Homeदेश-समाज'स्टेन स्वामी (अर्बन नक्सल) की मूर्ति लग सकती है तो नायकों की क्यों नहीं?':...

‘स्टेन स्वामी (अर्बन नक्सल) की मूर्ति लग सकती है तो नायकों की क्यों नहीं?’: 1000+ अंग्रेजों को धूल चटाने वाले कल्लर योद्धाओं के बनेंगे स्मारक, जानिए मद्रास HC ने फैसले में क्या कहा

अगर ऐसे बदनाम व्यक्ति की मूर्ति लगाने के लिए अनुमति की जरूरत नहीं है, तो देश के स्वतंत्रता संग्राम के एक अहम अध्याय के सम्मान के लिए तो बिल्कुल जरूरत नहीं होनी चाहिए: मद्रास हाई कोर्ट

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने शुक्रवार (26 दिसंबर 2025) को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1755 के नथम कनवै युद्ध (Natham Kanvai Battle) की याद में स्मारक बनाने का रास्ता साफ कर दिया। जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने वकील शिवा कलैमणि अंबलम की याचिका पर यह फैसला दिया।

याचिकाकर्ता थन्नारसु कल्लर नाडु चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी भी हैं। उन्होंने डिंडीगुल जिले के नथम तालुक के पुथुर गाँव में अपनी निजी पट्टा भूमि पर स्तूप बनाने की अनुमति माँगी थी, जिसे तहसीलदार ने पहले खारिज कर दिया था।

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अगर स्टेन स्वामी (अर्बन नक्सल, जिसकी जेल में ही मौत हुई) का स्मारक बनाया जा सकता है, तो आजादी के नायकों का क्यों नहीं? हाई कोर्ट ने साफ कहा कि आजादी के नायकों का स्मारक बनाने के लिए किसी अनुमति की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए।

18वीं सदी के युद्ध से लेकर शतरंज चैंपियनशिप तक: सफलता से और सफलता मिलती है

कोर्ट ने फैसले में कहा, “सफलता के कई पिता होते हैं, जबकि असफलता अनाथ होती है। सफलता आगे और अधिक सफलताओं को जन्म देती है, यह प्रेरणा और उत्साह पैदा करती है तथा परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देती है। इसी कारण सफलता का उत्सव मनाना आवश्यक है।”

कोर्ट ने भारत की शतरंज में अभूतपूर्व उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए एक रोचक तुलना पेश की और चेन्नई को देश की शतरंज राजधानी के रूप में स्थापित किया। कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु से निकलने वाले असाधारण शतरंज खिलाड़ी आज वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु अब इस खेल के कई सुपरस्टार खिलाड़ियों का घर बन चुका है। वर्तमान विश्व चैंपियन गुकेश डोम्माराजू चेन्नई के रहने वाले हैं। इसके अलावा आर प्रज्ञानानंदा, वैशाली रमेशबाबू, प्रणेश, इलमपार्थी, अरविंद चितंबरम जैसे उच्च एलो रेटिंग वाले कई ग्रैंडमास्टर भी इसी राज्य से आते हैं। कोर्ट ने प्रसिद्ध शतरंज ग्रैंडमास्टर आर बी रमेश का भी उल्लेख किया, जिन्होंने चेन्नई में चेस गुरुकुल की स्थापना की और प्रज्ञानानंदा तथा भारत सुब्रमणियम सहित भारत के कई अंतरराष्ट्रीय शतरंज चैंपियनों को तैयार किया।

कोर्ट ने इस सफलता का श्रेय शतरंज की महान हस्ती विश्वनाथन आनंद को देते हुए कहा कि यह सब एक व्यक्ति की जीतों के कारण संभव हो सका। जज ने स्पष्ट किया कि सफलता आगे और अधिक सफलताओं को जन्म देती है, यह प्रेरणा और उत्साह पैदा करती है तथा परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देती है। इसी कारण सफलता का उत्सव मनाना आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि इसी भावना के तहत भारत सरकार हर साल 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाती है, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की जीत का प्रतीक है। कोर्ट के अनुसार, भारत के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहाँ जीत या शत्रु से टकराने के प्रयासों ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया है।

