामपंथी पार्टियों को 8 सीटें मिलीं।
राज्यों में भी कमोबेश स्थिति यही है। वामपंथी शासन की विफलताओं का सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिम बंगाल है। CPI(M) ने 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक राज्य की सत्ता संभाली। इतनी लंबी अवधि किसी भी दल को एक मजबूत विकास मॉडल खड़ा करने का अवसर देती है लेकिन बंगाल में उलटा हुआ। इस दौर में राज्य से उद्योग पलायन करता गया, कृषि विकास की रफ्तार थम गई और गरीबों की स्थिति देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में और बदतर हो गई। स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई, भ्रष्टाचार बढ़ा और राजनीतिक हिंसा आम होती चली गई। नतीजा यह हुआ कि 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से बाहर कर दिया। आज बंगाल में पार्टी लगभग अप्रासंगिक हो चुकी है।
कुछ ऐसा ही हाल त्रिपुरा में देखने को मिला। यहाँ वामपंथी दल 1993 से 2018 तक यानी 25 साल तक सत्ता में रहे। लंबे शासन के बावजूद वे जनता की नई आकांक्षाओं के साथ खुद को ढाल नहीं सके। एंटी-इनकंबेंसी, संगठनात्मक जड़ता और बदलते राजनीतिक माहौल को न समझ पाने की कीमत उन्हें 2018 में चुकानी पड़ी, जब बीजेपी ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया।
आज अगर भारत में वामपंथ का कोई आखिरी मजबूत गढ़ माना जाता है तो वह केरल है। राज्य में फिलहाल वामपंथी सरकार है लेकिन राजनीतिक स्तर पर यहां भी चेतावनी के संकेत साफ हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में पूरे केरल से वामपंथी दलों को सिर्फ एक सीट मिली। 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी गैर-लेफ्ट फ्रंट ने बढ़त बनाई है और पहली बार तिरुवनंतपुरम में बीजेपी का मेयर बना। यह बदलाव बताता है कि जिस केरल को लेफ्ट का अभेद्य किला माना जाता था, वहाँ भी जमीन खिसक रही है।
वामपंथी पार्टियों का पतन सिर्फ चुनावी गणित का मामला नहीं है बल्कि उनके पास कोई ऐसा ठोस विकास मॉडल नहीं है जिसे वे देश के सामने प्रेरणादायक रूप में रख सकें। दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद न बंगाल, न त्रिपुरा और न ही अन्य राज्यों में वे ऐसा आर्थिक और सामाजिक ढाँचा खड़ा कर पाए जिसे उनकी उपलब्धि कहा जा सके। नतीजा यह है कि कभी राष्ट्रीय राजनीति को दिशा देने वाली लेफ्ट पार्टियाँ अब धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई हैं।
बौद्धिक मोर्चे पर भी पिछड़ता वामपंथ
कई दशकों तक भारत के विश्वविद्यालयों, मीडिया और साहित्यिक जगत पर वामपंथी विचारधारा का गहरा असर रहा। JNU हो, दिल्ली यूनिवर्सिटी हो या हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी हो इन जैसे परिसरों में वामपंथी छात्र संगठनों का वर्चस्व था और मीडिया में भी मार्क्सवादी विश्लेषण को ही बौद्धिक मानक माना जाता था। आज यह वामपंथ बौद्धिक विमर्श लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है।
इस गिरावट का एक बड़ा कारण 1991 में सोवियत संघ का पतन रहा। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि भले ही भारत कभी कम्युनिस्ट देश नहीं रहा लेकिन भारतीय वामपंथ वैश्विक कम्युनिज्म से वैचारिक प्रेरणा लेता था। सोवियत संघ के टूटने से उस वैचारिक आधार को गहरा झटका लगा। इसके बाद भी भारतीय लेफ्ट आत्ममंथन करने के बजाय पुरानी भाषा और संरचनाओं में उलझा रहा जिससे नए विचारों का अभाव साफ दिखाई देने लगा।
विश्वविद्यालयों में यह बदलाव और स्पष्ट है। कभी वामपंथी राजनीति के गढ़ माने जाने वाले जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी में अब दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी विचारों का असर बढ़ा है। एक अध्ययन के अनुसार, वामपंथ जाति जैसे जटिल सामाजिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से समझने और संबोधित करने में असफल रहा। वर्ग संघर्ष तक सीमित सोच ने उसे सामाजिक रूप से कमजोर किया और छात्रों के बड़े वर्ग से दूरी बढ़ी।
मीडिया में भी वामपंथी प्रभाव कम हुआ है। भारतीय लेफ्ट संगठनात्मक बिखराव और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। बदलते डिजिटल दौर और नए पाठक वर्ग के साथ तालमेल न बैठा पाना भी उसकी कमजोरी बना है। वामपंथ की इस वैचारिक कमजोरी से जो खाली जगह बनती गई उसे RSS और उससे जुड़े विचारक भरते गए।
