इस समय गलगोटिया यूनिवर्सिटी गलत वजहों से सुर्खियों में है। दिल्ली में चल रहे इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में इस यूनिवर्सिटी ने एक रोबोट डॉग को अपनी इनोवेशन बताकर प्रदर्शित किया। नाम दिया ‘ओरियन’। दावा किया कि यह उनके छात्रों और फैकल्टी की मेहनत का नतीजा है। लेकिन सच सामने आते ही हंगामा मच गया। यह रोबोट डॉग असल में चीन की कंपनी यूनिट्री का कमर्शियल प्रोडक्ट Go2 था, जो भारत में आसानी से खरीदा जा सकता है।
सोशल मीडिया पर लोग इसे फ्रॉड बता रहे हैं। आयोजकों ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी के स्टॉल को तुरंत खाली करने का आदेश दे दिया। पूरी दुनिया के सामने भारत की एक यूनिवर्सिटी ने झूठ बोलकर देश की छवि खराब की। लोग पूछ रहे हैं कि ऐसी यूनिवर्सिटी जो झूठ और धोखे पर चलती है, वहाँ शिक्षा का क्या स्तर होगा? खैर, ये सवाल उठा तो हमने इंटरनेट की दुनिया खंगाली और जो कुछ मिला, वो हम आपके सामने रख रहे हैं।
मिलिए गलगोटिया यूनिवर्सिटी के अंबेडरकारी डीन रविकांत से
गलगोटिया यूनिवर्सिटी के लिबरल एजुकेशन स्कूल के डीन हैं डॉ. रविकांत किसाना। खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले किसाना की किताब और बयान भी विवादों में रहते हैं। उनकी किताब “Meet the Savarnas: Indian Millennials Whose Mediocrity Broke Everything” में सवर्ण समाज पर तीखा हमला किया गया है। वे सवर्णों की शादियों को ‘नार्सिसिस्टिक यानि आत्ममुग्ध बताते हैं। यही नहीं, यूजीसी के खिलाफ चले सवर्ण आंदोलनों को ‘एंटी-डेमोक्रेटिक’ कहने से भी नहीं चूकते हैं। खैर, ऐसे व्यक्ति को डीन बनाने वाली यूनिवर्सिटी अब AI समिट में पकड़ी गई है। क्या यह संयोग है या यूनिवर्सिटी की सोच का आईना?
कौन हैं रविकांत किसाना?
रविकांत किसाना खुद को ‘बफेलो इंटेलेक्चुअल’ कहते हैं। वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और पॉडकास्ट भी चलाते हैं। उनकी बायोग्राफी में लिखा है कि वे अम्बेडकरवादी संगठनों जैसे नालंदा अकादमी, वर्धा के साथ मिलकर काम करते हैं। पहले वे फ्लेम यूनिवर्सिटी, IIM कोझीकोड, वोक्सेन यूनिवर्सिटी और NLSIU बेंगलुरु जैसे संस्थानों में पढ़ा चुके हैं।
नवंबर 2025 में इंडिया फेस्टिवल ऑफ पॉडकास्टिंग (IFP) में उन्हें स्पीकर के तौर पर बुलाया गया था, जहाँ उन्हें गलगोटिया यूनिवर्सिटी का डीन और प्रोफेसर बताया गया। जनवरी 2026 में उनके लिंक्डइन प्रोफाइल पर भी यही पद लिखा है – ‘Dean, School of Liberal Education & Languages, Professor, Galgotias University।’
किसाना की विशेषज्ञता क्रिटिकल कास्ट स्टडीज और एथनोग्राफिक रिसर्च में है। लेकिन उनकी लेखनी मुख्य रूप से सवर्ण समाज की आलोचना पर केंद्रित है। वे सवर्णों को ‘कूल, क्लूलेस कस्टोडियंस ऑफ कास्ट प्रिविलेज’ कहते हैं। उनकी किताब में सवर्ण मिलेनियल्स की औसतता (Mediocrity) को भारत की कई समस्याओं की जड़ बताया गया है।
किताब में सवर्णों पर क्या-क्या हमले?