स्वतंत्रता में तमिलनाडु की भूमिका

इसके बाद कोर्ट ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में तमिलनाडु की अहम भूमिका की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ पहला विद्रोह 1857 से भी बहुत पहले इसी धरती से शुरू हुआ था।

कोर्ट ने कहा, “तमिलनाडु का स्वतंत्रता आंदोलन में अद्वितीय योगदान रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में नहीं, बल्कि उससे कहीं पहले तमिल भूमि से शुरू हुआ था। इसके कई उदाहरण दिए जाते हैं। यह कोर्ट इन ऐतिहासिक विवादों में जाने में सक्षम नहीं है, लेकिन यह न्यायिक संज्ञान ले सकती है कि मदुरै क्षेत्र में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर मिली थी।”

कोर्ट ने कहा कि इस संदर्भ में कई नाम याद आते हैं, जिनमें मरुदु बंधु, वेलुनाचियार, पुली थेवर, कट्टाबोम्मन, ऊमैथुरै, वलुक्कुवेली अंबलम सहित अनेक वीर योद्धा शामिल हैं और यह सूची और भी लंबी है। जज ने जोर देकर कहा कि जिन युद्धों में देशी लोगों ने औपनिवेशिक सेना को पराजित किया, उनका उत्सव मनाना उतना ही आवश्यक है, जितना उन वीर सैनिकों के नामों को याद रखना। उन्होंने कहा कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों और भारी कीमत चुकाकर प्राप्त की गई हर जीत को संजोकर रखा जाना चाहिए और शहीदों की स्मृति का सम्मान किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता, जो एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं, उसने ऐसे दस्तावेज और सामग्री प्रस्तुत की है, जिनसे यह सिद्ध होता है कि साल 1755 में नथम दर्रे (नथम कनवै) में मेलूर कल्लरों और अंग्रेजी सेना के बीच एक भीषण संघर्ष हुआ था, जिसमें कल्लर समुदाय की जीत हुई थी।

नाथम कनवई युद्ध और कल्लार समुदाय

इसके बाद कोर्ट ने नथम कनवै युद्ध के इतिहास को सामने रखते हुए बताया कि थिरुमोगुर (कोइलकुडी) मंदिर की पीतल की मूर्तियाँ अंग्रेज सैनिकों द्वारा लूट ली गई थीं। इन मूर्तियों को कर्नल अलेक्जेंडर हेरॉन के नेतृत्व में ले जाया जा रहा था और यह दल नथम कनवै दर्रे को पार करने वाला था। इसी दौरान कल्लर समुदाय के लोग बड़ी संख्या में एकत्र हुए और पवित्र मूर्तियों को वापस हासिल करने के लिए हेरॉन तथा उसकी सेना पर हमला कर दिया।

कोर्ट के अनुसार इस संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, लेकिन इसके बावजूद कल्लर समुदाय सभी मूर्तियों को सुरक्षित रूप से वापस लेने में सफल रहा। बताया गया कि इस लड़ाई के बाद केवल करीब 30 सिपाही ही जीवित बचे, जो कर्नल हेरॉन के साथ त्रिचिरापल्ली लौट पाए।

जज ने कल्लर समुदाय की योद्धा परंपरा पर भी प्रकाश डाला और उनकी तुलना राजपूतों तथा गोरखाओं से की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंग्रेजों ने जानबूझकर इस समुदाय को अपराधी जनजाति के रूप में चिन्हित किया और उनके खिलाफ अत्याचार किए।

कोर्ट ने कहा, “कल्लर समुदाय की पृष्ठभूमि एक युद्धक समुदाय की रही है। उनकी तुलना गोरखाओं और राजपूतों से की जा सकती है। इसी कारण अंग्रेजों ने उन्हें ‘अपराधी जनजाति’ करार दिया। इस समुदाय ने दशकों तक दमन और असहनीय कठिनाइयों को झेला, जब तक कि महान नेता पासुम्पोन मुथुरामलिंगा थेवर ने उन्हें इस कलंक से मुक्त नहीं कराया।”

