पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में 700 साल बाद फिर से हिंदुओं का पवित्र ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ फिर से आकार ले रहा है। यह महोत्सव हुगली के बांसबेड़िया क्षेत्र में स्थित ‘त्रिवेणी’ में आयोजित होगा। इसे प्रयागराज का दक्षिणी रूप कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम होता है। इसी जगह पर 11 से 14 फरवरी 2026 के बीच ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ फिर से हो रहा है।
हुगली का यह ‘दक्षिण प्रयाग’ प्राचीन काल से कुंभ स्नान और मेले का केंद्र रहा, लेकिन 1292 ईस्वी में जफर खान गाजी के आक्रमण और मंदिर तोड़ने के बाद करीब 700 साल तक यह परंपरा बंद हो गई थी। हालाँकि साल 2022 में इतिहासकार कंचन बनर्जी, प्रबीर भट्टाचार्य और त्रिवेणी कुंभ मेला समिति के प्रयासों से इसे फिर जीवित किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में और पत्र के जरिए इसकी सराहना की है। पीएम मोदी ने कहा कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाने का सराहनीय कदम है। दरअसल, ये बात सभी जानते हैं कि बंगाल को ऐतिहासिक रूप से हिंदू विचार, दर्शन और आध्यात्मिक परंपराओं की एक महत्वपूर्ण भूमि माना जाता है। गंगा–ब्रह्मपुत्र डेल्टा क्षेत्र में प्राचीन वैदिक परंपराएँ और स्थानीय लोक आस्थाएँ मिलकर हिंदू धर्म का एक अलग और खास रूप बनाती हैं।
‘दक्षिण प्रयाग’ कहे जाने के कारण त्रिवेणी में होने वाले धार्मिक स्नान और मेले बहुत पवित्र माने जाते हैं, खासकर कुंभ संक्रांति जैसे शुभ मौकों पर। इस स्थान का संबंध पास के ऐतिहासिक क्षेत्र सप्तग्राम से भी जुड़ा हुआ है, जो पहले एक बड़ा धार्मिक और व्यापारिक केंद्र था।
वैष्णव विद्वान वृंदावन दास के अनुसार, सप्तग्राम–त्रिवेणी घाट वह पवित्र स्थान है जहाँ सप्तऋषियों ने तपस्या की थी। मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से इंसान के पाप धुल जाते हैं। प्रयागराज और पश्चिम बंगाल की त्रिवेणी जैसे पवित्र संगम स्थलों पर सामूहिक स्नान की परंपरा कई सदियों से चली आ रही है।
मान्यता है कि त्रिवेणी में स्नान करने से इंसान की सोई हुई आध्यात्मिक शक्ति जाग जाती है, ज्ञान की राह खुलती है और मन को शांति व संतुलन मिलता है। यहाँ हर 4 साल में एक बार कुंभ मेला आयोजित किया जाता है।
अर्ध कुंभ हर 6 साल में हरिद्वार और प्रयागराज में होता है, जबकि पूर्ण कुंभ हर 12 साल में आयोजित किया जाता है। पूर्ण कुंभ का समय गुरु (बृहस्पति), सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर तय होता है और यह चार पवित्र स्थानों- प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में से किसी एक जगह पर होता है।
महाकुंभ मेला हर 144 साल में एक बार आयोजित होता है। हाल ही में इसका आयोजन 2024 में प्रयागराज में हुआ था, जिसे बहुत ऐतिहासिक और खास माना गया।
एक समय बंगाल की पवित्र धरती पर भी कुंभ मेला लगता था, लेकिन बार-बार हुए इस्लामी आक्रमणों के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो गई और लोगों की यादों से भी मिटती चली गई।