साल 2025 में पेंगुइन रैंडम हाउस से छपी किताब ‘Meet the Savarnas’ में किसाना ने सवर्ण जीवन के हर पहलू को निगेटिव अंदाज में पेश किया है। किताब की शुरुआत में ही वे कहते हैं, “सवर्ण इस किताब को पढ़ें, पचाएँ, आत्ममंथन करें या गुस्सा हों- यह उनकी अपनी पहचान से मिलने का मौका है। अगर उन्हें खुद का चेहरा पसंद नहीं आता, तो यह उनकी अंदरूनी समस्या है।”
एक अध्याय में वे सवर्ण शादियों का वर्णन करते हैं, “एक सामान्य सवर्ण शादी में परिवार के विभिन्न गुट आपस में प्रतिस्पर्धा और साजिश करते हैं। आखिरकार सवर्ण शादी परिवार की विभिन्न शाखाओं में फैली एक कभी न खत्म होने वाली सागा का सिर्फ एक एपिसोड होती है। हर साल कई शादियाँ होती रहती हैं। नए कानून हर शादी में जटिलता बढ़ाते हैं, जबकि व्यक्तिगत शादियों की सेहत और बच्चों का जन्म परिवार की समृद्धि से अंक घटाते हैं। यह तमाशा इतना भव्य और दिखावा भरा होता है कि इसे महत्वपूर्ण मानना ही पड़ता है। लेकिन असल में यह स्पेक्टेकल जितना महत्वपूर्ण लगता है, उतना ही नार्सिसिस्टिक (स्वार्थी और आत्ममुग्ध) भी है।”
किसाना आगे लिखते हैं कि सवर्ण युवा अपनी जवानी में रेडिकल पोज बनाते हैं, लेकिन शादी के बाद वही अंकल-आंटी बन जाते हैं जिनके खिलाफ वे बगावत करते थे। उनकी एक इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा है, “शादी वह पॉइंट है जहाँ सवर्ण अपनी युवावस्था के रेडिकल पोज को छोड़कर ठीक वैसे ही अंकल-आंटी बन जाते हैं जिनके खिलाफ वे बगावत करते थे।”
किताब में सवर्ण आंदोलनों को भी एंटी-डेमोक्रेटिक बताया गया है। किसाना का दावा है कि सवर्ण हमेशा खुद को ‘सेल्फ-मेड’ मानते हैं, अपनी सफलता को सिर्फ व्यक्तिगत संघर्ष का नतीजा बताते हैं, जबकि यह ऐतिहासिक विशेषाधिकारों का परिणाम है। वे ‘ग्लास फ्लोर’ की बात करते हैं – सवर्णों के नीचे एक अदृश्य फ्लोर होता है जो उन्हें गिरने नहीं देता, जबकि दूसरों को तोड़ता है।
एक रिव्यू में लिखा गया, “किसाना की किताब सवर्णों की नाजुक संरचना को किताबी रूप में पहली बार खोलकर रख देती है। यह पढ़ना मजेदार है, लेकिन सवर्णों के लिए शायद असहज करने वाला।”
गलगोटिया कैंपस बना नफरत फैलाने का अड्डा
खास बात ये है कि रविकांत किसाना न सिर्फ खुद सवर्णों के खिलाफ आग उगलता है, बल्कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी के कैंपस को भी सामाजिक न्याय की आड़ में नफरत फैलाने का अड्डा बनाया जा चुका है। गलगोटिया के कैंपस में ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जहाँ खुलेआम नफरत परोसी जाती रही है। ऐसे ही एक कार्यक्रम का पोस्टर भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसे देखकर समझ सकते हैं कि जिस यूनिवर्सिटी में ऐसी गतिविधियाँ चलती हों, वहाँ इनोवेशन के नाम पर किस तरह का फ्रॉड होता होगा।

किसाना के विवादित सोच पर लोग उठा रहे उंगली
किसाना के बयानों से विवाद स्वाभाविक है। सोशल मीडिया पर लोग उन्हें सवर्ण-विरोधी बताते हैं। एक हालिया पोस्ट में उन्हें ब्राह्मणिकल माइंड को ‘कोलोनाइजर का माइंड’ कहते हुए कोट किया गया। लोग पूछ रहे हैं कि ऐसे विचार रखने वाले व्यक्ति को एक बड़ी यूनिवर्सिटी का डीन बनाना कितना सही है? क्या यह जातीय विभाजन को बढ़ावा नहीं देता?
गलगोटिया यूनिवर्सिटी पहले से ही अपनी डिग्री की गुणवत्ता को लेकर आलोचना झेलती रही है। लोग इसे ‘डिग्री मिल’ कहते हैं। अब AI समिट में चीनी रोबोट को अपना बताकर पकड़े जाने से यह आलोचना और तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है कि यह यूनिवर्सिटी फ्रॉड है और इसे बंद कर देना चाहिए। इसी मौके पर किसाना का डीन होना फिर से चर्चा में आ गया। लोग कह रहे हैं- जो यूनिवर्सिटी इनोवेशन के नाम पर झूठ बोलती है, वहाँ डीन के पद पर ऐसा व्यक्ति है जो समाज को जाति के नाम पर बाँटने का काम करता है।
भारत को शर्मिंदा करने का सिलसिला
AI समिट में हुआ धोखा सिर्फ यूनिवर्सिटी की नहीं, पूरे देश की बदनामी है। प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत के सपने के सामने एक यूनिवर्सिटी ने चीनी प्रोडक्ट को अपना बताकर धोखा दिया। यूनिवर्सिटी ने बाद में सफाई दी कि यह सिर्फ लर्निंग के लिए था, लेकिन पहले दावे कुछ और थे। यह झूठ देश के सामने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करता है।
ऐसी यूनिवर्सिटी में अगर डीन कोई ऐसा व्यक्ति हो जो समाज के बड़े वर्ग को निशाना बनाता हो, तो सवाल उठते हैं कि वहाँ शिक्षा का स्तर क्या है? क्या ऐसी संस्थाएँ युवाओं को एकता सिखाएँगी या विभाजन?
रविकांत किसाना की विचारधारा उनकी व्यक्तिगत हो सकती है, लेकिन एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वे समाज को जोड़ने का काम करें न कि बाँटने का। गलगोटिया यूनिवर्सिटी का ताजा कारनामा दिखाता है कि संस्थान की प्राथमिकता क्या है। देश को ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो इनोवेशन और एकता सिखाएँ न कि समाज में झूठ फैलाकर विभाजनकारी बातों को बढ़ावा दे।


