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ST-OBC के लिए भी हो SC जैसी स्पष्ट रेखा, इसके बिना पूरा नहीं होगा ‘सामाजिक न्याय’

SC लोगों के धर्मांतरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टता स्थापित की है। दुर्भाग्य से ऐसी कोई स्पष्टता ST और OBC को लेकर नहीं है। यह दुर्भाग्य आरक्षण जैसी उस व्यवस्था को भी खोखला कर रही है जो कथित जातीय उत्पीड़न की शिकार हिंदुओं को संरक्षण देने के नाम पर लाई गई थी।

अनुसूचित जाति (Scheduled Castes/SC) के लोगों के धर्मांतरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टता स्थापित की है। इसके अनुसार हिंदू, बौद्ध और सिख ही SC हो सकते हैं।

दुर्भाग्य से ऐसी कोई स्पष्टता अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes/ST) और अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) को लेकर नहीं है। यह दुर्भाग्य केवल धर्मांतरण तक ही सीमित नहीं है। आरक्षण जैसी उस व्यवस्था को भी खोखला कर रही है जो कथित जातीय उत्पीड़न की शिकार हिंदुओं को संरक्षण देने के नाम पर लाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है उसका सीधा-सरल अर्थ यह है कि यदि शेड्यूल कास्ट का कोई व्यक्ति धर्म से बाहर जाता है तो उसे SC श्रेणी के लाभ मिलते नहीं रह सकते। ‘घर वापसी’ की स्थिति में भी वह कुछ शर्तों को पूरा करने के बाद ही इन लाभों का योग्य माना जाएगा।

अनुसूचित जाति के धर्मांतरित व्यक्ति को SC दर्जा फिर से पाने के लिए 3 शर्तें पूरी करनी होगी;

  • स्पष्ट साक्ष्य जो यह बताता हो कि वह व्यक्ति मूल रूप से संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अधिसूचित जाति से संबंधित था।
  • मूल धर्म में पुन: वापसी के विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य देने होंगे। ईसाइयत या इस्लाम पूरी तरह छोड़ने का प्रमाण देना होगा। अपनी मूल जाति के रीति-रिवाज, परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं को स्वीकार करना होगा।
  • साक्ष्य देना होगा कि उसे मूल जाति के लोग पूरी तरह स्वीकार कर चुके हैं। केवल स्वयं का दावा पर्याप्त नहीं होगा। जाति की स्वीकृति आवश्यक होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ये तीनों शर्तें अनिवार्य है। इन्हें पूरी तरह प्रमाणित करने का दायित्व ‘घर वापसी’ करने वाले शेड्यूल कास्ट के उस व्यक्ति की ही होगी। यदि इनमें से एक भी शर्त प्रमाणित नहीं होती है तो ‘घर वापसी’ मान्य नहीं होगी।

यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है कि इतनी स्पष्ट शर्तें और मानदंड ST और OBC पर क्यों लागू नहीं होते? इस जवाब के अस्पष्ट उत्तर से ही ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन (Crypto Christian)’ पैदा होते हैं। इस अस्पष्टता के कारण ही OBC सूची में मुस्लिम घुसपैठ बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं, धर्म से बाहर जाने के बाद भी ST और OBC दर्जे का बना रहना आरक्षण के आधार में भी विकृति पैदा करती है।

परतंत्र भारत में कोल्हापुर, त्रावणकोर और मैसूर जैसी रियासतों में आरक्षण की व्यवस्था इसी नाम पर लाई गई थी कि इसके जरिए हिंदुओं की ​कथित उत्पीड़ित जातियों को संरक्षण मिलेगा। वर्तमान में जो आरक्षण की व्यवस्था है, उसका महत्वपूर्ण आधार 1932 का ‘पूना पैक्ट’ है। यह समझौता गाँधी और अंबेडकर के बीच तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमसे मैकडॉनल्ड की साजिश को रोकने के लिए हुआ था।

हिंदुओं को विभाजित करने के उद्देश्य से मैकडॉनल्ड ने दलितों को अलग संप्रदाय की पहचान और उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल का प्रस्ताव दिया था। लेकिन ‘पूना पैक्ट’ से यह सुनिश्चित हुआ कि अलग निर्वाचन क्षेत्र की जगह​ आरक्षित सीटों का प्रावधान किया जाए।

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि शुरुआत में SC की परिभाषा को केवल हिंदुओं तक ही सीमित रखा गया था। बाद में इसे सिख (1956) और बौद्ध (1990) तक विस्तारित किया गया। आज भी मुस्लिम और ईसाई बने दलितों को SC का दर्जा नहीं मिलता है। इसका आधार यह है कि SC आरक्षण ‘हिंदू सामाजिक संरचना में अस्पृश्यता’ से जुड़ा है।

ऐसे में ST और OBC वर्ग में ईसाइयों और मुस्लिमों की घुसपैठ ‘पूना पैक्ट’ की मूल आत्मा पर प्रहार है। इस घुसपैठ के समर्थकों का कहना है कि ST पहचान धर्म की जगह, जनजातीय, भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से जुड़ा हुआ है। OBC की पहचान को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन पर आधारित बताया जाता है। 1979 के ‘मंडल कमीशन’ ने भी इसे ही अधार बनाया था।

पर यह आरक्षण की मूल भावना की ‘विकृत व्याख्या’ है और धर्म से बाहर जाने वालों के लिए दोहरे लाभ (धर्म बदलने की स्वतंत्रता+आरक्षण का लाभ) की स्थिति बनाती है। जब आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश्य हिंदू समाज के भीतर के कथित जातीय भेदभाव को खत्म करना है (आज भी इस व्यवस्था को इसी कथित आधार पर पोषित किया जा रहा है) तो फिर धर्मांतरण के बाद इस ढाँचे से बाहर जाने वाले को इसका लाभ क्यों मिलना चाहिए?

ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि अदालतें और सरकारें SC वर्ग जैसी सुरक्षा, ST और OBC वर्ग के लोगों को भी प्रदान करें या फिर जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बंद कर, उसकी जगह आरक्षण की ऐसी राष्ट्रीय नीति लाए, जिसका आधार आर्थिक और सामाजिक मानदंड ही हों। धर्म-मजहब-जाति की सीमाओं से परे।

यदि ऐसा नहीं होता है तो आरक्षण के ​जरिए ‘समावेशी सामाजिक न्याय’ का ढाँचा कभी खड़ा नहीं हो पाएगा। भले ही SC, ST और OBC के लिए अलग-अलग मानदंड, ऐतिहासिक रूप से विकसित हुए हैं, पर सत्य यही है कि आज वे अप्रासंगिक हो चुके हैं।

सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों के बीच संतुलन के मानदंड अब अलग-अलग नहीं चल सकते। उन्हें एक ही करने होंगे, क्योंकि आज के समाज में आरक्षण की बहस ‘पात्रता’ से आगे बढ़कर ‘दर्शन’ पर पहुँच चुकी है।

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अजीत झा
अजीत झा
संपादक, ऑपइंडिया (हिंदी)

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