स्थानीय इतिहासकार अशोक गांगुली के अनुसार, त्रिवेणी कुंभ मेला और गंगासागर मेले के बीच पुराना ऐतिहासिक संबंध था। पहले के समय में साधु-संत गंगासागर मेला खत्म होने के बाद पैदल चलकर त्रिवेणी आते थे और माघ संक्रांति के दिन स्नान करते थे। त्रिवेणी में इस दिन को ‘अनुकुंभ’ के रूप में मनाया जाता था। उस दौर में सप्तग्राम और त्रिवेणी शिक्षा, संस्कृति और तीर्थ यात्रा के बड़े केंद्र हुआ करते थे।
लेकिन 1292 ईस्वी में इस्लामी शासक जफर खान गाजी ने त्रिवेणी पर हमला किया और इलाके को घेर लिया। इस दौरान कई हिंदुओं की हत्या की गई और पाल वंश काल का एक प्राचीन विष्णु मंदिर तोड़ दिया गया। इसके बाद हिंदुओं की धार्मिक सभाओं और जुलूसों पर रोक लगा दी गई, जिससे त्रिवेणी कुंभ मेले की परंपरा पूरी तरह खत्म हो गई।
1288 से 1313 ईस्वी के बीच, सप्तग्राम और त्रिवेणी पूरी तरह इस्लामी आक्रमणकारियों के नियंत्रण में आ गए। कई इतिहासकारों का मानना है कि इस समय हिंदू और बौद्ध मंदिरों व मठों को जानबूझकर तोड़ा गया और उनकी जगह मस्जिदें और दरगाहें बनाई गईं।

भारतीय पुरातत्वविद राखालदास बनर्जी और प्रणब रॉय के शोध से पता चला है कि जफर खान गाजी की दरगाह के खंभों और निर्माण में टूटे हुए हिंदू, जैन और बौद्ध मंदिरों की मूर्तियाँ और कलाकृतियों के निशान मौजूद हैं। माना जाता है कि इस क्षेत्र में आखिरी बार कुंभ मेला 1319 ईस्वी में आयोजित हुआ था।
इसके बाद लगभग 703 वर्षों तक कुंभ मेला बंद रहा, लेकिन 2022 में इस ऐतिहासिक परंपरा को फिर से जीवित किया गया। अमेरिका में रहने वाले इतिहासकार कंचन बनर्जी, कोलकाता के प्रबीर भट्टाचार्य और त्रिवेणी कुंभ मेला समिति के प्रयासों से इस परंपरा को दोबारा शुरू किया गया।
संतों के मार्गदर्शन और स्थानीय लोगों के सहयोग से, माघ संक्रांति और भैमी एकादशी के पावन अवसर पर कुंभ मेला और कुंभ स्नान का आयोजन किया गया। इस दौरान त्रिवेणी के साधु-संत सप्तऋषि घाट पर एकत्र हुए, जिसे वह स्थान माना जाता है जहाँ सप्तऋषि मैत्रेय, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, व्यास, वशिष्ठ और विश्वामित्र ने तपस्या की थी।