ऐतिहासिक घटनाओं को याद करने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं है

कोर्ट ने कहा कि यह याचिका निस्संदेह विलंब से दायर की गई है, लेकिन इस मामले में लेचेस (यानी अनुचित देरी के कारण दावा खारिज किए जाने का सिद्धांत) को लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया, “जब तक विवादित मेमो प्रभावी है, तब तक याचिकाकर्ता याचिका में उल्लेखित स्थल पर स्तूप स्थापित नहीं कर सकता। इसलिए केवल देरी के आधार पर याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता।”

अधिकारियों की ओर से यह दलील दी गई कि अनुमति न दिए जाने के पीछे एकमात्र कारण आसन्न संसदीय चुनाव थे। इस पर जज ने कहा, “अब प्रतिवादी यह कह रहे हैं कि क्षेत्राधिकार वाली पुलिस से रिपोर्ट मंगाई गई है और उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है,” लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

जज ने टिप्पणी की, “याचिकाकर्ता आखिरकार देशी सेनाओं की औपनिवेशिक शक्तियों पर जीत की स्मृति में एक स्तूप स्थापित करना चाहता है। ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों का उत्सव मनाया जाना चाहिए और उन्हें स्मृति के रूप में संरक्षित रखा जाना चाहिए। मैं पहले ही यह राय व्यक्त कर चुका हूँ कि किसी स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा स्थापित करने के लिए, वह भी केवल अपनी पट्टा भूमि पर, किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती,” उन्होंने पूर्व में दिए गए एक फैसले का हवाला देते हुए कहा।

उन्होंने आगे कहा, “जैसे किसी व्यक्ति का घर उसका किला होता है, वैसे ही उसकी भूमि उसका अधिकार क्षेत्र होती है। राज्य केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही हस्तक्षेप कर सकता है। किसी वैधानिक या कॉमन लॉ अधिकार को किसी कार्यकारी आदेश या सरकारी निर्देश के माध्यम से सीमित या समाप्त नहीं किया जा सकता। केवल ऐसा कानून, जो संविधान के विपरीत न हो, ही इन अधिकारों पर प्रभाव डाल सकता है।”

कोर्ट ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक पूजा के लिए किसी धार्मिक भवन के निर्माण हेतु जिला कलेक्टर से पूर्व अनुमति आवश्यक हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा अपने आदर्श या श्रद्धेय व्यक्ति के सम्मान में प्रतिमा स्थापित करने के अधिकार को सीमित या बाधित नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रतिमा स्थापना से संबंधित ऐसा कोई वैधानिक कानून या नियम अस्तित्व में नहीं है।

यूएपीए-आरोपी कैथोलिक जेसुइट पादरी स्टेन स्वामी का स्मारक

जज ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के आरोपित रहे कैथोलिक जेसुइट पादरी दिवंगत स्टैनिस्लॉस लौर्दुस्वामी उर्फ स्टैन स्वामी की प्रतिमा स्थापना से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि उस मामले में तहसीलदार ने पहले अनुमति देने से इनकार कर दिया था, लेकिन बाद में इसी कोर्ट ने प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति दी थी। जज ने स्टैन स्वामी के विवादास्पद जीवन का भी जिक्र किया, जो कथित रूप से राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़ा रहा।

कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे विवादित और बदनाम व्यक्ति की प्रतिमा लगाने के लिए किसी प्रकार की अनुमति आवश्यक नहीं है, तो देश के स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण अध्याय को सम्मान देने के लिए अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह सही है कि समाज के कुछ वर्ग स्टैन स्वामी को आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाला मानते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वह UAPA के तहत दर्ज एक मामले में आरोपित थे। उनकी मृत्यु जेल में हुई। यदि स्टैन स्वामी की स्मृति में एक पत्थर का स्तंभ स्थापित करने के लिए अनुमति आवश्यक नहीं है, तो निश्चित रूप से नथम कनवै युद्ध की स्मृति में स्तूप स्थापित करने के लिए भी किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि स्टैन स्वामी को 2018 के भीमा कोरेगाँव एल्गार परिषद मामले में मुख्य साजिशकर्ता के रूप में नामजद किया गया था। उन पर माओवादियों के साथ मिलकर लोकतंत्र को कमजोर करने और देश को नुकसान पहुँचाने के लिए जीवन समर्पित करने के आरोप थे।

इसके अलावा, जब वह जेसुइट संचालित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट (ISI) के निदेशक थे, उस दौरान बाद में केंद्र सरकार द्वारा प्रतिबंधित इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) को वहाँ कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने विडंबना की ओर इशारा करते हुए कहा कि जिस भूमि को नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसे व्यक्ति ने काम किया, उसी भूमि पर उसकी प्रतिमा स्थापित की गई है, जबकि देश के लिए बलिदान देने वाले अनेक वीर आज भी गुमनाम हैं, उन्हें उनका उचित सम्मान नहीं मिला है या फिर उन्हें अपने महान बलिदानों की मान्यता के लिए मृत्यु के बाद भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

फैसले की घोषणा कर दी गई है

जज ने सरकार के एक पूर्व आदेश से संबंधित अपने पुराने फैसले का हवाला दिया और साफ किया कि वह निर्देश केवल सार्वजनिक स्थलों पर लागू होता है, न कि पट्टा (निजी) भूमि पर।

उन्होंने फैसले को और स्पष्ट करते हुए कहा, “बेशक सरकार को यह अधिकार है कि वह निजी स्थानों पर भी प्रतिमाओं की स्थापना को नियंत्रित करने के लिए कोई कानून बनाए। लेकिन जब तक ऐसा कोई कानून अस्तित्व में नहीं आता, तब तक केवल परिपत्रों या सरकारी आदेशों के जरिए किसी व्यक्ति के अपनी पट्टा भूमि पर प्रतिमा स्थापित करने के अधिकार को छीना नहीं जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित सरकारी आदेश केवल प्रतिमाओं की स्थापना से जुड़ा है, जबकि वर्तमान मामला एक स्तूप स्थापित करने का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में कोई विवाद नहीं है और न ही किसी प्रकार की कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने की आशंका है, इसलिए सरकार को इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि उपरोक्त पूर्व निर्णय इस मामले में भी समान रूप से लागू होगा, चाहे सरकार का आदेश मौजूद क्यों न हो। फिर कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, “इन परिस्थितियों को देखते हुए विवादित मेमो को निरस्त किया जाता है। याचिकाकर्ता को याचिका में उल्लिखित भूमि पर नथम कनवै युद्ध की स्मृति में स्मारक स्तूप स्थापित करने की पूरी स्वतंत्रता है। यह रिट याचिका स्वीकार की जाती है। किसी प्रकार की लागत नहीं लगाई जाती।”

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

जानिए दुबई के उस ‘Botim’ ऐप की कहानी, जिसके जरिए कनेक्टेड थे राँची में RSS दफ्तर पर बम फेंकने वाले पाकिस्तानी एजेंट

व्हाट्सएप की तरह दुबई में 'Botim' ऐप का इस्तेमाल होता है। जिन लोगों ने RSS दफ्तर पर पेट्रोल बम से हमला किया, उन्हें इसी ऐप पर टास्क मिला था।

आरफा जी, बेवकूफ तो आपने उन सेकुलर हिंदुओं को बनाया है जिन्होंने आपको ‘पत्रकार’ समझा

आरफा अगर इस्लामी कट्टरपंथियों के बचाव का काम और भारत सरकार की बुराई करना वो छोड़ दें तो उन्हें उनके अपने दर्शक ही नहीं पूछेंगे।
- विज्ञापन -