RSS और उससे जुड़े विचारकों ने इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रवाद को लेकर एक वैकल्पिक बौद्धिक विमर्श सामने रखा। यह विमर्श केवल वामपंथ के विरोध या प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहा बल्कि हिंदू परंपरा को आधुनिक संदर्भ में समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास रहा है। इसके माध्यम से समाज को जोड़ने और साझा सांस्कृतिक पहचान पर चर्चा को आगे बढ़ाया गया।
इतिहास के क्षेत्र में RSS से जुड़े विचारकों ने वैकल्पिक चर्चाएँ प्रस्तुत कीं, स्कूली किताबों तक में जो नैरेटिव वामपंथी लेखकों द्वारा बनाया गया था उसको क्रमश: तोड़ने की जारी हैं। सही और वैकल्पिक इतिहास छात्रों और समाज के समक्ष लाया जा रहा है। RSS के इतिहास संकलन समिति या अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना जैसे संगठन ‘इतिहास, संस्कृति, परम्परा आदि के क्षेत्र में प्रामाणिक, तथ्यपरक तथा सर्वांगपूर्ण इतिहास-लेखन’ के काम में जुटे हैं। इसे राष्ट्रवाद को पश्चिमी नजरिए से नहीं बल्कि भारतीय दृष्टिकोण से समझने में मदद मिल रही है। संघ से जुड़े सुरुचि जैसे प्रकाशन राष्ट्रवाद और संघ से जुड़ी पुस्तकें लोगों को उपलब्ध करवा रहे हैं। ऐसे कई संगठन हैं जो इसे ध्यान में रखकर बौद्धिक विमर्श की एक जमीन तैयार कर रहे हैं।
संस्कृति के स्तर पर RSS ने ‘अखंड भारत’ जैसी अवधारणाओं को मुख्य विमर्श का हिस्सा बनाया है जिसमें प्राचीन भारत के सांस्कृतिक प्रभाव को दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों तक फैला हुआ बताया गया। इस नजरिए में इतिहास को केवल राजनीतिक घटनाओं से बढ़कर सांस्कृतिक संपर्क, विचारों और परंपराओं के आदान-प्रदान के रूप में देखा गया। जो सीधे तौर पर भारतीय सभ्यता की निरंतरता और व्यापक प्रभाव को दिखाता है। समय के साथ RSS ने खुद को बदला है और डिजिटल युग सोशल मीडिया और नए संचार माध्यमों के जरिए संघ का दृष्टिकोण व्यापक समाज में लोगों तक पहुँचा है।
क्यों हाशिए पर चला गया वामपंथ?
भारत में वामपंथ की वैचारिक और राजनीतिक गिरावट के पीछे उसका मूल दृष्टिकोण एक बड़ा कारण रहा है। वामपंथ की राजनीति का केंद्र हमेशा सत्ता, राज्य और सिस्टम रहा। उसका मानना था कि सरकार और संस्थानों पर नियंत्रण के जरिए समाज को बदला जा सकता है। यही वजह रही कि जैसे-जैसे वामपंथ चुनावों में कमजोर पड़ा, वैसे-वैसे उसका सामाजिक और बौद्धिक प्रभाव भी सिकुड़ता चला गया। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में सत्ता से बाहर होते ही उसका जमीनी आधार तेजी से ढहता दिखा।
इसके उलट, RSS ने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। उसके लिए सत्ता की अनूकुलता एक साधन भर रही। सरकारें बदलीं, राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं लेकिन RSS का संगठन और उसका सामाजिक काम जमीन पर लगातार चलता रहा। यही कारण है कि सत्ता में उतार-चढ़ाव के बावजूद उसका विस्तार रुका नहीं और समाज में उसकी पकड़ बनी रही।
वामपंथ की एक बड़ी वैचारिक कमजोरी यह रही कि उसने खुद को ‘प्रगतिशील’ और जनता को ‘पिछड़ा’ मान लिया। उसने ऊपर से समाज को दिशा देने का रवैया अपनाया। इस सोच ने आम लोगों और वामपंथी नेतृत्व के बीच दूरी पैदा कर दी। वहीं, RSS ने समाज को उपदेश देने के बजाय उसके साथ चलने की रणनीति अपनाई। शाखाओं, सेवा कार्यों और अन्य गतिविधियों के जरिए उसने लोगों से सीधा जुड़ाव बनाया।
समय के साथ वामपंथ का विमर्श आम समाज से खिसकता चला गया। किसान, मजदूर या छोटे कस्बों के युवाओं की भाषा और समस्याएँ उसकी राजनीति और लेखन में कम होती गईं। उसका दायरा विश्वविद्यालयों, अंग्रेजी अखबारों, सेमिनार हॉल और एयर-कंडीशंड बहसों तक सिमट गया। नतीजा यह हुआ कि आम जनता खुद को उस विमर्श से जुड़ा महसूस नहीं कर पाई।
हर चुनावी और वैचारिक असफलता के बाद वामपंथ ने आत्ममंथन करने के बजाय जनता, मीडिया या सिस्टम को दोष देना ज्यादा आसान समझा। इसके उलट, RSS ने समय के साथ जरूरत पड़ने पर अपनी रणनीति, काम करने के तरीके में बदलाव किए लेकिन अपने मूल विचार से समझौता नहीं किया। यही फर्क आज साफ दिखाई देता है।
आज वामपंथ हताश और बिखरा हुआ नजर आता है। वहीं, RSS बिना ज्यादा शोर किए, बिना खुद को इकलौता बुद्धिजीवी घोषित किए लगातार समाज में अपनी जड़ें गहरी करता गया। यही अंतर भारत में वामपंथ की गिरावट और नए सामाजिक-राजनीतिक विमर्श के उभार को समझने की कुंजी है।