इस आयोजन को ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ नाम दिया गया। 2022 से अब तक यह त्रिवेणी में तीन बार आयोजित हो चुका है। इस मेले के सफल आयोजन में दान देने वालों का सहयोग, आयोजकों की मेहनत और स्थानीय लोगों का उत्साहपूर्ण समर्थन बहुत जरूरी रहा है।
बंगाल में कुंभ मेले पर पीएम मोदी का संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 फरवरी 2023 को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 98वें एपिसोड में ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ का खास जिक्र किया था।
उन्होंने बताया था कि अमेरिका में रहने वाले कंचन बनर्जी ने उन्हें भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाने से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल के बारे में जानकारी दी थी। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के बांसबेड़िया शहर में त्रिवेणी कुंभ महोत्सव आयोजित किया गया, जिसमें 8 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि त्रिवेणी कुंभ महोत्सव इसलिए खास है क्योंकि इसे करीब 700 साल बाद दोबारा शुरू किया गया है। उन्होंने बताया कि यह परंपरा हजारों साल पुरानी है, लेकिन करीब 700 साल पहले यह बंद हो गई थी।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि आजादी के बाद भी इसे दोबारा शुरू नहीं किया जा सका, लेकिन दो साल पहले स्थानीय लोगों और त्रिवेणी कुंभो परिचालना समिति की कोशिशों से इस महोत्सव को फिर से जीवित किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि त्रिवेणी कुंभ महोत्सव से जुड़े सभी लोगों को बधाई दी जानी चाहिए, क्योंकि वे सिर्फ एक पुरानी परंपरा को ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी बचा रहे हैं। उन्होंने बताया कि त्रिवेणी सदियों से पश्चिम बंगाल का एक पवित्र तीर्थ स्थल रही है, जिसका उल्लेख मंगल काव्य, वैष्णव साहित्य, शाक्त साहित्य और अन्य बंगाली ग्रंथों में मिलता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि यह क्षेत्र कभी संस्कृत शिक्षा और भारतीय संस्कृति का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था।
प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि त्रिवेणी की विरासत को फिर से जीवित करने और कुंभ परंपरा को लौटाने के लिए पिछले साल यहाँ कुंभ मेला आयोजित किया गया। सात सौ साल बाद आयोजित यह तीन दिवसीय कुंभ महास्नान और मेला इस क्षेत्र में नई ऊर्जा और जागरूकता लेकर आया। इन तीन दिनों में गंगा आरती, रुद्राभिषेक, यज्ञ और अन्य धार्मिक अनुष्ठान हुए।
इसके साथ ही कीर्तन, बाउल, गौड़ीय नृत्य, श्री-खोल, पोतेर गान और चौ नृत्य जैसी बंगाली सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहीं। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह प्रयास देश के युवाओं को भारत के गौरवशाली अतीत से जोड़ने का एक सराहनीय कदम है।
इसके अलावा, फरवरी 2025 में होने वाले ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ के तीसरे संस्करण से पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयोजक संस्थाओं बोंगियो हिंदू धर्म प्रचार समिति (BHDPS) और त्रिवेणी कुंभो परिचालना समिति (TKPS) को एक औपचारिक पत्र लिखकर शुभकामनाएँ और समर्थन दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पत्र में आयोजकों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह एक बहुत ही सराहनीय पहल है। उन्होंने बताया कि कई सदियों बाद 2023 में स्थानीय लोगों ने इस महोत्सव को फिर से शुरू किया, जिससे हमारी पुरानी और गौरवशाली परंपरा दोबारा जीवित हुई और नई पीढ़ी तक भी पहुँची।
प्रधानमंत्री ने कहा कि त्रिवेणी और प्रयागराज जैसे पवित्र शहरों को विशेष सम्मान मिलता है, क्योंकि ये आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बताया कि गंगा किनारे स्थित त्रिवेणी में स्नान करना महाकुंभ की परंपरा का ही एक रूप माना जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि बांग्ला साहित्य में त्रिवेणी और आसपास के क्षेत्र के कई ऐतिहासिक उल्लेख मिलते हैं, जो बताते हैं कि यह इलाका कभी शिक्षा, कला, वास्तुकला, संस्कृति और संस्कृत भाषा का एक बड़ा केंद्र था। ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन युवाओं को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अच्छा अवसर देते हैं।
प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि कुंभ महासंक्रांति, महात्रिवेणी संगम और संतों की शोभायात्रा के दौरान संतों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी, हुगली और पूरे बंगाल के लोगों के लिए एक आध्यात्मिक और यादगार अनुभव होगी।
बोंगो त्रिबेनी कुंभो महोत्सव का लक्ष्य
मई 2023 में, 700 साल बाद फिर से शुरू हुए इस हिंदू पर्व को लेकर प्रचार मंच ‘आर्टिकल 14’ ने एक आलोचनात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की।
इससे जुड़े एक लेख को स्निग्धेंदु भट्टाचार्य नाम के लेखक ने लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘हिंदुत्व, कथित रूप से बदला गया शोध पत्र और तृणमूल शासित पश्चिम बंगाल में कुंभ मेला ‘पुनर्जीवित’ करने के प्रयास को प्रधानमंत्री का समर्थन।’
इस लेख में त्रिवेणी कुंभ महोत्सव को दोबारा शुरू करने, इससे जुड़े संगठनों और प्रधानमंत्री के समर्थन को लेकर आलोचनात्मक और विवादास्पद दावे किए गए थे।

बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव पर 9 जून 2023 को द हिंदू अखबार में भी एक आलोचनात्मक लेख प्रकाशित हुआ। इस रिपोर्ट में कहा गया कि पश्चिम बंगाल में परंपराओं को कथित तौर पर बदल या गढ़ा जा रहा है और इसे एक राजनीतिक योजना के रूप में दिखाया गया। लेख में महोत्सव के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पुनरुद्धार को लेकर संदेह और नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया।

