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आरफा जी, स्ट्रैटेजी बदलो, सच नहीं बदल पाएगा- भारत हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा

आरफा के पुराने रिकॉर्ड को देखें तो पता चलता है कि उनके लिए सेकुलरिज़्म का मतलब साफ है- एक ऐसा तंत्र जहाँ मुस्लिम अपनी मजहबी पहचान के नाम पर चाहे जो मर्जी वो करें, लेकिन वहीं हिंदू न खुलकर अपनी पहचान बताए, न अपने धर्म की बातें करें, न अपने हक के लिए लड़े।

‘सेकुलरिज्म’ की चादर ओढ़े एक इंसान में कितनी हिंदू घृणा भरी हो सकती है- अगर आपको चरम देखना है तो आप आरफा खानम शेरवानी को देखिए। अभी तक अपनी एकतरफा पत्रकारिता के लिए कुख्यात इस महिला ने अब खुलकर बोला है कि भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न कभी बनेगा।

अपने ही 2 दिन पुराने ट्वीट पर कमेंट करते हुए आरफा ने ये जहर उगला है। पुराने ट्वीट में इस महिला ने लिखा था- “कोई भी भारत को मुस्लिम मुल्क नहीं बनाना चाहता और भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न की होगा। हमने एक सेकुलर, लिबरल, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक के लिए लड़ाई लड़ी थी।”

आरफा खानम शेरवानी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

क्या है आरफा का ‘सेकुलरिज्म’

पहली नजर में आरफा का कथन आपको बड़ा उदारवादी और संवैधानिक मूल्यों की बात करता हुआ लग सकता है, पर सवाल यह है कि असल में आरफा के लिए ‘सेकुलर’, ‘लिबरल’ और ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक’ का वास्तविक अर्थ क्या है।

खुद को पत्रकार कहने वाली आरफा के पुराने रिकॉर्ड को देखें तो पता चलता है कि उनके लिए ‘सेकुलरिज़्म’ का मतलब साफ है- एक ऐसा तंत्र जहाँ मुस्लिम अपनी मजहबी पहचान के नाम पर चाहे जो मर्जी वो करें… वहीं हिंदू न खुलकर अपनी पहचान बताए, न अपने धर्म की बातें करें, न अपने हक के लिए लड़े और सबसे महत्वपूर्ण चीज- वो न ही उन कट्टरपंथी तत्वों को उजागर करे जो सालों से उन्हें काफिर कहकर खत्म करने का सपना देखते हैं।

आज तमाम खबरें आती हैं जब भारत में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों और नेटवर्क का खुलासा होता है। उनके पास से बकायदा ऐसे ब्लूप्रिंट मिलते हैं जो बताते हैं कि वो भारत को कैसे 2047 तक इस्लामी मुल्क बनाने की तैयारी में है। उनकी प्लानिंग तक उजागर होती है कि वो धर्मांतरित करके, लव जिहाद के जरिए, घुसपैठ करवाकर डेमोग्राफी बदलना चाहते हैं…।

लेकिन, इन विषयों पर आरफा और कथित सेकुलर बुद्धिजीवियों एक शब्द नहीं बोलते। उलटा वो अपने पाठकों के दिमाग में ये डालते हैं कि कोई भी भारत को मुस्लिम राष्ट्र नहीं बनाना वाला…। क्या ये कहते हुए आरफा जैसे लोग हर आतंकी, हर कट्टरपंथी और हर घुसपैठिए की जिम्मेदारी ले रहे हैं? या ये सिर्फ उनकी बदली स्ट्रैटेजी का एक हिस्सा है।

भारत, सनातन धर्म और हिंदू राष्ट्र

आज भारत में रहकर वो ये बोल पा रही हैं कि भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न कभी बनेगा। क्यों…? क्योंकि वो यही सोचती हैं कि भारत की नींव ही मुगलों के आने के बाद पड़ी, उनके हिसाब से भारत में उससे पहले कुछ था ही नहीं।

अब आरफा के लिए ये स्वीकारना कितना भी मुश्किल क्यों न हो मगर हकीकत यही है कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें और परंपराएँ हजारों वर्षों से सनातन सभ्यता के इर्द-गिर्द विकसित हुई हैं। यह भूभाग वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, अनगिनत धार्मिक स्थलों, तीर्थ परंपराओं और सांस्कृतिक उत्सवों से निर्मित हुआ है।

