मुसलमान बन कर मत करो विरोध-प्रदर्शन, वरना… द वायर की आरफा शेरवानी ने मुस्लिम भीड़ को समझाई रणनीति

"लेकिन अगर केवल मुसलमान ही विरोध करते रहे… अगर केवल 20 करोड़ लोग विरोध करते हैं, तो क्या शेष 100 करोड़ लोग… यदि आप मजहबी नारे लगा रहे हैं, तो क्या वे आपका हिस्सा बनने के लिए तैयार होंगे? स्ट्रेटेजी बदलने से..."

CAA के विरोध में देश भर में हो रहे प्रदर्शन पर वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ की एडिटर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में अपनी स्पीच देते हुए मुस्लिमों को कुछ नसीहतें दी हैं। हाल ही में अपनी फोटोशॉप्ड तस्वीरों के कारण चर्चा में आई आरफा खानम ने इस भाषण में मुस्लिमों को एकसाथ आकर विरोध करने की राय दी।

शेरवानी ने CAA-विरोध को आगे बढ़ाने के लिए नुस्खे देते हुए कहा कि उनके कितने ही परिचित ‘मुस्लिम’ बनकर विरोध करना चाहते हैं। आरफा शेरवानी अपने मुस्लिम परिचितों के विरोध करने की इच्छा का हवाला देते हुए कहती हैं, “क्योंकि यह हमारे धर्म पर हमला है और हमारे धर्म पर हमला किया जाता है, इसलिए हम मुसलमानों के रूप में विरोध करना चाहते हैं।”

आरफा शेरवानी कहती हैं, “मैं इस भावना को बहुत अच्छी तरह से समझती हूँ। जब हमला ही दाढ़ी, टोपी, बुर्का पर होता है, तो यह दाढ़ी, टोपी और बुर्का में वापस जवाब देने के लिए एक वाजिब और स्वाभाविक प्रतिक्रिया है कि आप मुसलमानों के रूप में ही विरोध प्रदर्शन में भाग लेते हैं।” आरफा ने कहा कि वो इस भावना को समझती हैं और उन्हें इसके खिलाफ कोई आपत्ति नहीं है।

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“लेकिन अगर केवल मुसलमान ही विरोध करते रहे… अगर केवल 20 करोड़ लोग विरोध करते हैं, तो क्या शेष 100 करोड़ लोग… यदि आप मजहबी नारे लगा रहे हैं, तो क्या वे आपका हिस्सा बनने के लिए तैयार होंगे? मैं एक आदर्श दुनिया की बात कह रही हूँ, एक आदर्श भारतीय समाज में, हर किसी को अनुमति दी जानी चाहिए, उनका स्वागत किया जाना चाहिए और वे जो भी कहना चाहते हैं, उन्हें कहने दिया जाना चाहिए। वे कुछ भी कहकर विरोध कर सकते थे, ‘जय श्री राम’, ‘वंदे मातरम’, ‘भारत माता की जय’ या खालसा या ईसाई नारों के नाम पर विरोध कर सकते हैं, लेकिन हम एक आदर्श समाज नहीं हैं।”

भाषण के दौरान प्रोपेगैंडा पत्रकार आरफा ने कहा कि सैफ अली खान जैसे फिल्म इंडस्ट्री वालों को, जिन्हें कि किसी बात की कोई जानकारी भी नहीं होती, वो लोग भी CAA के विरोध में उतर आए हैं।

“आपको इन विरोधों को उतना ही समावेशी बनाना होगा, जितना आप कर सकते हैं और इसके आधार को मजबूत बना सकते हैं। आप अपना कलमा पढ़ते हैं, इबादत करिए, और भारतीय संविधान तब भी आपको अधिकार देता है। लेकिन जब आप जनता के बीच आते हैं… आप एक मुसलमान हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है… और आप पर हमला किया जा रहा है, जो सच भी है। लेकिन यह समझें कि ये विरोध भारत की धर्मनिरपेक्षता, भारतीय संविधान और इसकी मूल संरचना को बचाने के लिए है। हमें इसे समावेशी बनाना होगा। इसका केवल मुस्लिम बनकर विरोध नहीं करना है। मैं उन सभी से माफी माँगती हूँ, जिनकी भावनाएँ आहत हुई हैं… लेकिन मैं चाहती हूँ कि इस बात पर आम सहमति बने कि जब तक एक आदर्श समाज का निर्माण नहीं हो जाता है, और जब तक हमारी धार्मिक पहचान, धार्मिक विश्वास और नारे स्वीकार नहीं किए जाते हैं, हमें एक समावेशी विरोध करना चाहिए।”

‘घर पर खूब मजहबी नारे पढ़कर आइए, उनसे आपको ताकत मिलती है’

“हम अपनी विचारधारा से समझौता नहीं कर रहे बल्कि अपने तरीके और स्ट्रेटेजी बदल रहे हैं। सभी जाति, धर्म के लोग साथ आएँ। घर पर खूब मजहबी नारे पढ़कर आइए, उनसे आपको ताकत मिलती है। सबके अलग-अलग तरीके हो सकते हैं अपनी ताकत को बढ़ाने के, जैसे किसी को गाने सुनने से ताकत मिलती है, किसी को पढ़ने से मिलती है, वैसे ही हमें मजहबी नारों से मिलती है। सबके अलग तरीके हैं, और यही हमारी लड़ाई है। लेकिन जब आप सिर्फ मुस्लिम बनकर विरोध करने का फैसला लेते हैं, तब आप लड़ाई हार जाते हैं।”

‘कॉन्ग्रेस ने हमें कभी ढंग से नागरिक नहीं बनने दिया, आज हम अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आए हैं’

मुस्लिमों को आगे की रणनीति समझाते हुए प्रोपेगैंडा पत्रकार आरफा अपने भाषण में कहती हैं कि कॉन्ग्रेस ने उन पर इतने साल राज किया लेकिन उन्हें कभी ढंग से नागरिक नहीं बनने दिया। उन्होंने कहा कि वो लोग सिर्फ प्रजा बनते आए हैं, और पिछले कुछ सालों में उपभोक्ता बनकर रह गए हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि पिछले 5-6 साल में वो सिर्फ सब्जेक्ट बनकर रह गए हैं।

हाल ही में ट्विटर पर कुछ फोटोशॉप्ड तस्वीरों को लेकर चर्चा में आई आरफा शेरवानी ने कहा- “हम अब तक ऐसे रहते आए हैं, जैसे हमने अपना एक बादशाह चुन लिया और हम बस एक ‘रियाया’ (प्रजा) बनकर रह गए, आज यही प्रजा अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर निकल आई है। यह इस मुल्क का शहरी है, आज वह संविधान की रक्षा के लिए सड़कों पर आया है। जो लोग सड़कों पर आए हैं, वो अब वापस नहीं जाएँगे। यह अब सिर्फ CAA के खिलाफ नहीं है, अब एक मुद्दे से दूसरा मुद्दा जुड़ता जाएगा। यह अब चाहे फाँसी की सजा के खिलाफ, चाहे महिलाओं को ज्यादा अधिकार दिए जाने के खिलाफ हो, वह नागरिक सड़क पर सरकार के खिलाफ आ चुका है। थोड़ी बातें ध्यान में रखनी जरूरी हैं कि यह विरोध किस रूप में आगे बढ़ते रहना चाहिए।”

बिना कोई तथ्य और तर्क देते हुए आरिफा शेरवानी ने इस पूरे भाषण में जर्मनी और हिटलर को भी याद किया और अपने भाषण का अंत एक उर्दू शेर से ये कहते हुए किया कि उन्हें इससे ताकत मिलती है।

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