सत्य यह है कि ऐतिहासिक अभिलेखों में ‘कुंभ मेला’ शब्द थोड़े बाद में ही सामने आया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस परंपरा और आस्था का अस्तित्व नहीं था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय इतिहास ने लंबे समय तक आक्रमणों और युद्धों का सामना किया, जिनके दौरान कई दस्तावेज और अभिलेख खो गए या बाधित हुए।
त्रिवेणी कुंभ मेला किसी आधुनिक आविष्कार या राजनीतिक परियोजना का हिस्सा नहीं है, जैसा कि कुछ प्रचार माध्यमों में दावा किया गया। यह एक पवित्र स्थल और भू-परिदृश्य है, जिसे भूगोल, शास्त्र, धार्मिक अभ्यास और सामूहिक स्मृति द्वारा संरक्षित रखा गया है। इसका संगम, स्नान और मेले सीधे तौर पर हिंदू सभ्यता और परंपरा की निरंतरता में स्थित हैं।
त्रिवेणी कुंभ के इतिहास को लेकर जो विवाद उठाए गए हैं, वे अक्सर हिंदुओं को उनकी छोटी परंपराओं से अलग करने की रणनीति का हिस्सा रहे हैं। देखा गया है कि हिंदू पुनरुद्धार को अक्सर केवल ‘उत्तर भारतीय घटना’ के रूप में पेश किया गया, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक और पौराणिक है। अब एक नई रणनीति यह अपनाई जा रही है कि पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के प्रमाणों की कमी को आधार बनाकर इस परंपरा को अस्वीकार किया जाए।
बंगाल कुंभ मेला का 2026 संस्करण
2026 का बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव 11 फरवरी से 14 फरवरी तक आयोजित किया जाएगा। यह तीन दिवसीय महापर्व लगभग 14 से 16 लाख श्रद्धालुओं को आकर्षित करने की उम्मीद है।
वे साधु और संत, जिन्होंने पहले गंगासागर मेले में हिस्सा लिया था, इस बार भी त्रिवेणी कुंभ मेले में उपस्थित रहेंगे। इतिहासकार कंचन बनर्जी के अनुसार, इस वर्ष का महोत्सव पिछले साल से भी भव्य और यादगार होने की संभावना है।

बोंगो ट्रिबेनी कुंभो मोहोत्सव का कार्यक्रम इस प्रकार है:
11 फरवरी 2026
- सूर्योदय, आदित्य हृदय मंत्र और शांति प्रवचन
- नगर संकीर्तन
- योग आसन (क्लब ग्राउंड)
- रुद्राभिषेक और रुद्र महा जोग्गो, शिव सहस्र नाम (क्लब ग्राउंड)
- बोस अंको: बच्चों का ड्राइंग कॉम्पिटिशन
- धर्म सभा
- गंगा आरती
12 फरवरी 2026
- शक्ति कुंभ जुलूस और फोटो प्रदर्शनी
- पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का भाषण
- गीता पाठ
- साधु भंडारा
- काली कीर्तन
- गोदियो नृत्तो
- गंगा आरती
13 फरवरी 2026
- अमृत स्नान यात्रा
- धर्म सभा
- साधु भोजन
- धोर्मियो ओनुस्थान / कीर्तन (क्लब ग्राउंड)
- गंगा आरती (सप्तर्षि घाट)

फंड इकट्ठा करना
ऑपइंडिया ने रिसर्चर और कॉलमिस्ट पल्लब मंडल से बात की, जो बोंगो ट्रिबेनी कुंभो मोहोत्सव के कोऑर्डिनेटर के तौर पर काम कर रहे हैं।
उन्होंने हमें इवेंट के ऑर्गनाइजेशन में आने वाली बजट की दिक्कतों और चुनौतियों के बारे में बताया, जिसमें लाखों भक्तों के आने का अनुमान है। मंडल ने आगे कहा कि इवेंट में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों के लिए भंडारा और प्रसादम उपलब्ध है। उन्होंने हिंदुओं से इस नेक काम में योगदान देने की अपील की।
बैंक अकाउंट की डिटेल्स ये हैं:
बंगीय सनातनी संस्कृति परिषद
केनरा बैंक, साल्ट लेक सिटी ब्राँच
अकाउंट नंबर 110199375104
IFSC: CNRB0002549
स्पॉन्सरशिप और कोलेबोरेशन के लिए, कंपनियाँ इवेंट कोऑर्डिनेटर पल्लब मंडल से +91 7001243943 पर संपर्क कर सकती हैं और ‘बोंगो ट्रिबेनी कुंभो मोहोत्सव’ के 2026 एडिशन को शानदार सफल बना सकती हैं।
(इस लेख के लिए मुख्य सामग्री स्वतंत्र शोधकर्ता और स्तंभकार पल्लब मंडल द्वारा प्रदान की गई है, जो वर्तमान में बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव के कोऑर्डिनेटर के रूप में कार्यरत हैं।)
(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)