सेकुलर चाहकर भी इन तथ्यों को नहीं बदल सकते और न ही इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के उन अनेक अध्ययनों को नकार सकते हैं, जो साबित करते हैं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा, जिनसे पता चलता है कि मुगल आक्रांताओं के आने के बाद भारत की सभ्यता बनी नहीं, बल्कि नष्ट हुई।

हिंदुओं के आवाज उठाने पर खतरे पर आ जाता है सेकुलरिज्म

आरफा के हिसाब से अगर उत्तम नगर के तरुण के साथ हुई बर्बरता को देखकर हिंदू बच्चा कोई बयान दे देता है तो इसका मतलब ये होता है कि हिंदुओं ने उसे कट्टर बना दिया। किंतु आरफा वो इस्लामी कट्टरपंथ में सने बच्चे नहीं दिखते जो खुलेआम भारत के खिलाफ जंग छेड़ने की बातें कहते हैं। उन्हें उन बच्चों में जहर नहीं दिखता तो जो मोदी-शाह के लिए अपशब्द उगलते हैं, उन्हें गालियाँ देते हैं। उस समय उन्हें सेकुलर, लोकतंत्र, लिबरल जैसे शब्द नहीं याद आते।

इन्हें समस्या तभी होती है जब हिंदू अपने धर्म की बात करें या मुस्लिम समुदाय द्वारा किए गए किसी अपराध पर अपना आक्रोश जाहिर करें। उत्तम नगर मामले के बाद भी यही होता देखा गया। आरफा को बेचैनी इसी बात से हुई कि आखिर वहाँ का हिंदू क्यों महसूस कर रहा है कि वो हिंदू है और किसी हिंदू के मारे जाने पर उसे गुस्सा भी क्यों आ रहा है।

अगर हिंदू तरुण हत्याकांड जैसी घटनाओं में हिंदू परिवार के साथ खड़े होने के बजाय लोग मानव-श्रृंखला बनाकर मुस्लिम आरोपितों को बचाने लगते, तो शायद आरफा के लिए सेकुलरिज्म का अर्थ सच में सार्थक हो जाता। हालाँकि अफसोस, पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश हिंदुओं ने ‘मोहम्मद दीपक’ जैसी हरकतें करना छोड़ दिया है। इसलिए अब आरफा को हर समय देश का लोकतंत्र और सेकुलरिज्म खतरे में दिखाई देता है।

आरफा जैसों की स्ट्रैटेजी

दिलचस्प बात यह है कि भारत में रहकर भारत की सभ्यागत पहचान को नकारने की हिम्मत भी आरफा जैसे लोगों को सिर्फ भारत में ही मिलती है। वरना किसी देश की संस्कृति को नकारने या उससे छेड़छाड़ करने पर कोई कट्टर देश क्या करता होगा, इसका उदाहरण चीन है। वहाँ उइगर मुस्लिमों को डिटेंशन कैंपों में इसलिए रखा जाता है, क्योंकि सरकार को लगता है कि वे उसकी सभ्यता के लिए खतरा हैं।

आज स्थिति यह बन गई है कि भारत में कई बार हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व व्यक्त करने या अपनी धार्मिक परंपराओं को निभाने पर भी आलोचना का सामना करना पड़ता है। तुरंत उन पर ‘बहुसंख्यकवाद’ या ‘कट्टरवाद’ का आरोप लगा दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, आरफा खानम शेरवानी जैसे लोग खुले मंचों पर मुस्लिम समाज को स्ट्रैटेजी बदलने की सीख देते हैं, उन्हें समझाती हैं कि कैसे इस्लामिक सोसायटी बनने तक उन्हें मुस्लिम बनकर प्रोटेस्ट नहीं करना है… इसके बावजूद उन्हें लेफ्ट लिबरल वर्ग में निष्पक्ष पत्रकार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है है।

हालाँकि, अब ये पैटर्न आगे नहीं बढ़ने वाला, न आरफा जैसों की पुरानी रणनीति काम आने वाली है। अबब हिंदू जान रहे हैं कि भारत का इतिहास क्या है। हिंदू जान रहे हैं कि देश को हिंदू राष्ट्र कहकर वो इतिहास नहीं बदल रहे।

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